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ISSN 2292-9754

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03.04.2016



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पुनि आई स्मरण त्रिशंकु-कथा।
अपनी पिछली मनोव्यथा।
जब नई सृष्टि रच कौशिक ने,
डाली थी अद्‌भुत नवल प्रथा॥

जग-विश्रुत दिनकर-कुल महान्‌।
था नृपति त्र्ययारुण वीर्यवान।
अतिशय जनप्रिय कर्त्तव्यनिष्ठ,
धर्मज्ञ शास्त्रविद्‌ कीर्तिवान॥

था एकमात्र आत्मज प्यारा।
नृप के नयनों का था तारा।
संज्ञा दी जिसे सत्यव्रत की,
इक्ष्वाकु वंश का उजियारा॥

था जाने किसका शाप मिला।
या किसी जन्म का पाप खिला।
जो पिता-पुत्र को अनायास,
जीवन-भर का अनुताप मिला॥

बौद्धिकता का क्षय होता है।
सामाजिकाता - भय खोता है।
सब शास्त्र पंगु हो जाते हैं,
जब प्रेम किसी से होता है॥

है प्यार देखता नहीं रीति।
है प्यार देखता नहीं नीति।
होता है रूप-रंग नगण्य,
है प्यार न देखे वंश-कीर्ति॥

ब्राह्मण-कन्या का हरण किया।
कुल के विपरीताचरण किया।
कर पूर्ण अवज्ञा गुरुजन की,
स्वेच्छा से विधिवत्‌ वरण किया॥

अपराध यही था, विघ्न किया।
भाँवर लेते पर रोक लिया।
मन्त्राभिदीक्षिता कन्या का,
मण्डप से जा अपहरण किया॥

परिलक्षित कर कुल-कीर्ति हानि।
नृप को हो गई अतीव ग्लानि।
वह चले गये अरण्य-हेतु,
तज राजपाट, हो रिक्त-पाणि॥

इस और त्र्ययारुण चला गया।
उस ओर सत्यव्रत छला गया।
वह भी हो आत्म-ग्लानि प्रेरित,
विधि के पादों से छला गया॥

वह भी करता आरण्यवास।
हो जाता पल-पल पर उदास।
घटती थी एक क्रूर घटना,
जा पहुँचा उस स्थल अनायास॥

थी खड़ी एक अबला नारी।
लगती थी कुलीन दुखियारी।
वह बेच रही थी निज सुत को,
हो क्षुधा-प्रपीड़ित बेचारी॥

है क्षुधा देखती धर्म नहीं।
है क्षुधा देखती कर्म नहीं।
वय, वर्ण, स्थान, कला, कुल का,
है क्षुधा समझती मर्म नहीं॥

विहगों को करती विवश क्षुधा।
पशुओं को करती विवश क्षुधा।
उत्तम से उत्तम मानव को,
कर देती पल में विवश क्षुधा॥

हो क्षुधा - विवश नाचे केहरि।
हो क्षुधा विवश नाचे नित हरि।
है क्षुधा कराती पाप सदा,
भर देती मन में घोर तिमिर॥

वह अबला कौशिक-भार्या थी।
आचरण-शास्त्र आचार्या थी।
मुख पर गौरव था, गरिमा थी,
वह नारी उत्तम आर्या थी॥

कौशिक ने जब संन्यास लिया।
वन में रह व्रत-उपवास किया।
त्यागा कुटुम्ब , धन-धाम, राज्य,
जीवन को नया विकास दिया॥

रानी को गृह छोड़ना पड़ा।
कण्टक-पथ में दौड़ना पड़ा।
रह क्षुधित-तृषित सन्तति के सँग,
नित घोर क्लेश झेलना पड़ा॥

वह पति को कभी न खोज सकी।
पुनि पूज न कभी मनोज सकी।
दिव्यासन से राजसी तेज का,
मिटा न किंचित ओज सकी॥

यह तथ्य सत्यव्रत ने जाना।
राजसी तेज को पहचाना।
बिकने न दिया सुत, लज्जा को,
उनको अपना करके माना॥

दे मातृ-सदृश सम्मान - दान।
भोजन-आच्छादन, शरण-स्थान।
रक्षा की यथाशक्ति उसने,
कौशिक-कुल कर रख लिया मान॥

उस ओर त्र्ययारुण-राजपाट।
खो बैठा निज वैभव विराट।
अनुशासन-हीन हुई जनता,
झुक गया प्रगति का शुभ ललाट॥

गुरु वशिष्ठ करते थे प्रबन्ध।
जन-वर्ग हो रहा था स्वच्छन्द।
प्रभु-सत्ता शिथिल हो चली थी,
हर कार्य-प्रणाली हुई मन्द॥

जन-मत ले, किया पुन: निर्णय।
कर क्षमा सत्यव्रत को सविनय।
लाएँ, लाकर दें राज-तिलक,
वह करे राज्य आकर निर्भय॥

इस मध्य घटी घटना वन में।
हो चली शिथिलता जीवन में।
मिल सका न जब भोजन, जाने
क्या आया सत्यव्रत के मन में॥

रहती न विपद में मर्यादा।
ज्यूँ सम्भव, दूर करे बाधा।
शबला को चुरा आश्रम से,
निज उटज-अजिर में बाँधा॥

पर विधि को नहीं दया आई।
वह धेनु न जीवित रह पाई।
जब विदित हुआ गुरु वशिष्ठ को,
तब और अधिक विपदा आई॥

था एक शंकु पिता-असन्तोष।
गोवध ठहरा दूसरा दोष।
कन्या का हरण तृतीय शंकु
कहलाये तीनों महादोष॥

गुरु ने कर भीषण हाल दिया।
दे शाप बना चाण्डाल दिया।
पड़ गया त्रिशंकु नाम जग में,
उसका स्वरूप विकराल हुआ॥

जब कौशिक को सच ज्ञात हुआ।
उर पर ज्यूँ वज्रपात हुआ।
दे शरण सत्यव्रत के, उसका
साम्राज्य दिला, चित शान्त हुआ॥

गुरु तथा गुरु-सुतों से शापित।
चाण्डाल-रूप में ही तापित।
ऋषि विश्वामित्र-पद्म-पद में,
गिर पड़ा पूर्णत: हो आश्रित॥

बोला, मेरा उद्धार करो।
दे पूर्व रूप उपकार करो।
आया हूँ विनत शरण में प्रभु,
अब मुझको अंगीकार करो॥

करने उसको अपराध-मुक्त।
करने, उसको हर पाप-मुक्त।
ले गये गाधि-सुत तीर्थों में,
करने को उसको शाप-मुक्त॥

कर पंचदेव का आराधन।
कर गायत्री का पुरश्चरण।
हो गये निवारण पाप-शाप,
हो गया त्रिशंकु पुन: पावन॥

पर गया नहीं चाण्डाल-रूप।
पा सका न पहले-सा स्वरूप।
करता था यद्यपि राज्य-शासन,
बनकर भू पर आदर्श भूप॥

विप्रों को देता विपुल दान।
गुरुजन का करता सदा मान।
थी प्रजा सुखी हर प्रकार से,
रखता सबका ही सदा ध्यान॥

करता था नित देवाराधन।
हरि-भक्ति-सरित में अवगाहन।
जो विश्वामित्र बताते थे,
करता था वही योग-साधन॥

सारे ही सुख थे, समृद्धि थी।
सद्‌ पथ पर प्रेरित सुबुद्धि थी।
करता था निश-दिन दान-पुण्य,
जग-भर में उसकी प्रसिद्धि थी॥

वह भोगी भी था, था त्यागी।
अनुरागी भी औ’ वैरागी।
सशरीर स्वर्ग में जाने की,
सहसा मन में इच्छा जागी॥

ऋषि वशिष्ठ ने दुतकार दिया।
गुरु-पुत्रों ने प्रतिकार किया।
सबने ही यज्ञ कराने का,
आवेदन अस्वीकार किया॥

पर कौशिक ने उपकार किया।
यज्ञामन्त्रण स्वीकार किया।
हलबल मच गई त्रिलोकों में,
सब देवों ने प्रतिकार किया॥

जब मुझको इसका हुआ बोध।
मैंने भी कितना किया क्रोध।
ब्रह्मा ने कितना समझाया,
सबने ही किया कड़ा विरोध॥

तोड़ो न सवर्ग की मर्यादा।
डालो न सुर-जगत में बाधा।
सशरीर न जा सकता मानव,
ऋषिवर! यह कैसा हठ साधा॥


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