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ISSN 2292-9754

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10.05.2016


जीभ चटोरी भी, ... जीभ जूतियाँ भी खिलाती है....

यह चार अंगुल की जीभ...होती है बड़ी करामती। जीभ है एक लेकिन इसके रूप है अनेक। पल में किसी को अपना बना देती है तो किसी को छकड़ी भुला देती है।

पढ़े-लिखे भले लोग कह गए "जीभ पर अमृत बसै", और जीभ ही विष फैलाती है। जो कोई अच्छा नहीं बोलता है तो उसके लड्डू भी नहीं बिकते और जो बोलना जानता है उसके चने भी बिक जाते हैं।

अब आप कहोगे यहाँ बात तो जीभ की चल रही थी बोली का क्या काम। जीभ पर बोली बिराजती है। लो पता नहीं क्या जीभ से ही तो बोली का जन्म हुआ। जीभ सबकी एक सी होती है फिर भी न्यारी-न्यारी गुण वाली होती है। जब जीभ ज़रा भी टेढ़ी चली, फिर क्या कहने "खावै सुअर और कुटीजै पाड़ा" कहावत पूरी होते देर नहीं लगती। चलती है ज़ुबान और कुटीजता है सिर। इसलिए ज़ुबान पर लगाम लगाए रखना ज़रूरी है। सबसे बड़ी बात है बोली और खानेवाले सभी पदार्थों का स्वाद जीभ बताती है।

जीभ का दूसरा नाम ज़बान है। अजी जनाब क्या जानते हैं आप, ज़बान एक लेकिन रंग रूप अनेक। .... बोलने से ज्ञात होता है कौन कागा कौन कोयल है। अब देखें किसी की बोली खारी तो दूसरे की मीठी। एक हिये में हेत उपजा देती है तो दूसरे की आग लगा देती है।

कई लोग बोलने में बहुत चंट होते है, लोगों से ऐसा बोलते हैं कि अगले के पेट में ही उतर जाते हैं और कई ऊँट जैसे भोले कुछ बोलना ही नहीं जानते। कुछ लोग ऐसे कि बिगड़ते काम मिनटों में बना लेते हैं। कुछ ज़बान से ही तीन तेहरा कर देते हैं। कड़ी बोली वाले का काम नमक का पानी होकर बिगड़ जाता है। आदमी खाये बिना रह जाता है मगर कहे बिना नहीं रह सकता। अब डाक्टर को ही देखो मीठा बोलकर स्टेथोस्कोप से मरीज़ का दिल नहीं जेब टटोलता है।

बड़बोला तो अंट-संट बोलता ही रहता है। जब कहते है बड़बोला-बेलखणां के सींग होता है ना पूँछ। यह तो अपनी बोल-चाल की भाषा से ही पहचाना जाता है। इसलिए पहले तोलो फिर बोलो कहा गया है: तोल-तोल कर बोल क्योंकि बोल की क़ीमत है। एक सेठ ने अपना धन्धा ख़ूब अच्छा चलाया। उसकी किराणे की दूकान पर भीड़ पड़ती पासवाला दूकानदार बैठा मक्खियाँ मारता रहता। अब सोचिए ऐसा क्यों? क्योंकि वह ग्राहक से अकड़ कर बोलता था। हर कोई जानता था कि इसे बोलने का होश नहीं, यह अभी ऐसी बात कह देगा कि अपमान हो जायेगा। पैसा देकर अपमान कौन कराये! उसे समझ थी कि ग्राहाकी के आगे नरमाई चलती है अकड़ नहीं चलती फिर भी उसकी ज़बान फिसल जाती। व्यापार में नम्रता रामबाण होती है। कहावत है दुकानदारी नरमाई री अर हाकमी गरमाई से।

सच है, ज़िन्दगी में बोली ही कामयाबी दिलाती है और बोली ही धूल चटाती है। ज़िंदगी में सफलता बोली पर ही निर्भर होती है। समझ गए आप। अब देखो बोली से ही आदमी क़रीब आता है और बोली से ही अलग पड जाता हैं। सबके बोलने-बोलने में अन्तर होता है। बोलना भी एक कला होती है।

कइयों की ज़बान कतरनी जैसे चलती है। उसे लोग बोबाड़िया कहते हैं। अधिक बोलने वाले की शाख नहीं रहती है। कम बोलने से इन्सान की इज़्ज़त होती है। उसे कहते है ठीमरपना है। यह बुद्धिमान है। क्योंकि कई बार जीभ उटपटांग शब्द निकाल देती है और वो ऊट-पटांग शब्द किसी को सहन नहीं होते है तो वह भी अपने तीर निकाल कर दम लेता है। यह कहना ग़लत नहीं कि किसी की जीभ चले और किसी के हाथ। मतलब झगड़ों की जड़ है ज़ुबान।

