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ISSN 2292-9754

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03.04.2016



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ऋषि वशिष्ठ के अपमान हेतु।
निज वचनों के सम्मान हेतु।
बारह वर्षों तक किया यज्ञ,
कौशिक ने नृप-निर्वाण हेतु॥

लेने को अपना यज्ञ -भाग।
आये न देवता महाभाग।
थक गये यत्न कर गाधि-तनय,
हो सफल न पाया महायाग॥

कौशिक ने यूँ मुँह की खाई।
अब बात प्रतिष्ठा की आई।
सशरीर स्वर्ग को जाने की,
शुचि प्रथा न नूतन चल पाई॥

ऋषि ने अपने तप के बल से।
चिर योग-साधना के बल से।
भेजा त्रिशंकु को सतनु स्वर्ग,
चिर संचित पुण्यों के बल से॥

जब त्रिशंकु आया स्वर्ग-द्वार।
मैंने सक्रोध कर पद-प्रहार।
नीचे की ओर धकेल दिया,
वह गिरा वेग से कर पुकार॥

पर धन्य-धन्य हे गाधि-तनय।
रोका उसको नभ-मध्य अभय।
रच दी तप-बल से नई सृष्टि,
मच गई विश्व में अपल प्रलय॥

ब्रह्मा ने तुरन्त हार मानी।
फिर और न अधिक रार ठानी।
ऋषि के वचनों की रक्षा हित,
मेरी भी नहीं सुनी वाणी॥

कर ब्रह्म-शाप से पूर्ण मुक्त।
करके त्रिशंकु को पाप-मुक्त।
दी सतनु प्रवेशाज्ञा उसको,
आ गया स्वर्ग, हो ताप-मुक्त॥

यह वही व्यक्ति गर्वीला है।
इसकी अद्‌भुत ही लीला है।
दुर्द्धर्ष, अजेय, साहसी, दृढ़,
ऋषि विश्वामित्र हठीला है॥

कैसे अभंग तप भंग करूँ।
इच्छाओं में नव रंग भरूँ।
संयम के सिन्धु तपस्वी हित,
क्या प्रेषित वीर अनंग करूँ॥

आते अनंग का मधुर ध्यान।
हो चले स्वस्थ, अस्वस्थ प्राण।
आयोजित की अविलम्ब सभा,
खोजने समस्या-समाधान॥

रम्भा से बोले--"चिर तरुणी!
तुम अतिशय मनोरमा रमणी।
चितचोर, चपल, चंचला, चारु,
रति-रमा सदृश हो मन-हरणी॥

चिर रूप-राशि से अलंकृता।
सर्व सुन्दरियों से नमस्कृता।
तुम विष्णु-प्रिया की सहोदरी,
हो रमा-सदृश ही सिन्धु-सुता॥

योगी-मन में उत्पात करो।
भोगी पर नव आघात करो।
हो जाए द्रवित पल में, रूपसि!
यदि पाहन पर दृक्पात करो॥

है गया न कभी वार खाली।
हो गयी सृष्टि ही मतवाली।
वह दिशा दास हो गई अपल,
तुमने जिस ओर दृष्टि डाली॥

रम्भे! अविलम्ब प्रयाण करो।
भय से मेरा परित्राण करो।
तप-संयम डिगा गाधि-सुत का,
भद्रे! मेरा कल्याण करो॥

बोली उठ रम्भा, "सुनें आर्य!
प्रभु की आज्ञा है शिरोधार्य।
हूँ सदा समुद्यत सेवा हित,
है यह परन्तु सम्भव न कार्य॥

भेजा था प्रभु ने एक बार।
इस ऋषि पर ही करने प्रहार।
थी विजय हुई मेरी, परन्तु
सचमुच में मैं ही गई हार॥

आकृष्ट कर लिया ऋषि का मन।
परिज्ञान हुआ उसको तत्क्षण।
उनके ही शाप-स्वरूप रही,
दस सहस्त्राब्द तक उत्पल बन॥"

आ गई इन्द्र को स्मरण कथा।
अपने अतीत की मनोव्यथा।
जब रम्भा को भेजा, कर दे
ऋषि कौशिक की तप-शक्ति वृथा॥

ऋषि चलित हुए पर जान गए।
मेरी लीला पहचान गए।
रम्भा के देकर शाप शिला
होने का, अन्तर्धान हुए॥

दस सहस्त्र वर्ष रही प्रस्तर।
तब टूटा ऋषि का शाप प्रखर।
बढ़ता ही गया सुयश ऋषि का,
पूजने लगे सुर-नर किन्नर॥

बोले, "सच कहती हो सुन्दरी!
है सरल न जय करना यह अरि।
निश्चय ही अपराजेय रही
हो कौशिक की संयम-सुरसरि॥

चिन्तातुर देखे जब सुरेश।
मेनका उठी, बोली-- "अक्लेश।
यदि चाहूँ, बच न सके मेरी
चितवन से प्रभु! अज-हरि-महेश॥

नारी नर की प्रेरणा प्रबल।
नारी ही है हर नर का बल।
नारी के सम्मुख ही होता,
बलिष्ठ नर भी पल में दुर्बल॥

नारी-नयनों का आमन्त्रण।
नारी-यौवन का आकर्षण।
हर हर तका संयम अनन्त
करता विचलित मुनियों का प्रण॥

मैं नारी हूँ जग की स्रष्टा,
वेदादि मन्त्र की हूँ द्रष्टा।
पुरुषों की सदा पराजय हूँ,
मैं नारी हूँ जग की नष्टा॥

नारी का सीमाहीन रूप।
बन जाता नर-हित काल-कूप।
नारी अपराजित रहती है,
नारी का है अद्‌भुत स्वरूप॥

अद्‌भुत नारी की चंचलता।
नर-हृदय लुभाती मांसलता।
कर देती द्रवित पुरुष-मन को
नारी की माया, कोमलता॥

मत समझो, अबल अकेली है।
लगती सर्वदा सहेली है।
ब्रह्मा भी जिसे न समझ सके,
नाती अति गूढ़ पहेली है॥

नारी माता, भगिनी, दुहिता।
है मंगलमयी नारि-ममता।
यदि रिपु बन जाए नारी तो,
रखती है प्रलयंकर की क्षमता॥

है पुरुष प्रथमत: विश्वामित्र।
पश्चात बने योगी पवित्र।
योगी भोगी बनता पल में,
अति विचित्र है नारी-चरित्र॥

हैं मनुज, नहीं सह पायेंगे।
संयम कब तक रख पायेंगे।
मेरी चितवन के कटाक्ष से,
रक्षा कब तक कर पायेंगे॥

प्रभु! साथ भेजिए देव मदन।
जिनके सम्मुख नतशिर त्रिभुवन।
वे हर लेंगे निर्मल विवेक,
विचलित हो जायेगा ऋषि-मन॥

जब तक सहायता दें न मदन।
उतरेगा ऋषि का कभी मद न।
नीरस होगा सौन्दर्य सकल,
निष्फल होगी बंकिम चितवन॥

षड्‌ऋतुएँ संग ले जाऊँगी।
यूँ वातावरण बनाऊँगी।
विश्वास रखें प्रभु! येन-केन,
कौशिक का हृदय रिझाऊँगी॥

हर श्वाँस बदल दूँगी ऋषि का।
विश्वास बदल दूँगी ऋषि का।
सौगन्ध मुझे प्रभु-चरणों की,
इतिहास बदल दूँगी ऋषि का॥

करती श्री-चरणों में वन्दन--
"आज्ञा दें दासी को भगवन्‌!
अब लक्ष्य-सिद्धि पाकर लौटूँ,
विनती करती हूँ, संक्रन्दन॥

"तुम ही मेरा अन्तिम बल हो।
कर सकती दूर अमंगल हो।
जाओ, जाओ, शुभ कार्य हेतु,
मेनके! तुम्हारा मंगल हो॥

बोले--विश्वस्तमना शचिपति।
संग जायें कामदेव औ’ रति।
सारे सुर सदा सहायक हों,
सबको ही है मेरी अनुमति॥"


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