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09.24.2007
 
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
’ज़ौक़’ मोहम्मद इब्राहिम

 

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

 

तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जाएँगे

 

हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्क़ि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे

 

आग दोज़ख़ की भी हो जाएगी पानी पानी
जब ये आसी अर्क़-ए-शर्म से तर जाएँगे

दोज़ख़=नर्क; आसी=पापी; अर्क़=पसीना

शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ
पर मुझे डर है, कि वो देख कर डर जाएँगे

 

लाए जो मस्त हैं तुरबत पे गुलाबी आँखें
और अगर कुछ नहीं, दे फूल तो धर जाएँगे

 

नहीं पाएगा निशां कोई हमारा हरगिज़
हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे

रविश-ए-तीर-ए-नज़र=आँख का तीर या उड़ती नज़र

पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक हम क्यूँ कर
पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जाएँगे

 

ज़ौक़जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्लाह
उनको मैख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे



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