कहीं बेमतलब जीभ चला देने से कूटीजते देर नहीं लगती। जूता-फजीती कर लोग दिन में तारे दिखा देते हैं। एक बात है आदमी कितना ही जीभ चलाता है सेर को सवा सेर मिलते ही जीभ चिप जाती है मतलब ज़बान बंद हो जाती है। अधिक ज़बान चलाने से घाटा ही होता है। जीभ मूर्ख व समझदार का भेद बता देती है। मजबूरी में ज़बान सब भेद खोल देती है जिससे कई अवसरों पर होता है आदमी फँस जाता है। कहते सुना होगा पहले अपनों से बड़ों के आगे जीभ नहीं खुलती थी। ज्ञानी आदमी तो ज़ुबान खुलते पहचान जाते हैं कि इसके ज़ुबान पर सरस्वती बिराजती है। अजी जनाब यह जीभ है बड़ी चटोरी। खानेवाले सभी पदार्थों का स्वाद जीभ बताती है। चटोकड़ी जीभ सबसे बुरी। चटखारा लेके अच्छी-अच्छी चीज़ें खाने के लिए पूरा दिन कुछ न कुछ उपाय करती रहती है। क्या सादी दाल-रोटी से ज़िन्दगी नहीं निकल सकती? नहीं जी नहीं फिर इतने सारे उपाय क्यों नहीं किए जाएँ। जिसकी ज़बान चटोकड़ी उसका स्वभाव बिल्ली जैसा होता हैं बिल्ली चूके तो ये भी चूके।

खाना खज़ाना, मास्टर शेफ़ से लेकर क्या-क्या प्रोग्राम टी.वी. वाले बनाते हैं और रात-दिन सब काम छोड़ कर औरतें तो क्या आदमी भी इन प्रोग्राम को देखते रहते हैं। चाहे घर में बैठे हों या दफ़तर में, शादी का भोज हो, भोजन के स्वाद का फ़ैसला जीभ करती है। घर में कोई अच्छी चीज़ टिकने ही नहीं देती यह चटोकड़ी जीभ। घी, शक्कर, मक्खन ब्रेड या अंडे रखे देखा नहीं कि मन होता है चलो प्रोग्राम में देखी चीज़ बनाएँ। एक बार चटोरपन की लत लग गई तो लक्षण ख़राब। चटोरों के मुँह पैसों की धूल उड़ाने लगते देर नहीं करते। जीभ तो कुछ न कुछ नमकीन-मीठी चीज़ें खाने को माँगती रहती है। और दिल ही तो है पैसे उड़ा जीभ की फ़रमाइश पूरी करने में लग जाता है। मतलब मियाँ का माल हाँडी में।

हाँ ज़बान पकड़नी और ज़बान बंद करनी एक ही बात होती है। जिसका अपनी ज़ुबान पर ज़ोर चलता है वह किसी भी ज़बान पकड़ सकता है। किसी की ज़ुबान बंद करना हँसी-खेल नहीं है। हरएक से यह काम नहीं हो सकता है। बिरले ही होते है जो हर किसी की ज़ुबान पकड़ कर अपमानित कर सकते हैं।

एक बात है जिसकी ज़ुबान बिगड़ जाती है उसे कोई पसन्द नहीं करता। क्योंकि उसे किसी से ढंग से बात करने की सुध ही नहीं रहती। जिसकी ज़बान गंदी वह कहीं इज़्ज़त नहीं पाता, लोग बोलने से पहले गाली बोलते हैं फिर बात करते हैं। ऐसे कहीं प्रशंसा नहीं पा सकते। बल्कि कभी उनकी आरती भी हो जाती है। गाली कौन सुनेगा? यह कहना सच हो जाता है कि किसी की जीभ चले, किसी के हाथ! आदमियों के बीच अपना मान घटा बैठता है। नाई हो या नहीं - हजामत हो जाती है।

एक राज़ की बात कहती हूँ ज़ुबान पर लगाम रखना ज़रूरी है। नहीं तो फजीता होते देर नहीं लगती। आदमी को मौक़ा देखकर ही अपनी ज़बान चलानी चाहिए। जो अपनी ज़बान पर लगाम नहीं रख सकता उसके काम बिगड़ते देर नहीं लगती। तभी तो कहते है मूर्ख की ज़बान पर क़ाबू नहीं रहता।

जिसकी ज़बान पर ज़ोर होता है उसे वकील कहते हैं। वकील की ज़बान तर्क-वितर्क दोनों करने में माहिर होती है। उनको बोलने का अभ्यास होता है वे सबकी बोलती बंद कर देते हैं। जब कोई जवाब नहीं दे पाता तो कहा जाता है लो साहब ज़बान के ताला लग गया। पुराने समय में हर कोई अपनों से बड़ों के आगे जीभ नहीं खोलता था। घर से बाहर भी अपने अधिकारी के आगे नहीं बोलते थे एक समय ऐसा था कि सब छोटे, बड़ों के सामने जीभ सिये रखते थे। अब बड़े-छोटे का कोई लिहाज़ नहीं यही कहा जाता है जीभ खुल गई। जीभ खोलना बहुत बड़ा काम होता है।

