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09.04.2007
 
क्या उम्मीद करें उनसे जिन को वफ़ा मालूम नहीं
ज़फ़र गोरखपुरी


क्या उम्मीद करें उनसे जिन को वफ़ा मालूम नहीं
ग़म देना मालूम है लेकिन ग़म की दवा मालूम नहीं

जिन की गली में उम्र गंवा दी जीवन भर हैरान रहे
पास भी आके पास न आए जान के भी अन्जान रहे
कौन सी आख़िर की थी हमने ऐसी ख़ता मालूम नहीं

ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं

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