अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख पृष्ठ
04.29.2012

वर्तमान सम्बन्धों के विघटन का जीवंत यथार्थ
डॉ. कश्मीरी देवी

पुस्तक : मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदीMohan Rakesh kee Rachnaon cover
लेखक : डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक : लोक कल्याण संस्थान
1760, नया रामनगर, उरई (जालौन) 285001
मूल्य : रु. 250.00

वस्तुतः अतीत सदैव वर्तमान पर अपने प्रहार करता रहता है। यह तो उस व्यक्ति-विशेष पर आधारित होता है कि वह कितना उसे सह पाता है या प्रेरणा लेकर भविष्य का वाङ्मय रचता है। परम्परा से चली आ रही विकृतियों को समकालीन नज़रिये से अवलोकन करने का जो वैचारिक औदार्य एवं सैद्धान्तिक अडिगता डॉ. वीरेन्द्र यादव के साहित्य में है। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सद्यः प्रकाशित पुस्तक मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी में वर्तमान समय की पारिवारिक विसंगतियों का जीवन्त वर्णन किया गया है। चार अध्यायों में विभाजित मोहन राकेश की सभी रचनाओं, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं संस्मरणों को युवा विद्वान लेखन ने आधुनिक नज़रिये से रेखांकित करने की कोशिश की है। आपका मोहन राकेश के बारे में मानना है कि मोहन राकेश की रचनाओं में परिवार का परम्परागत ढाँचा छिन्न-भिन्न सा हो गया है। स्त्री-पुरुष का निजीपन मानों आज की भीड़ में (विशेषकर महानगरों में) कहीं खो सा गया है उसे सबके बीच में जीते-जीते भी उफ, उदासी और आत्मीयहीन अपरिचय के साथ जीना पड़ रहा है। वर्तमान की वास्तविकता भी यही है कि आज स्त्री-पुरुष अपने जीवन में कई समस्याओं के बीच फंस गये हैं। दोनों मन ही मन कई समस्याओं में उलझे हुए है। कल्पनाएँ यथार्थ के ताप में जलकर झुलस गई हैं, विवाह हुआ पर नौकरी नहीं, नौकरी मिली तो सन्तोषप्रद नहीं और जीवन की इच्छापूर्ण बन सके इतनी आय वाली नहीं, बोझ ढोते चल रहे हों वैसा महसूस होता है। पुरुष-पत्नी की खोज में भीतर ही घुलता जा रहा है, स्त्री भी बार-बार सहते-सहते विद्रोही तेवर अख़्तियार करने पर उतारू हो गई है। दोनों का मनद्विधाग्रस्त हो गया है अतीत इससे अच्छा था, वे अतीत में जाना चाहते हैं वे बहुत कुछ सोचतें हैं पर कुछ कर नहीं सकतें हैं आखिर विवश भाव से सभी परिस्थितियों को आज के दम्पत्ति झेल रहें हैं किसी के जीवन में आनन्द नहीं, उत्साह नहीं बस है तो टूटन, विवशता, ऊब तथा निराशा, जिसमें वह मन ही मन डूबता-उतराता रहता है स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों की यह स्थिति और पूरी कचोट भरी वेदना के साथ आज की रचनाओं में आकार पा रही है। जीवन की विसंगतियों से उपजा यह पीड़ा बोध न केवल मोहन राकेश की रचनाओं का विषय है वरन् समूची पीढ़ी द्वारा चित्रित कथा साहित्य का अनिवार्य सोपान भी हैं। आचार्य तुलसी ने लिखा है कि – "लेखनी और वाणी ये दो बड़ी शक्तियाँ हैं जिनके द्वारा व्यक्ति-लोक जीवन में प्रवेश करता है, उस पर प्रभाव छोड़ता है और उस युग की सभ्यता एवं संस्कृति को अपने अस्तित्व से अनुप्राणित कर देता है। लेखनी और वाणी दोनों बहनें हैं, दोनों का अपने-अपने स्थान पर पूरा मूल्य है क्योंकि उसके कंधे पर सवार होकर ही मनुष्य का चिंतन सम्पादित होता है।" और ये दोनों बहनें डॉ. वीरेन्द्र यादव जैसे योग्य पात्र के साथ संयुक्त होकर कृत-कृत्य हैं।

लेखक का मानना है कि मोहन राकेश समकालीन कथाकारों में अन्यतम हैं। आपने हिन्दी कथा को आडम्बर, कृत्रिमता, सस्ती भावुकता और जुमले से अलग करके एक आत्मीय रिश्ता प्रदान किया। यही कारण है कि मोहन राकेश के कथा साहित्य में संवेदना की आधुनिकता है, अनुभव का खरापन है और सम्प्रेषण का यथार्थ आधार है। मोहन राकेश की रचनाओं विशेषकर कहानी, उपन्यास और नाटकों में अधिकतर पारिवारिक विघटन के बीच आर्थिक सम्बन्धों की त्रासदी के अनेक कारण स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते है, जिनमें व्यक्तिगत सम्बन्धों का अहम, आर्थिक कारण, मानवीयता एवं मूल्यों के पतन के कारण, समकालीन भ्रष्टाचार के साथ विभाजन की त्रासदी के कारण भी पारिवारिक सम्बन्धों में खटास उत्पन्न हो रही है। पारिवारिक विघटन की प्रमुख रचनाओं में एक और ज़िन्दगी, गुंझल, सुहागिनें (कहानी) अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल, अन्तराल (उपन्यास) तथा नाटकों में आधे-अधूरे, आषाढ़ का एक दिन एवं लहरों के राजहंस में विशेष रूप से देखने को मिलता है। यहाँ पुस्तक के अवलोकन से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान युग जीवन में टूटते मानवीय सम्बन्धों और मूल्यों के फलस्वरूप व्यक्ति के आन्तरिक विघटन के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को भी स्वर देने का प्रयत्न किया गया है जो वर्तमान परिवेश की विसंगतियों से उद्भूत युग सत्य है।

डॉ. वीरेन्द्र यादव प्रस्तुत पुस्तक में यह स्पष्ट करते हैं कि मोहन राकेश के उपन्यास और कहानी का सफ़र सचमुच डिप्रेसिंग है, क्योंकि लेखक जो प्रश्न उठाता है, उसका उत्तर दुनिया से नहीं अपने आपसे माँगना होता है और इस मुकाम पर हम अपने ही सामने निर्वस्त्र होने को विवश होते हैं, वरना उन समस्याओं का अवसर मिल ही नहीं सकता है। मानवीय सम्बन्धों को एक नयी दृष्टि और हृदय की अटल गहराई को कुरेदने वाले राकेश जी ने ज़िंदगी भर मानवीय सम्बन्धों पर विचार किया क्योंकि उनकी मान्यताएँ पुरानी लीक छोड़कर समाज को देखने की एक नवीन दृष्टि रखती थी। प्रस्तुत पुस्तक शोधार्थियों, अध्येयताओं एवं प्राध्यापकों के लिये उपयोगी होगी ऐसा मेरा मानना है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें