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ISSN 2292-9754

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03.29.2017


हम तुमसे ख़ुश हुये...

कथा सार:

राजा सभा में भाषण देने के लिये आता है। लेकिन प्रजा अनुपस्थित है मंत्री राजा को बताता है कि प्रजा को किसी ने भड़का दिया है इसलिये वो आपका भाषण सुनने नहीं आई। राजा अत्यन्ध क्रोधित होकर भड़काने वाले को पकड़ने का आदेश देता है। इस पर मंत्री राजा को समझाता है कि अन्ततः राज्य तो प्रजा के आम आदमियों पर किया जाता है इसलिये "आम आदमी" को ही पकड़ना चाहिये, भड़काने वाले के चक्कर में पड़ना ठीक नहीं हैं राजा आम आदमी को पकड़ने का आदेश देता है। सिपाही जिसे पकड़ कर लाता है वो बार-बार गिड़गिड़ा कर कहता है कि वो "आम आदमी नहीं है वो ग़रीब आदमी है वो पुश्त दर पुश्त ग़रीब है। राजा सिपाहियों को फटकारता है कि उन्होंने आम आदमी के स्थान पर ग़रीब आदमी को कोई पकड़ा? सिपाही डर का बताता है कि आम आदमी को पकड़ने के लिए जो चित्र दिया गया था, वो इससे मिल गया, इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। राजा चौंक कर पूछता है, "ऐं! ये चित्र कहाँ से आया?"

"उसे चित्रकार ने बनाया सरकार," मंत्री उत्तर देता है।

"तो फिर उसने ऐसा चित्र क्यों बनाया कि आम आदमी का चित्र ग़रीब आदमी से मिल गया?" राजा आवेश में आकर तुरंत पकड़ने का आदेश देता है। चित्रकार दरबार में उपस्थित होकर राजा को बताता है कि जो कहानी लेखक ने लिखी थी, उसके आधार पर ऐसा ही चित्र बनता था। इसमें उसका कोई दोष नहीं। लेखक को दरबार में बुलाया जाता हैं। राजा उससे पूछता है कि ऐसी कहानी क्यों लिखी की "आम आदमी" का चित्र "ग़रीब आदमी" से मिल गया? लेखक राजा को आम आदमी का कहानी सुनाता है और बताता है कि नेता जी ने जो भाषण दिया था उससे यही कहानी बनती थी, यदि आम आदमी का चित्र का ग़रीब आदमी से मिल गया तो मैं क्या करूँ? नेता दरबार में विद्राही के रूप में उपस्थित होता है, उससे पता चलता है कि दरअसल सेठ ने उससे लालच देकर ऐसा भाषण देने के लिए उकसाया था। राजा इन सबके चक्रव्यूह में उलझ जाता है और अंत में उसे “आम आदमी” के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं।

अँधेर नगरी की शैली पर आधारित ये हास्य-व्यंग्य नाटक समाज के विभिन्न पात्रों के माध्यम से "आम आदमी" के स्वरूप को अन्वेषित करने का प्रयास कर सामाजिक विसंगितयों को उजागर करता है। कथा वस्तु की संप्रेषणीयता उत्प्रेरित करने हेतु नाटकीय तत्वों समावेश का यथा संभव का प्रयास किया गया है।

पात्र:

1. ........ राजा
2. ........ मंत्री
3. ........ सिपाही
4. ........ चोबदार
5. ........ चित्रकार
6. ........ लेखक
7. ........ सेठ
8. ........ नेता और
9. ........ ग़रीब आदमी

हम तुमसे ख़ुश हुये...

