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ISSN 2292-9754

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04.27.2015


आदिवासी कविता : स्वयं को तलाशती स्त्री

अपनी ऊर्जा और शक्ति के बल पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती आदिवासी स्त्री की सच्चाई साहित्य के माध्यम से समाज के समक्ष रखने का यथार्थ कार्य जागरूक साहित्यकारों की क़लम के माध्यम से ज़ारी है। जंगलों में बसी निरक्षर आदिवासी स्त्री कभी विस्थापन की त्रासदी सहती है तो कभी पूँजीपतियों, ठेकेदारों और अपने समाज की कुप्रथाएँ उसका दोहन करती हैं। अगर आज तक के इतिहास पर नज़र दौड़ाई जाए तो महाभारत काल से ही इनका शोषण किया जाता रहा है। आदिवासी कन्याओं को ब्याहकर रनिवास में रख लिया गया किन्तु, समाज में सम्मिलित नहीं किया। आज भी जंगल के ठेकदार इन औरतों का शोषण करते हैं। पुरुष की सोच में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उसके लिए औरत महानगर की हो अथवा ग्रामीण, वह पढ़ी-लिखी जागरुक हो अथवा अपनढ़, स्त्री को कभी नागरिक नहीं माना गया। स्त्री को देह के साथ जोड़कर देखा जाता है। आज भारत में आदिवासी स्त्री के हित में किए गए आंदोलन भी इस स्थिति को बदल पाने में सक्षम नहीं है। हाल ही में प्रकाशित ’स्टेटस ऑफ वुमेन इन ट्राइबल अरुणाचल’ नामक रिपोर्ट में कहा है कि राज्य में आज भी आदिवासी बाल विवाह, बलात्कार, घरेलू हिंसा, बहुविवाह, पैतृक सम्पत्ति में अधिकार नहीं मिलना जैसे मामले सामने आ रहे है। उड़ीसा में तो भूख, लाचारी और आर्थिक संकट के समय आदिवासी अपनी औरतों को या तो बेच देते या गिरवी रख देते हैं। झारखण्ड में डायन बताकर आदिवासी स्त्रियों की हत्या का सिलसिला बेरोकटोक ज़ारी है। भारत ही क्या अमेरीका में रेड इंडियन आदिवासी महिला यदि बेवफ़ा है तो उस पत्नी को पानी में डुबाकर मार दिया जाता है। भारत के वनकर्मियों तथा पुलिसवालों तक इन औरतों का श्रमिक, दैहिक एवं यौनिक शोषण करते आये है। ऐसे समय में नारी समस्या को सर्वहारा नज़रिये से देखने वाला क्रान्तिकारी रचनाकार उसके शोषण के प्रति गहरी घृणा पैदा कर साहित्य के माध्यम से जागरण का कार्य कर रहे हैं।

एक संताल आदिवासी परिवार में जन्मी निर्मला पुतुल इस आदिवासी स्त्री के प्रति एकाग्रचित भाव से खड़ी है। जिसके मन की गहराइयों को भारत के महानगरों में रहने वाला कवि ज़ुबान नहीं दे सकता। उनकी कविता आपबीती की भाषा है, स्त्री विमर्श की नयी परिभाषा है। आपने आदिवासी स्त्रियों की आत्मा को भावनात्मक श्रम के साथ उनके उपेक्षित हृदयों को और उसमें सुलगते प्रश्नों को शब्दों के माध्यम से वाणी देने का प्रयत्न किया है। जी तोड़ मेहनत कर अपना घर चलाती आदिवासी स्त्री अपने हक़ की बात नहीं कर सकती क्योंकि हक़ जताना सिर्फ़ पुरुषों का अधिकार है। कवयित्री जानती है इसलिए कहती है -

"हक़ की बात न करो मेरी बहन
मत माँगो पिता की सम्पत्ति पर अधिकार
ज़िक्र मत करो पत्थरों और जंगलों की अवैध कटाई का
सूदखोरों और ग्रामीण डॉक्टरों के लूट की चर्चा न करो बहन
भरी पंचायत में डायन क़रार कर दण्डित की जाओगी।"1

