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ISSN 2292-9754

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03.04.2016



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आ गई मेनका मर्त्यलोक।
थी विस्मित कौशिक को विलोक।
जाह्ननवी-समीप तपोवन में,
थे ध्यानावस्थिति ऋषि, अशोक॥

कानन में शान्ति विचरती थी।
आनन पर शान्ति विचरती थी।
जो दर्शन कर ले एक बार,
उस मन में शान्ति विचरती थी॥

सर्वत्र शान्ति का था शासन।
संचरित हो रहा शीत पवन।
थे सहचर शावक शार्दूल,
सुमनों से सुरभित था उपवन॥

निज ध्येय दिशा में ही अविकल।
सुर-सरिता बहती थी कल-कल।
गुंजायमान कर दस दिक्‌ दिक्‌ में,
हर-हर हर-हर का मंत्र विमल॥

कोलाहल करता उर्मि-वृन्द।
मानो पढ़ता स्वच्छन्द छन्द।
आते-आते समीप ऋषि के,
हो जाता था पर मौन मन्द॥

लगता, आश्रम के पद पखार।
मन-ही-मन अगणित दीप वार।
आरती उतार परिक्रमा कर,
कौशिक को करता नमस्कार॥

ऋषि के स्कन्धों पर कर विहार।
सविनय प्रणाम कर बार-बार।
नीरवता को प्रतिमा-से खग,
करते अवाक्‌ मन्त्रोच्चार॥

बह रहा चतुर्दिक मलय पवन।
था प्रकृति-सुसज्जित वह उपवन।
हरती थी चित को चारु गन्ध,
सुरभित था कण-कण ज्यूँ चन्दन॥

मेनका मुग्ध-सी कर दर्शन।
हो गई स्वयं में पूर्ण मगन।
विस्मृत-उद्देश्या-सी सहसा,
ऋषि-पद में कर दण्डवत्‌-नमन॥

अवलोकन करती निर्निमेष।
ऋषि का तेजस्वी भव्य वेष।
वासना मिटी, अघहीन हुई,
निर्मल हो गया हृदय-प्रदेश॥

पावनता का वन्दन पावन।
पावनता का चिन्तन पावन।
कर देता तन-मन को पवित्र,
पावनता का दर्शन पावन॥

अन्तर्मन मुखर पुकार उठा।
कर कोटि-कोटि चीत्कार उठा।
मन्तव्य स्मरण कर आगम का,
उसका अन्तर धिक्कार उठा॥

खण्डित कर पुण्यों का प्रताप।
कर शील-भंग ऋषि का, अपाप।
पथ-च्युत्‌ कर व्रत-पूजन-तप से,
संयम हरना है महापाप॥

अविचल बैठे कौशिक महान।
करते तन्मय हो ईश-ध्यान।
मेनका हुई भयभीत देख,
दिव्यानन की आभा अम्लान॥

अति श्रद्धा और भक्ति से भर।
अक्षय तप तेज-पुंज से डर।
ऋषि के चरणों में कर प्रणाम,
वह लगी विचरने इधर-उधर॥

पर, शचिपति ने साहस न तजा।
था पवन देवता को भेजा।
आया ऋतुएँ ले संग अनंग,
आते ही कानन दिया सजा॥

हो चले द्रवित हिम-शिला खण्ड।
हो चला शान्त, मारुत प्रचण्ड।
आई मदमाती मनसिज ऋतु,
करती हिम-शासन खण्ड-खण्ड॥

शुचि शीतल मन्द सुगन्ध पवन।
पुनि लगा विचरने वन-उपवन।
कर मदिर स्पर्श सचराचर का,
भरता तन-मन में नव सिरहन॥

कोमल-कोमल किसलय-कलियाँ।
कोकिल-केकी की कल ध्वनियाँ।
किंजल्क-कुसुम कुसुमित कानन,
तितली-दल औ’ भ्रमरावलियाँ॥

चहुँदिश में बिखरी सुन्दरता।
कण-कण में व्यापक रंजकता।
अरसिक उर में भी रस भर दे,
सर्वत्र बस गई मादकता॥

चुपके-से आया मदन वीर।
लेकर अपना धनु तथा तीर।
तृण-तृण ही झूम उठा सहसा,
हो गया हरेक हृदय अधीर॥

पशु-पक्षी सब रसलीन हुए।
कर काम-केलि रति-लीन हुए।
हर कलि-दृग में अनुराग उगा,
तरु-लता परस्पर लीन हुए॥

हो गया मत्स्य-ध्वज सावधान।
लेकर कर में निज धनुष-वाण।
आक्रमण करे पूरे बल से,
कौशिक पा सकें न कहीं त्राण॥

पुष्पों की प्रत्यंचा पर रख।
सम्मोहन नामक तीक्ष्ण विशिख।
कर दिया यथाविधि प्रक्षेपण,
हो सका प्रभाव न न्यूनाधिक॥

उन्मादन शर-सन्धान किया।
स्तम्भन शर का सन्धन किया।
छोड़ा शोषण नामक शर भी,
तापन शर का सन्धान किया॥

ऋषि का वपु पुनि-पुनि काँप गया।
उर समा अनंग-प्रताप गया।
बस बीज-वपन का है विलम्ब,
तनु-हीन निमिष में भाँप गया॥

बोला-"मेनका! न कर विलम्ब।
लेकर रमणीय स्वरावलम्ब।
मधु राग छेड़कर राग जगा,
कर गाधि-तनय का चूर दम्भ॥

पंचम स्वर पर कर मधुर न्यास।
कर तार षडज-रे पर विन्यास।
मेनका मींड ले ’रि-प’ स्वर की,
श्रीराग गा उठी सोल्लास॥

गूँजी मन-रंजक स्वर-लहरी।
सुन जिसे समय की गति ठहरी।
ख्लवाट-वृद्ध तरु हरित हुए,
हर शुष्क लता भी हुई हरी॥

गाया भैरव-सा आदि राग।
गाया हिंडोल, गाया विहाग।
छेड़े स्वर वसन्त के मादक,
जी भर गाया केदार राग॥

कान्हरा देश, देसी, मल्हार।
रागिनी, मूर्तमय कर बहार।
सारँग-सा रँग भी बरसाया,
ऋषि-मन में उठने लगा ज्वार॥

जब मालकोष का स्वर साधा।
हर सप्तक में ही था बाँधा।
पाँचों स्वर ने पंचेन्द्रिय छू,
कौशिक-तप में डाली बाधा॥

उन्मीलित हुए नयन मुनि के।
अति मादक मधुर गीत सुन के।
जग गया राग से राग प्रबल,
हो चले भाव कोमल मन के॥

ऋषि करने लगे गहन विचार।
क्यों आज रहा है हृदय हार।
क्या हुआ साधना को मेरी,
उत्पन्न हो रहे क्यों विकार॥


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