(पर्दा खुलने पर पूरे मंच पर प्रकाश। मंच पर बीचों-बीच में किसी नेता द्वारा भाषण दिये जाने वाला मंचान बना है। लाउड स्पीकर, झण्डियाँ, गुब्बारे, माइक आदि लगे हैं। पार्श्व में बिगुल बजता है। कुछ समय बाद मंच पर एक दरबान का प्रवेश जिसकी वेशभूषा सुरक्षा गार्ड तथा मिल्ट्री के बैंड मास्टर का मिला जुला रूप है बिगुल, सीटी आदि उसके गले में लटके हुए हैं और साथ में डुलाने के लिए चंवर भी है। दरबान मंच पर आकर बिगुल बजाकर ऐलान करता है)
दरबानः  होशियार समझदार ... ख़बरदार...र...ऐ देशवासियों सुनो ऐ प्रजानन सुनो आम आदमी सुनो, बहरे, देखे, अंधे, सुनें। प्रजापालक, देशरक्षक, समाजसेवक, महाराजाधिराज की सवारी पधार रही है...!...! (बिगुल बजता है)
(विंग में बजती एक विचित्र बैंड की धुन जो अनाथालय/ सेना के मिश्रित बैंड सी लगे, के साथ राजा की सवारी आती है, राजा वेशभूषा से नर्तक जैसे लगते हैं। उनके वस्त्र आवश्यकता के बड़े और बेढंगे से है, सिर पर मुकुट/ साफा है, जिस पर मुर्गों की तरह रंग-बिरंगी कलगी लगी है। सीने पर किसी जादूगर और मिलटरी के अफसर कि तरह के तमगे लटक रहे हैं जिसमें टिन के ढक्कन छोटे डिब्बे हैं।
चिड़ियों या अन्य जानवरों की आकृति है राजा की चाल विचित्र है, चलते समय राजा दो क़दम आगे आते हैं और एक क़दम पीछे। इसी तरह के चलकर वो पहले के सामने के मचान पर चढ़ने का प्रयास करते हैं, पर असफल होने पर पीछे जाकर धम्म से मचान पर पहूँच जाते हैं, उसके साथ में आने वाले मंत्री, सिपाही और चोबदार की भी वही चाल है। चोबदार राजा को मचान पर रखी एक झूलेनुमा कुर्सी पर बैठने का संकेत करते हुए)
चोबदार : (हकलाते हुए) ... इस ...पर कुर्सी पर पधारिये महाराज।
राजा : (घबड़ाकर मचान से नीचे उतर आते हैं) क्या कहा?....पर कुर्सी पर पधारिये।
मंत्री : नहीं महाराज! इस कुर्सी पर, अपनी कुर्सी पर, आप पधारिये महाराज
राजा : (सहज होकर) अच्छा .....! तो फिर इसने मेरी कुर्सी को "पर" कुर्सी क्यों कहा? ....क्या ... मैं दूसरे की कुर्सी पर बैठता हूँ?
मंत्री : अरे नहीं महाराज! इस कुर्सी पर भला कहाँ बैठते हैं? बल्कि दूसरे ही आपके कुर्सी पर बैठना चाहते हैं।
राजा : (संतुष्ट होकर) ...हाँ ....हाँ ... तुम ठीक कहते हुए मंत्री... इस नालायक ने मुझे डराया क्यों मंत्री? इसे - इसे सौ कोड़े लगें। फो ...फो...(मुँह से जैसे फुफकारता है)
मंत्री : (राजा के कान में फुसफुसाते हुए)... नहीं महाराज चुनाव का वक़्त है, अभी किसी को नाराज़ करना ठीक नहीं है।
राजा : (ज़ोर-ज़ोर से सर हिलाकर) .....हूँ ...हूँ...
मंत्री :  हाँ महाराज! जनता की तरह कुर्सी किसी की नहीं होती है। जो जीत ले वो उसी की हो जाती हैं। ये चुनाव जीत लीजिए तब देखा जाए।
राजा :  (प्रसन्न होकर) ... अच्छा ... हे ....हे...तुम बिल्कुल ठीक कहते हो ...मैं ख़ुश हुआ ...ख़ुश .... ख़ुश ...! ...हें ....हें। हाँ .....हाँ.. ...ठीक कहते हो मंत्री, इसका महँगाई भत्ता बढ़ा दो, और मैं तुम्हारी तरक्की करता हूँ, मंत्री से तुम्हें मुख्यमंत्री बनाता हूँ।
मंत्री : आप बड़े उदार हैं महाराज! महाराज की जय हो।
(फिर राजा अपनी चाल से मचान पर चढ़ते हैं कुर्सी के चारों ओेर घूमते हैं। उसे ललचाई नज़रों से देखते हैं और फिर झपटा मार कर बैठ जाते हैं। कुर्सी को हाथ फँसा कर ज़ोर से पकड़ लेते हैं। सब उनके बैठने को कौतूहल से देखते हैं। चोबदार पीछे चंवर डुलाने लगता है)
राजा : (अपने चारों ओर देखते हुए) ... मंत्री!
