Sahitya Kunj  - शकुन्तला - Shakuntala

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ISSN 2292-9754

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03.21.2016



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वृद्ध शिराओं में होती अनुभूति प्यार की?
करता अगवानी हेमन्त विहँस बहार की?
हृदय-तरंगों में अपूर्व-सी हलचल क्यों है?
जाग उठी क्यों आज फिर कामना सिंगार की?

क्यों उद्दाम उमंगें उद्वेलित करतीं मन?
तृषा जागती अधरों में, रोमांचित है तन?
क्यों वैरागी अन्तर में अनुराग उमड़ता?
उग-उग आता है क्यों मन में भोगों का वन?

क्यों सौन्दर्य -हेतु उगता उर में लगाव-सा?
डाल रही रति-प्रेरित प्रकृति प्रणय प्रभाव सा?
संयम-सागर में सहसा ही ज्वार उठा क्यों?
ठहरी मृदुल भावनाओं में है बहाव-सा?

यह कैसा संगीत छू रहा अन्तरतम को?
किसके स्वर का जीवित जादू छूए अहम्‌ को?
यह किसका कल कण्ठ कर रहा वर्षा रस की?
कैसी पदाभिव्यक्ति कर रही प्लावित मन को?

दृगोन्मेष कर देखा ऋषि ने, एक बाला थी।
कनक-चषक में छल-छल करती-सी हाला थी।
अंग-प्रत्यंगों से घन-मेघ रूप के झरते,
बाला, हाला नहीं अपितु चल मधुशाला थी।

उपत्यका में नृत्य कर रही थी मधुबाला।
हाव-भाव-हेला-प्रमिलू-गत-भाव निराला।
नृत्त, नृत्य नाट्‌याश्रय ले अभिनय करती थी,
झूम रहा था जिसे देख कण-कण मतवाला॥

चंचल हिरणी-सी चहुँदिशि चलती जाती थी।
आत्मरता-सी भूल भवन को बल खाती थी।
तोड़ा, परण, चक्रमण, भ्रमरी से मन छलती,
मोहक स्वरलहरी भर-भर कर यह गाती थी॥

"जीवन केवल प्यार मानव!"

अलक-दल में अमावस्या,
नयन में ज्योति का सागर।
अधर मधु से भरे दो घट,
चिबुक-ग्रीवा रूप आगर॥

राजती गौर आनन पर,
रूप लावण्यमय गरिमा॥

तुम्हारे वक्ष का गुरु भार
यौवन की पराकाष्ठा।
क्षीण कटि, नाभि, उरु-स्थल देख
उगती काम-प्रति निष्ठा॥

न देखा तुम सदृश कोई
स्वयं की स्वयं हो उपमा॥

यक्षिणी नाग, गन्धर्वी,
किन्नरी या कि देवी हो।
मानवी, अप्सरा जो भी
दिव्य संगीत-सेवी हो॥

न वाणी गा सके कोई
तुम्हारे रूप की महिमा॥"

मगर मेनका को नहीं चेत आया।
विवश हो अत: स्वयं ऋषि ने उठाया।
बनाकर सुमन-सेज अपने करों से,
उठा मेनका को स्वकर से, लिटाया॥

कमण्डल उठाकर लिया हस्त में जल।
दिया डाल पढ़ मन्त्र मुख पर उसी पल।
हुई चेतना खुल गए चक्षु चंचल,
लजाकर उठी मेनका ओढ़ आँचल॥

हुई नत पगों में क्षमा माँगती-सी-
हृदय-वारिजों को सतत्‌ ढाँकती सी॥
बहे जा रहे जो, प्रमथ की प्रलय में।
उधर सोचते गाधि-सुत यूँ हृदय में॥

"अर्चना के इन क्षणों में,
जग रहीं क्यों वासनाएँ?

मन-मतंग अनंग-वश क्यों?
भा रहा रंग-रूप-रस क्यों?
पंगु क्यों होता इड़ा-बल,
लग रहा पुनि भव सरस क्यों?

सिद्धि की उपलब्धि-दुष्कर,
थक रहीं क्यों साधनाएँ?

कौन यह रमणी अनोखी,
रूप-वय-यौवन-त्रिपथगा।
हो रही क्यों देख जिसको,
भावना मेरी विपथगा।

रूप रख नूतन नयन से,
झाँकती हैं कामनाएँ?

आत्म-सयंम के अचल पग,
क्यों बहकते जा रहे हैं?
प्राण मेरे प्रणय-पावक
में दहकते जा रहे हैं?

विरति से पुनि-पुनि सुरति में,
है बदलती प्रार्थनाएँ?

यह मदिर संस्पर्श मन को,
कर रहा उन्मत रह-रह।
माँगते दर्शन, नयन-
सौन्दर्य-सलिला मध्य बह-बह।

प्रबल है मिलनाभिलाषा,
दे रही रति यन्त्रणाएँ?"


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