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09.24.2007
 
जीते रहने की सज़ा से ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी
ज़का सिद्दीक़ी

 

जीते रहने की सज़ा से ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी
अब तो मरने की दुआ दे ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी

 

मैं तो अब उक्‍ता गया हूँ क्या यही है क़ायनात
बस ये आईना हटा दे ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी

 

ढूँढने निकला था तुझको और ख़ुद को खो दिया
तू ही अब मेरा पता दे ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी

 

या मुझे एहसास की इस क़ैद से कर दे रिहा
वरना दीवान बनादे ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी



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