मंत्री : जी महाराज!
राजा : (घबराते हुए) ये मैं क्या देख रहा हूँ?
मंत्री : (मंत्री, जिस तरफ़ राजा देखता है उसी दिशा में देखने का प्रयास करता है तथा अन्य दरबारी विभिन्न दिशाओं में देखते हुए) क्या महाराज?
राजा : जिधर देखता हूँ...कुछ दिखाई नहीं देता, जिधर कान फेंकता हूँ... कुछ सुनाई नहीं देता, हमारी प्रजा कहाँ है? हमसे कोई मिलने नहीं आया? इन सबका मन कहाँ रमाया?
मंत्री : नहीं मालूम महाराज। लगता है कि वो आपका राज्य छोड़कर कहीं चली गयी है?
राजा : (डाँटकर) मंत्री! क्या बकते हो? क्या तुमने मेरे आने का ऐलान नहीं करवाया था?
मेरे आने का फ़रमान नहीं सुनाया था?
मंत्री : सुनाया था महाराज! लेकिन उन्होंने उसे अनसुना कर दिया लगता है, एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दिया, महाराज।
राजा : (ग़ुस्से से) क्या? एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दिया?
मंत्री : जी महाराज।
राजा : तो ऐसा करो कि तुम सबका दूसरा वाला कान कटवा लो, उनका कैप्सूल बनाकर मेरे किले में दफ़ना दो फों... फों.....
मंत्री : ऊं हूँ .... हूँ.... हूँ ..... ऐसा ना करें महाराज।
राजा : क्यों?
मंत्री : कल का कोई भरोसा नहीं महाराज। उनमें फिर कल्ले फूट सकते हैं, वो हमारा किला लूट सकते हैं।
राजा : (डरकर सोचते हुए) ...तो फिर क्या किया जाये? ...इन्हें कैसे बहकाया जाये ... क्या मैं बिना भाषण दिये लौट जाऊॅं (पेट पकड़ते हुये। जैसे अपच हो रहा है, हिचकी उल्टी सी आने लगती है, वो...ओ...ओ... जैसे आवाजें निकालने लगते हैं)
मंत्री : (घबराकर) क्या हुआ महाराज?
राजा : (दुखी होकर) उल्टी सी मुझको आई।
अभी तक किसी ने न दी मेरी दुहाई॥
मंत्री : आप धैर्य रखें महाराज। मैंने हल ढूँढ लिया है, सबको हाँकने का राज़ मैंने जान लिया है।
राजा : (प्रसन्नता से उछलकर) अच्छा? ....तो ...तो...
जल्दी बतलाओ उनका राज़,
अभी करता हूँ उनका इलाज।
मंत्री : महाराज! सबके कान कटवाने की बजाय उनमें तेल डलवा दिया जाये और फिर उन्हें सिपाहियों के ज़रिये मलवा दिया जाय।
राजा : (अत्यंत प्रसन्न होकर कुर्सी के ऊपर पैर रख लेता है। रुक ...रुक कर हँसता है... हैं... है...ठीक बिल्कुल ठीक तुम बहुत समझदार हो मंत्री।
(मंत्री सिर झुकाकर अपनी समझदारी स्वीकार करता है)
राजा : ऐसा करो लातों का तेल, बातों का तेल, मिट्टी का तेल, पत्थर का तेल, सुअर का तेल, हवा का तेल, पानी का तेल, तेल का तेल, जो भी ख़ज़ाने में हो डलवा दो मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ।
मंत्री : जो आज्ञा महाराज।
राजा : हम तुमसे (हँस के दिखाता है...) है....है....हुये, बोलो क्या माँगते हो?
मंत्री : हुज़ूर मेरा एक साला बिल्कुल बेकार है, महाराज।
राजा : अच्छा! मैं तुम्हारे साले को (सोचकर एक़दम से) मैं अपना राजदूत बनाता हूँ।
मंत्री : आप बड़े दयालु हैं महाराज। महाराज की जय हो...
