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ISSN 2292-9754

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03.04.2016



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निर्मल निश्शंक निर्भय निश्छल।
रवि-आभायुत्‌ आनन अविकल।
मन्मथ-रिपु-सा योगी अजेय,
लालित्य-पुंज-सा वीर विमल॥

आकाश सदृश गौरव - गरिमा।
देवाधिक दिव्य तेज, महिमा।
शत्रुघ्न, सदाशय, शीलवान,
कोमल, कमनीय, कान्ति, सुषमा॥

सत्पुरुष, सत्यवत, सत्यकाम।
प्रेक्षक त्रिकाल का, आप्तकाम।
मर्यादाओं का प्रतिहारी,
सद्‌भाव-पुंज साधक ललाम॥

मनसिज-विरक्त - सा महायती।
रणधीर महामुनि धीरमती।
पितृकृत पुण्यागार अगम,
तत्त्वज्ञ, तपोनिधि, तपस्कृती॥

है हिमगिरि - सा उन्नत ललाट।
युग स्कन्ध शक्ति-सरि युगल पाट।
सिर जटा, श्मश्रु-शोभित आनन,
नयनों में दिव्याभा विराट॥

तन हृष्ट-पुष्ट, मन अचल अमल।
गिरि-उपत्यिकाजिर में अविचल।
बैठे थे विश्वामित्र विरत,
हो समाधिस्थ निर्मम निश्चल॥

शचिपत का आनन हुआ म्लान।
हो चला विपद का पुन: भान।
भय से अशान्त हो गया हृदय,
छिन जाय न आसन और स्थान॥

अधिकार नहीं छिन जाए कहीं।
श्रृंगार नहीं छिन जाय कहीं।
भय हुआ सफल सुख-वैभव का,
संसार नहीं छिन जाय कहीं॥

था अनायास संशय जागा।
पद छिन जाने का भय जागा।
वैकल्य भर गया भावों में,
अन्तर में अदय अनय जागा॥

प्राणों से प्रिय पद होता है।
आदर्शों का वध होता है।
बन जाती नीति अनीति अपल,
प्रभुता में वह मद होता है॥

भय भरती है अपनी ही छाया।
हो जाती है अस्त-व्यस्त काया।
बन जाता जीवन-सार्थ स्वार्थ,
है ऐसी प्रभुता की माया॥

लगता है कि हो चली नियति वक्र।
विपरीत हो चला समय-चक्र।
शासन न स्वर्ग का छिन जाये,
थे चिन्तित रहने लगे शक्र॥


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