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03.22.2008
 
खेतों कुओं पै वादों के खम्बे गड़े रहे
वीरेन्द्र जैन

खेतों कुओं पै वादों के खम्बे गड़े रहे
बिजली न आई खेत तो सूखे पड़े रहे

नारों न गालियों का कहीं कुछ असर हुआ
सत्ता का तेल पी के वे चिकने घड़े रहे

लिख के तो लाये थे मगर खत दे नहीं सके
जब तक रहा मैं पास में बच्चे खड़े रहे

ना आये वे तो दिल ने लगातार बात की
वो आ गये तो होंठ पै ताले पड़े रहे

रोजी मिली न रोटियाँ, घर भी उजड़ गया
अखबार में उपलब्धियों के आँकड़े रहे

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