राजा : (हाँफते हुए) भाषण की हिलोरें मेरे अन्दर उठ रही हैं, मेरे शरीर में ऐठन हो रही है।
मंत्री : धैर्य रखें महाराज सब ठीक हो जायेगा। दरअसल किसी ने लोगों को आपके ख़िलाफ़ भड़का दिया है, आपसे नफ़रत करने का तड़का दिया है।
राजा : (ग़ुस्से से) बन्द करो ये बकवास, मेरे रहते हुये मुझसे कौन नफरत कर सकता है।
बताओ मुझे उनका नाम
करता हूँ, मैं उनका काम तमाम॥
...फों...फों...
मंत्री : (समझाते हुए) भड़काने वाले के चक्कर में न पड़ें हुज़ूर ...उससे राज्य में बड़ी गड़बड़ी हो जायेगी।
राजा : (डरकर हकलाते हुए) .... गड़बड़ी? कैसे गड़बडी?
मंत्री : कुछ भी हो सकता है महाराज, वो अपनी कुर्सी हिला सकते हैं, गिरा सकते हैं, पलट सकते हैं... उलट-पलट या पलट-उलट कुछ भी कर सकते हैं।
राजा : (घबराकर अपनी कुर्सी पर फैलकर बैठने का प्रयास करते हैं तो गिरते-गिरते बच जाते हैं).... तो ....तो फिर क्या किया जाए मंत्री, लगाओ कोई जंत्री ...अफ़सोस, अफ़सोस, आह! आह!
मंत्री : महाराज दरअसल राज्य तो प्रजा के आम आदमी पर ही किया जाता है, इसीलिए आप भड़काने वालों के चक्कर में ना पड़ें।
राजा : (आश्चर्य से) तो फिर?
मंत्री : आप सीधे आम आदमी का ही इलाज कीजिये, हुज़ूर आपका कोई कुछ न बिगाड़ सकेगा....।
राजा : (ख़ुश होकर) अच्छा? ऐसा हे...हे ....हे (मंत्री चापलूसीपूर्वक राजा की हँसी में .... हँसी ....मिलाता है) मंत्री तुम बड़े चतुर, होशियार हो, हम तुमसे ख़ुश हुए .....ख़ुश.....ख़ुश... मैं तुम्हारे साले को अपना राजदूत बनाता हूँ।
मंत्री : आप वाकई बहुत दयालु हैं महाराज!
राजा : (सोचकर बड़बड़ाते हुए) लेकिन मंत्री ..... यह .... यह ... आम आदमी क्या होता है?
राजा : (परेशान होकर) हमने कई तरह के आदमी सुने थे। अमीर आदमी, ग़रीब आदमी, शरीफ़ आदमी, बदमाश आदमी, होशियार आदमी, बेवकूफ़ आदमी, तो फिर ये आम आदमी का बच्चा कहाँ से आ टपका?
मंत्री : (चापलूसी से) महाराज ये इन सब आदमियों की मिलावट से बना है। एक नई क़िस्म, समझें ग़रीब परवर।
राजा :  (ग़ुस्से से) अच्छा तो लाओ उनको मेरे पास। करता हूँ मैं इनका पर्दाफ़ाश! फो...फों...
मंत्री : जो आज्ञा महाराज। ... मैंने सब इंतज़ाम कर रखा है।
(ताली बजाता है सिपाही एक ग़रीब आदमी को पकड़कर लाता है। और उसे राजा के मंच के नीचे पटक दिया जाता है। ग़रीब, अंडरवियर बनियान में है सर/कंधे पर एक अच्छा गमछा है)
ग़रीब : दुहाई है महाराज, आपके चरणों की दुहाई है।
राजा : (चौंककर पैर खींच लेता है) ... ऐं? मंत्री! ऐं किसके चरणों को दुहने की बात कर रहा है? गाय चरण, भैंस चरण, बकरी चरण या सिंह चरण - किसी को दुहना चाहता है यह?
