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ISSN 2292-9754

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03.04.2016



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नृप विश्वामित्र लोकरजंक।
अरि-दल के थे सदैव भजंक।
जिनकी वाणी, आकृति, काया,
सचमुच में थी चित्ताकर्षक॥

हर अस्त्र-शस्त्र के सीख मर्म।
करते थे सदैव राजकर्म।
ऋषि ऋचीक को गुरु मान सदा,
पालन करते थे नृपति-धर्म॥

एक बार तुमुल संग्राम किया।
वसुधा पर अतिशय नाम किया।
आ वशिष्ठ-आश्रम में ससैन्य,
कौशिक ने निश-विश्राम किया॥

थी कामधेनु शबला श्यामा।
अति चित्तमोहिनी अभिरामा।
ऋषि वशिष्ठ की अतिशय प्रिय थी,
वह कामधेनु पूरित कामा॥

ऋषि वशिष्ठ ने सत्कार किया।
कौशिक ने अंगीकार किया।
भा गई सुरभि नृप को ऐसी,
ऋषि ने याचन स्वीकार किया॥

अवनीश-मान की बात कही।
हर पुण्य-दान की बात कही।
कौशिक ने सविनय ऋषिवर से,
सर्वस्व दान की बात कही॥

अपना सब अहंकार त्यागा।
कौशिक ने शबला को माँगा।
ऋषि वशिष्ठ की अस्वीकृती पर,
था राज-दम्भ पल में जागा॥

नृप-हठ, ऋषि-हठ में युद्ध छिड़ा।
कोई न किसी से भी पिछड़ा।
उस क्षात्र-तेज और ब्रह्म-तेज के
मध्य मिटा, जो वीर लड़ा॥

लड़ने आये पल्ल्व, हिरात।
काम्बोज वीर, बर्बर किरात।
यवनों ने भी ऋषि-हेतु किया
अति घोर समर, ले सैन्य साथ॥

कौशिक की थी सेना कराल।
चिर विजय वाहिनी थी विशाल।
हर समर - शास्त्र में पारंगत,
करती असफल हर शत्रु-चाल॥

खन-खन-खन-खन-खन वेग चले।
झन-झन-झन गदा सवेग चले।
छा गयी विशिष-बौछारें ज्यूँ,
झर-झर-झर झरते मेघ चले॥

अग्न्यास्त्र चले, मेघास्त्र चले।
पवनास्त्र चले, वरुणास्त्र चले।
चलते थे अस्त्र अजस्त्र वहाँ,
हर प्रकार के ही शस्त्र चले॥

भिड़ गये रथी से विकट रथी।
झट महारथी से महारथी।
जय कौशिक, जय वशिष्ठ कहके,
भिड़ गये वीर से वीर व्रती॥

भिड़ गये गयन्दों से गयन्द।
अश्वों से अश्व लड़े अमन्द।
टकाराये पदाति से पदाति,
छा गया चतुर्दिक घोर धुन्ध॥

मेघों - से छाये रेणु-बाण।
विद्युत्‌-सम द्योतित असि-कृपाण।
थे प्राण बिक रहे बिना मूल्य,
था नहीं किसी को कहीं त्राण॥

धरणी करती शोणित-सिंगार।
अम्बर करता था चीत्कार।
कोलाहल ही कोलाहल था,
हर दिशा उगलती थी अँगार॥

जल-धारा सा बहता लोहित।
लप-लप पीतीं असियाँ द्योतित।
’मारो’, ’मर गया’ नाद गुंजित,
हुंकार रहे योद्धा क्रोधित॥

कट-कट कर अनगिन मुण्ड गिरें।
ढह-ढह कर अनगिन रुण्ड गिरें।
गज-अश्व-मनुज शव पड़े ढेर,
लड़-लड़ वीरों के झुण्ड गिरें॥

खाते थे लड़-लड़ मांस-पिण्ड।
चीलों-गिद्धों के झपट झुण्ड।
थे काक-श्रॄगाल अतीव मुदित,
खा-खा वीरों के रुण्ड-मुण्ड॥

हो रहा था समर घमसान।
पुलकित फिरते थे श्येन-श्वान।
लोहूलुहान थी दिशा-दिशा,
आश्रम का अजिर बना मसान॥

ताण्डव करता था महाकाल।
यमराज दे रहा पूर्ण ताल।
खप्पर ले घूम रही काली,
पहने ग्रीवा में मुण्ड-माल॥

थे शान्त खड़े अब तक वशिष्ठ।
करते थे अपना स्मरण इष्ट।
आ गया क्रोध जब पुत्र मिटे,
हो गई समूची चमू नष्ट॥

हो क्रुद्ध कमण्डल उठा लिया।
कर-अंजलि में भर वारि लिया।
पढ़ मंत्र शाप-हुंकार भरी,
कौशिक-सेना को भस्म किया॥

मिट गये रथी औ’ महारथी।
मिट गये अश्व-गज वीर व्रती।
बस एक पुत्र ही शेष रहा,
मिट गये सभी सुत शूर धृती॥

कौशिक एकाकी एक ओर।
थे वशिष्ठ स्थित दूसरी ओर।
हो गई पूर्णाहुति पल में,
रह गया न किंचित कहीं शोर॥

थी ब्रह्म-तेज की विजय हुई।
क्षात्रत्व-प्रभा थी विलय हुई।
उस घमसान रण के मिस जग
में, सचमुच भीषण प्रलय हुई॥

थी असह्य पराजय की लज्जा।
त्यागी कौशिक ने नृप-सज्जा।
तज राज-पाट, तप-लीन हुए,
अंततः मिली ऋषि की प्रज्ञा॥

हो गया बैर का बीज वपन।
हो सका न जिसका कभी शमन।
जलती ही रही सदा धू-धू,
कौशिक-उर में प्रतिशोध अगन॥

कर कठोर से कठोरतम तप।
कर शताब्दियों तक अहरह जप।
मुनि-मौलि बन गये विश्वामित्र,
सह पावस, शीत और आतप॥

ब्रह्मर्षि न फिर भी बन पाये।
राजर्षि मात्र ही कहलाये।
बढ़ती ही गई प्रतिस्पर्धा,
वे कभी प्रशान्त न हो पाये॥

प्रतिशोध हेतु सारे प्रण थे।
दुखते कौशिक-मन के व्रण थे।
थे वशिष्ठ मुनि तो ऋग्वैदिक,
पर विश्वामित्र अथर्वण थे॥


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