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ISSN 2292-9754

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03.04.2016

 
शकुन्तला

प्रो. हरिशंकर आदेश सही अर्थों में हिन्दी के प्रथम प्रवासी महाकवि हैं। यह महाकाव्यत्मकता उनके व्यापक कार्य-क्षेत्र, प्रकाण्ड विद्वत्ता और सृजनधर्मी संस्कारशीलता में भी परिलक्षित की जा सकती है।

अनेकानेक मूल्यवान कृतियों के बीच शकुन्तला आदेश जी का दूसरा महाकाव्य है। पहला था अनुराग जिसमें उन्होंने सत्यवती (मत्स्यगंधा) और शांतनु के प्रेमानुराग को चित्रित किया है।
शकुन्तला-जैसा नारी चरित्र संस्कृत, हिन्दी एवं विभिन्न भारतीय भाषाओं में ही सर्वोपरि काव्यालम्बन नहीं रहा, बल्कि विश्व-भर के काव्य रसिकों को प्रेरित-प्रभावित करता रहा है। दुष्यन्त-शकुन्तला के मिलन-बिछोह-मिलन का यह अनुपमेय आख्यान मनुष्य-हृदय को जिस प्रकार उद्वेलित करता है, वह अपने आप में ही विरल उदाहरण है।

तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो यह महाकाव्य पुरुष और प्रकृति के सहज साहचर्य और जन्मजात आकर्षण की महागाथा है, जो कि विभिन्न छांदिक शब्द-स्वर-लहरियों के माध्यम से मानव-जीवन और उसके समयानुकूल मनोवेगों को उजागर करता है। संक्षेप में कहा जाय तो विशुद्ध प्रकृति-काव्य है। स्पष्टतया ही प्रकृति का जो रूप यहाँ चित्रित हुआ है, वह उभयपक्षी है- बाह्य और आंतरिक। साथ ही इसमें कल और आज का भी गहरा सामंजस्य है। स्वयं महाकवि के शब्दों में, मेनका-विश्वामित्र तया शकुन्तला-दुष्यन्त की गाथाएँ केवल पुराणेतिहास और बीते कल की गाथाएँ ही नहीं हैं, प्रत्युत आज और आनेवाले प्रत्येक कल की गाथाएँ हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि दस सर्गों में संयोजित इस महाकाव्य की रचना करते हुए महाकवि आदेश एक पुरातन आख्यान की सम्पूर्ण सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा करते हैं और उसे अपने समय से जोड़कर भी देखते हैं। इस नाते यहा महाकाव्य शाश्वत मानव-मूल्यों को तो रेखांकित करता ही है, वर्तमान को भी प्रतिबिम्बित करता है। दूसरे शब्दों में, कालबद्ध होकर भी कालजयी है यह, और मानव-स्वभाव को प्रतीकित करते हुए विश्वजनीन भी।

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