कई आदमी ऐसे तेज़ होते है कि किसी के सामने नहीं दबते। कई ऐसे कि पुरानी से पुरानी बात अपनी ज़बान पर रखते हैं। हर बात का जवाब हाथों-हाथ देते है मानों उनकी ज़बान पर तैयार रखी हों अपनों से बड़ों के सामने जीभ भारी पड़ जाती है। जीभ तालबे छोटी पड़गी याने भय से बोलती बंद हो गई।

ज्ञानी लोग तो ज़बान को समझ कर काम लेते हैं। मूर्ख को समझाते-समझाते ज़बान घिस जाती है पर समझ नहीं आती है।

जीभ आ गई है। घणीं जीभ आई हुई अच्छी बात नहीं। जीभ आने पर सब बुरा कहते हैं। इसलिए मैं तो कहती हूँ जीभ को बस में ही रखना चाहिए। लेकिन आजकल की बहुएँ जीभ चलानी ख़ूब जानती हैं। ससुराल वालों की चुटकियों में ही बोलती बंद कर देती हैं। जिसकी जीभ पर क़ाबू होता है हर स्थान पर सफल होता हैं इसलिए जीभ पर क़ाबू रखना चाहिए। चुगली करनेवाली जीभ सब से गई-बीती होती है। सौ बात की एक पते की बात है कि नहीं तो ऊट-पटांग ज़बान चलानी और न ही कभी ज़बान को फिसलने देना। ज़बान में ही अमृत, ज़बान ही सब को इज़्ज़त दिलाने वाली इसलिए गाँठ बाँध लो भई प्राण जाए पर वचन ना जाए, ज़बान पर दृढ़ रहना ही अच्छी बात है। आन-बान की ज़बान सबसे मोटी चीज़ गिनी जाती है। आदमी को अपनी ज़बान पर क़ायम रहना चाहिए कई आदमी मर जाते हैं पर अपनी ज़बान नहीं जाने देते हैं। ज़बान से मुकरने पर विश्वास खो जाता है। पहले के लोग ज़बान के अधिक पक्के थे वे अपनी ज़बान का पालन करने में प्राण दे देते। मतलब कभी अपनी ज़ुबान से नहीं फिरते थे। ज़बान दे दी......मतलब दे दी......फिर चाहे सिर कटाना पड़े, पीछे नहीं हटते। अब ऐसा ज़माना कहाँ...ढूँढने पर ज़बान के धनी मिलते हैं। कभी-कभी ऐसे इन्सान भी मिलते हैं जिनकी ज़बान पर सब होता है। एक ज़बान ही ऐसी है जो जलती आग में घी डाल सकती है। ग़लत बोल हरेक को सहन नहीं होते हैं तो.... टाट हल्की करवा देती है।

यह जीभ अच्छे-अच्छों के छक्के छुड़ा देती है बोलती बन्द कर देती थी, जिसकी ज़बान मीठी होती है उस पर सैंकड़ों लोग फ़िदा हो जाते हैं....बुरी होने पर दुश्मन बन जाते हैं। जीभ के सब कार्य बहुत अच्छे हैं लेकिन जीभ जाडी नहीं पड़े तो अच्छी बात है। अब कहते हैं ज़बान जाडी पड़ गई। मतलब अन्त समय आ गया। बोली बन्द हो गई। मतलब ख़ुदा के घर का बुलावा आ गया। आजू-बाजू के लोग ग़मगीन हो जाते हैं लेकिन इस समय कोई काम नहीं आ सकता। गहराई से देखें तो जीभ का काम तो प्रभु का नाम लेने का है। इससे पाप कटते हैं अगोतर सुधरता है। जीभ अपने जमारे में भगवान का नाम लेती रहे तो मुक्ति मिलती है इसलिए जीभ को अच्छे कामों में ही काम लेना चाहिए।

तो भई जीभ का मुख्य काम है भगवान का नाम रटना, गहराई से देखें तो ज़बान ही से मोक्ष के दरवाज़े खुले मिलते हैं। मेरा तो कहना है जीभ सम्भालकर बात करना ही ठीक होता है। कई बार ऐसी स्थति हो जाती है कि होंठों के बीच जीभ आ जाती है। कोई अशुभ बोलता है तो कुछ लोग कहते हैं तेरी ज़बान कलजीबी है। थारी ज़बान में केर रो कांटों। यह सब अशुभ बोलने पर कहते हैं।

शुभ बोलने पर ख़ुश होकर कहा जाता है "थारे मुँह में घी शक्कर" तो फिर शुभ ही शुभ बोलो ना। मुँह में घी शक्कर राखो। सदा शुभ.....शुभ बोलो....तो सदा मुँह में घी शक्कर...। लेकिन जनाब अब तो शक्कर की जगह नमक रखते है शुगर बढ़ने का भी डर जो है।


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