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09.04.2007
 
दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में
ज़फ़र गोरखपुरी

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में

ग़म थका हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा
कुछ दिनों के लिए ठहरा है मेरे कमरे में

सुबह तक देखना अफ़साना बना डालेगा
तुझको एक शख्स ने देखा है मेरे कमरे में

दर-ब-दर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
हाँ मगर रात को रहता है मेरे कमरे में

चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं ‘ज़फ़र‘
क्या कोई और भी कमरा है मेरे कमरे में

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