मंत्री : ये दूध दुहने वाली दुहाई नहीं महाराज। ये फ़रियादी वाली दुहाई चाहता हैं। ये न्याय माँगने आया है हुज़ूर।
राजा : अच्छा ... अच्छा न्याय! ऐं (चौंककर) कैसा न्याय? अपने खज़ाने में कुछ न्याय-व्याय बचा है क्या?
मंत्री : देखना होगा महाराज! ... कुछ न कुछ तो निकल ही आयेगा।
राजा : अच्छा.... अच्छा तो कुछ न कुछ न्याय दे दो। (ग़रीब को अजीब तरह से घूरते हुए) क्यूँ बे तू कौन है?
ग़रीब : (गिड़गिड़ाते हुए) दुहाई है महाराज! (ग़रीब मंच की तरफ़ बढ़ता है, राजा डर के मारे पैर ऊपर कुर्सी रख लेता है)
राजा :  (शंकित होकर) मंत्री!
(मंत्री ताली बजाकर सिपाही को बुलाता है। सिपाही ग़रीब को खींचकर मंच के नीचे पटक देता है)
सिपाही : चुप बे बदमाश!
राजा : (राहत पाकर प्रसन्न होता है, और फिर मंत्री से कान में पूछता है) कौन है ये?
मंत्री : महाराज यही है वो.... नमकहराम आम आदमी। आपकी बदनामी की जड़।
राजा : (नाराज़ होकर) क्यों रे आदमी के आम,
क्यों किया मुझे बदनाम?
अब अगर न किया तूने आराम,
तो कर दूँगा तेरा काम तमाम। ...फों...फों...
ग़रीब : (गिड़गिडाते हुए) मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा महाराज। मैं आम आदमी नहीं हूँ ... मैं ग़रीब आदमी हूँ ... मेरी जान बख्श दें माई बाप। मैं आपके हुज़ूर में नाक रगड़ता हूँ (बार-बार ज़ोर से नाक रगड़ता है) मैं ग़रीब आदमी हूँ, मेरी फेहरिस्त देख ली जाए हुज़ूर। पुस्त-दर-पुस्त ग़रीब हूँ .....मैं ग़रीब .....मेरे पुरखे ग़रीब ....मैं खानदानी ग़रीब हूँ।... (रोता है...चिल्लाता है...नाक रगड़ता जाता है)
राजा : (नाक रगड़ने की नकल की करते हुये मंत्री) यह ऐसे-ऐसे (अपनी नाक रगड़कर दिखाते हुए) ...क्या करता है।
मंत्री : इनसे नाक रगड़ना कहते हैं महाराज! आपके हुज़ूर में जो यह नहीं करता, उसकी यह (अपनी नाक पकड़ते हैं) काट ली जाती है।
राजा : (ग़रीब की नाक से खून बहता देख) ... अरे ....तो ... इसकी तो यह कट गई है (दयालु हो जाते हैं) मंत्री! इस बेचारे बेहूदे को छोड़ दिया जाये।
मंत्री : (चातुर्य से) अरे नहीं! महाराज, इसे रिहा मत कीजिये।
राजा : (डाँटकर) मंत्री!
मंत्री : जी महाराज।
राजा : राजा मैं हूँ कि तुम?
मंत्री : (घबराकर) आप ही है महाराज!
(चापलूसी से) जो आज्ञा महाराज ...! महाराज मैं ये कह रहा था, कि इस भले मानस के ऊपर तो किसी न किसी को शासन करना ही है, आप नहीं तो इसे कोई और पकड़ लेगा। आप इसके गिड़गिड़ाने पर ना जाइये। हुज़ूर यही तो असली जड़ है।
राजा : (सोचते हुए) हूँ। तो ये बात है!
मंत्री : जी महाराज
राजा : तो फिर....ले जाओ!
पिलाओ इसे जेल का पानी,
और रखो इस पर निगरानी।
दूसरा न कर पाये इस पर शासन,
नहीं तो ख़त्म हो जायेगा, मेरा राशन॥
फों... फों...
मंत्री : (चिल्लाकर) ...नहीं ..... नहीं ... महाराज मुझे ग़रीब का जान बख्श दे ...