रमणिका गुप्ता आदिवासियों की आर्थिक स्थिति का विवेचन करते हुए लिखती हैं, "जंगल माफ़िया कीमती पेड़ उससे सस्ते दामों पर खरीदकर, ऊँचे दामों पर बेचता है और करोड़पती बन जाता है। पेड़ काटने के आरोप में आदिवासी दंड भरता है या जेल जाता है। सरकार की ऐसी ही नीतियों के कारण आदिवासी ज़मीन के मालिक बनने के बजाए पहले मज़दूर बने फिर बंधुआ मज़दूर।"2 कई बार तो यह होता है कि कई सामाजिक संस्थाएँ जो आदिवासी समाज के हित में कार्य करती हैं उनकी नियत में भी खोट होती है। समाज सेवा करने निकले समाजसेवी कुछ ग्रामीण भागों में कार्य करने वाले अफ़सर, ठेकेदार, बिचौलिये आदिवासी स्त्री का शोषण करने से नहीं चूकते। आदिवासी स्त्री भोग्या बन कर रह गई है। निरक्षरता, डर तथा इनके भोलेपन का फ़ायदा उठाते जंगल के सिपाही तथा इनके ठेकेदारों के लिए वाहरु सोनवणे लिखते है -

"एक ऐसी चीज़
जिसे घाट में, बाट में
जहाँ मिले थाम लो
जब जी चाहे अंग लगा लो
पूरी हवस तो त्याग दो
न चीख न पुकार।"3

१३ जनवरी २०१२ की घटना जारवा आदिवासी महिलाओं को विदेशी पर्यटकों के सम्मुख नाचने के लिए मजबूर किया गया तथा उनकी अर्धनग्न तस्वीरें इंटरनेट पर अपलोड की गईं। व्यापारी आदिवासी लड़कियों को बहला फुसलाकर भगा ले जाते हैं और उन्हें देह व्यापार हेतु झोंक दिया जाता है। आमतौर पर नाबालिग़ तथा ग़रीब परिवारों की लड़कियों को अपना शिकार बनाकर तस्कर सम्पन्न राज्यों में बेच देते हैं। झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल जैसे पिछड़े राज्यों की गरीब लड़कियाँ गाय-बैल से भी कम क़ीमत पर बिक जाती है। "सरकारी और गैर-सरकारी सूत्रों के मुताबिक हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में ग़रीब ख़ासकर आदिवासी लड़कियों की कीमत ५ हज़ार से १५ हज़ार रुपये तक है।"4 ऐसे दोहनकर्ताओं के विरुद्ध अपने विद्रोही विचारों का बेलौस और बेबाक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

"ये वे लोग है जो दिन के उजाले में
मिलने से कतराते
और रात के अँधेरे में
मिलने का माँगते है आमन्त्रण
ये वे लोग हैं
जो हमारे बिस्तर पर करते हैं
हमारी बस्ती का बलात्कार
और हमारी ही ज़मीन पर खडे हो
पूछते हैं हमसे हमारी औक़ात।"5

स्त्री की सामाजिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक स्थिति का सजीव वर्णन भी आदिवासी कविताओं के माध्यम से हमें देखने को मिलता है। रोटी इन आदिवासियों के लिए शायद पहला और आखरी प्रश्न है और हमारे देश में तो भूखे लोगों को दिल्ली से यह कह कर दिलासा दिया जाता है - ’भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ’। आज पुरुषों की तुलना में स्त्री को कम मज़दूरी दी जाती है। हल जोतने से फ़सल काटने तक का कार्य आदिवासी स्त्री करती है। पत्तल बनाना, झाड़ू बनाना, चटाई बुनना, तेंदुपत्ता, महुआ चुनना उनका जीवन रोटी की खोज में भागता नज़र आता है। इसीलिए ग्रेस कुजूर ’क़लम को तीर होने दो’ कविता में लिखती हैं -

"ईटों के भट्टों में / सीझ गई ज़िंदगी
रोटी की खोज में कहाँ नहीं भागी।"6

गांधीजी ने कहा भारत गाँवों का देश है। उसकी सभ्यता गाँवों और जंगलों में विकसित हुई है। आज प्राकृतिक संसाधनों पर से आदिवासियों के मालिकाना हक़ समाप्त करने में हम लगे हैं। गैट समझौता, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नीति, पेटेंट जैसे क़ानूनी अधिकार इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासियों को ग़ुलाम बनाने का कार्य कर रहे हैं।

"अब तक अमेरिका और जापान द्वारा नीम के आठ उत्पादों पर पेटेंट का अधिकार प्राप्त कर लिया गया है। यदि भविष्य में अन्य औषधीय पौधों जिनके प्रयोग एवं इलाज पर अब तक आदिवासियों का नियंत्रण समाप्त हो जाएगा।"७ आदिवासियों को शोषण, भ्रष्टाचार, विस्थापन, पलायन और बेरोज़गारी ने जकड़ रखा है। आदिवासी महिलाएँ पलाश के पत्तो से पत्तले, झाड़ू बनाकर अपना जीवन निर्वाह करती थी। आज तो प्लास्टिक युग है। हम उनका यह रोज़गार भी छीन रहे हैं। आकर्षक दिखने वाली प्लास्टिक की झाड़ू, दोने तथा थरमाकोल की पत्तले हमारे सम्मुख हैं। इसीलिए निर्मला पुतुल ’बहामुनी’ कविता में आदिवासी स्त्री की भूख और आर्थिक विवशता का चित्रण करते हुए लिखती हैं -

"तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते है पेट हज़ारों
पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट
कैसी विडम्बना है कि
ज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाइयाँ
और पंखा बनाते टपकता है
तुम्हारे करियारे देह से टप... टप... पसीना।"8

आज भी हिन्दुस्तान के अन्दर पूर्ण लोकतंत्र नहीं है। आदिवासी जब अपनी समस्याओं को लेकर लोकसभा तथा विधानसभा तक पहुँचते हैं तो उनके साथ बर्बरता का व्यवहार किया जाता है। वर्ष २००२ में नागपुर में आदिवासी मोर्चा अपने अधिकारों की माँग के लिए निकाला गया। इस शांति से निकाले जानेवाले मोर्चे पर लाठी प्रहार किया गया। भीड़ तितर-बीतर हो गई मीडिया के चित्रांकन से मोर्चे के पश्चात बिखरे सामान में कुछ पोटलियों में सूखी रोटी और मिर्ची थी इसके अलावा कुछ नहीं। ऐसे ही मोर्चे पर भाष्य करती है डॉ. भगवान गव्हाडे की ’आदिवासी मोर्चा’ कविता -

"संसद भवन के प्रांगण में,
जब पहुँच गया मोर्चा।
बरस पड़ी पुलिस कर्मियों की अनगिनत लाठियाँ,
जैसे झेली थी सीने में पूर्वजों ने अंग्रेज़ों की गोलियाँ
तितर-बितर हो गई भीड़
भागने लगी हमारी बहूँ-बेटियाँ
जैसे भगाई जाती हैं जंगल से मुर्गी, भेड़, बकरियाँ।"9

आदिवासी लेखन जीवन का लेखन है यह कल्पना और मनोरंजन का क़िस्सा नहीं है और न ही आदिवासी औरतें नुमाईश की वस्तु है। वे दर्द सहने की आदी है उनका जीवन कठोर संघर्ष की गाथा कहता है किन्तु मुक्ति की बैचेनी तो उनमें भी है। इनकी निगाहें अब उन लोगों को पहचानने लगी हैं जो आदिवासी स्त्रियों को वस्तु मानते आए हैं और आदिवासी समाज को सस्ता मज़दूर बनाकर उनकी संस्कृति, भाषा, जल, जंगल, ज़मीन को हथिया कर उन्हें पलायन के लिए मजबूर करते हैं। आज भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद की इस अंधी दौड़ में हम अपने देश के मूल निवासियों को इज़्ज़तदार ज़िंदगी नहीं दे सकते तो हमारी इक्कीसवीं सदीं की हर प्रगति बेकार है। जब तक हम इस देश की जननी को वेश्या बनानेवाली मनोवृत्ति को नहीं बदल पाएँगे। सामूहिक बलात्कार जैसी घटनाओं को नहीं रोक पाएँगे और स्त्री प्रताड़ना का यह दौर इस देश में नहीं थमेगा, हमारी चाँद पर पहुँच बेकार है।

संदर्भ :

1. नागडे की तरह बजते शब्द - निर्मला पुतुल, पृ. २४
2.आदिवासी विकास से विस्थापन - रमणिका गुप्ता, पृ. १२
3. पहाड़ हिलने लगा है - वहारु सोनवणे, पृ. १९
4. मुझे जन्म दो माँ - संतोष श्रीवास्तव, पृ. १०१
5. नागड़े की तरह बजते शब्द - निर्मला पुतुल, पृ. ५४
6. आदिवासी स्वर और शताब्दी - सं. रमणिका गुप्ता, पृ. २६
7. आदिवासी विकास से विस्थापन - रमणिका गुप्ता, पृ. ४७
8. नागड़े की तरह बजते शब्द - निर्मला पुतुल, पृ. १२
9. दलित अस्मिता - सं. विमल थोरात, २४

डॉ. विशाला शर्मा
चेतना कला वरिष्ठ महाविद्यालय,
सिडको, औरंगाबाद
मो. ९४२२७३४०३५
ई मेल vishalasharma22@gmail.com


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