(ग़रीब नाक पकड़े हुए घिसता है। सिपाही उसे खींचकर ले जाता है। राजा यह सब देखकर सोच में पड़ जाता है। अपनी नाक बार-बार छूता है। राजा को ग़रीब के गिड़गिड़ाने पर दया आ जाती है। उसे वो पुच्च-पुच्च कर पुचकारते हैं)
राजा : मंत्री इस आदमी को यहाँ पकड़ कर लाया कौन?
मंत्री : (सोचकर) सिपाही महाराज!
राजा : (नाराज़ होकर) सिपाही के बच्चे को बुलाओ
(सिपाही, द्वार पाल, मंत्री की ओर घबराकर देखते हैं)
मंत्री : (बचाने के लिए) सिपाही के कोई बच्चा नहीं है महाराज!
राजा : अच्छा? ...तो .... तो सिपाही को ही बुलाओ।
(मंत्री ताली बजाता है। सिपाही सहमा-सहमा सा प्रवेश करता है। महाराज के आगे सिर झुकाता है)
राजा : क्यों बे औलाद के बच्चे,
नमक हराम, अकल के कच्चे!
क्यों कि तूने इस ग़रीब से छेड़खानी?
बता नहीं तो याद करवा दूँगा तेरी नानी! ...फों ...फों...
सिपाही : गुस्ताखी माफ़ हो सरकार। इसमें मेरा कोई कुसूर नहीं, दरअसल इस मनहूस की शक़ल ही ऐसी है। आम आदमी की जो फोटो हमें पकड़ने के लिए दी गयी थी वो इससे मिल गयी। इसीलिये मुझे इसे पकड़ना पड़ा। मैं तो आपका सेवक हूँ सरकार, मुझ पर शक़ न करें।
राजा : (आश्चर्य से) ..... ऐं! ये फोटो-वोटो कहाँ से आयी?
मंत्री : उसे चित्रकार ने बनाया था सरकार।
राजा : अच्छा! तो सिपाही को माफ़ किया जाता है। चित्रकार को बुलाया जाये।
(सिपाही राजा की जय-जयकार करते हुए चला जाता है। मंत्री 5 ताली बजाकर सिपाही से चित्रकार का बुलाने का इशारा करता है)
सिपाही: (विंग में जाकर) चित्रकार दरबार में हाज़िर हो....
(चित्रकार का मंच पर प्रवेश। वो पैंट, कुर्ता पहने है। साथ में मदारी की तरह एक झोला, जिसमें बड़े ब्रश, कुछ रंग-बिरंगें कपड़े व टोपियों रखे हैं)
राजा : (चित्रकार को घूरते हुए) क्यों रे चि़त्रकार,
क्यों बनाया तूने आकार,
बंद कर यह प्रसार,
नहीं डलवा दूँगा तेरा अचार॥ ... फों... फों.....
चित्रकार: (घबराकर) ऐसा न करें महाराज। मेरा कोई कुसूर नहीं। दरअसल आजकल इतने लोग पैदा हो रहे हैं कि चाहे जैसी भी शक़ल बनाओे किसी न किसी से मिल ही जाती है। मैंने इसकी शक़ल जान बूझ कर नहीं बनाई, मेरी जान बक्श दें महाराज।
मंत्री : (चिढ़ाते हुए) ..... जान बक्श दें सरकार! अबे जब तुझे शक्लें मिलने का इतना ही डर था तो फिर तू आदमियों को छोड़कर और दूसरी चीज़ों के चित्र क्यों नहीं बनाता?
चित्रकार : (आश्चर्य से) आदमियों को छोड़कर ... और किसका ....चित्र बनाऊॅं
मंत्री : अरे नहीं- नाला है, फूल-पत्ती है, कुत्ता-बिल्ली है, गाय-भैंस है या फिर महाराज का फोटो बनाओ। तुम केवल आदमियों का ही चित्र क्यों बनाते हो?
चित्रकार : गुस्ताखी माफ़ हो महाराज। बात दरअसल ये है कि आदमियों का फोटू बनाना आसान पड़ता है।
राजा : (आश्चर्य से) ...आसान होता है?
चित्रकार : हाँ महाराज ..... सब आदमियों की बनावट में बहुत सी बातें आम होती हैं? बस थोड़ा बहुत ही फ़र्क होता है।
मंत्री : (नाराज़गी से) ..... तो फिर तूने इस फ़र्क को क्यों नहीं समाया? आम आदमी का चित्र ग़रीब आदमी से कैसे मिल गया।
चित्रकार : (परेशान होकर) ग़रीब से आम आदमी का चित्र मिल गया? आपको ग़लतफ़हमी हुई है, मैंने किसी ग़रीब-फरीब का चित्र नहीं बनाया।
मंत्री : अभी मालूम हो जायेगा। (मंत्री ताली बजाकर सिपाही को बुलाता है।
(सिपाही का प्रवेश, सिपाही से)
ग़रीब आदमी को दरबार में लाओ।
सिपाही : जो आज्ञा महाराज।
(सिपाही ग़रीब आदमी को धक्का देकर मंच पर लाता है)
मंत्री : (चित्रकार से) इसे पहचानते हो?
चित्रकार : (सोचते हुए) ... पहचानता तो नहीं, पर लगता है, इसे कहीं देखा ज़रूर है।
मंत्री : (डॉटते हुए) जानकर अनजान मत बनो। अच्छी तरह देखकर बताओ।
नहीं तो मैं तुम्हारा सर क़लम करवा दूँगा।
चित्रकार : (डरकर) ...नहीं ..... नहीं।
मैं फिर कोशिश करता हूँ।
मंत्री : (व्यंग्य से) करो।
(चित्रकार ग़रीब आदमी को घूम-घूमकर घूरते हुए देखता है)
चित्रकार : महाराज! ये ग़रीब आदमी है कि नहीं, ये तो मुझे नहीं मालूम, पर ये मुझे आम आदमी मालूम पड़ता है। इसे मैंने नगर में घूमते हुए देखा है।
गरीब : (चिल्लाते हुए राजा की तरफ़ बढ़ता है) महाराज मैं सच कहता हूँ, मैं आम आदमी नहीं .... मैं ग़रीब आदमी हूँ (रोता है) नहीं तो मुझे आपके आदमी पकड़ ही नहीं पाते।
मेरी जान बख्श दीजिये। महाराज मैं वो नहीं हूँ.... मुझे .
चित्रकार : (मंत्री और राजा की तरफ़ देखते हुए) महाराज मुझे तो ये बहरूपिया मालूम होता है लगता है, इस बदमाश ने अपना हुलिया ही बदल रखा है।
मंत्री : अच्छा।
राजा : है अगर ये बहरूपिया, तो बदल डालो इसका हुलिया, खुल जायेगा इसका सब इसका राज, है अगर ये धोखेबाज। .....फों ... फों
मंत्री : महाराज का आदेश है कि इस बहरूपियों को महाराज के सामने असली रूप में पेश करो। ... नहीं तो ...
चित्रकार : (डरकर) नहीं .... नहीं ... महाराज! मैं कोशिश करता हूँ।
(चित्रकार ग़रीब के चारों ओर घूमकर उसे घूरते हुए देखता है, फिर वो उसकी नीचे झुकी मूँछों को ऊपर कर देता है, जिससे वो सेनापति कि तरह लगने लगता है। फिर वो अपने झोले में से टोपी, साफा, रामनामी चादर आदि निकाल उन्हें विभिन्न प्रकार कर संयोजित कर पहचानता है। चित्रकार हर बार व़स्त्र बदलने के बाद ग़रीब को दूर जाकर अजीब तरह से देखता है। फिर कुछ कमी महसूस होने पर उसे अपनी बुशर्ट और झोला आदि भी दे देता है और अंत में एक मात्र बच रहे पेंट को भी पहनाने लगता है। जब चित्रकार अपने आपको ग़रीब की तरह से अंडरवियर में पाता है तो चित्रकार घबरा जाता है। पेंट पहनाने के बाद चित्रकार की तरह दिखाई देने लगता है। और चित्रकार ग़रीब की तरह। चित्रकार सिपाही को अपनी ओर घूरते देखकर घबरा कर भागने की कोशिश करता है, पर सिपाही उसे दौड़कर पकड़ लेता है। ध्यान देने की बात है यह कि ग़रीब के वस्त्रों में क्रमबद्ध फेरबदल इस प्रकार से हो कि वो कभी सेनापति, कभी सेठ, कभी नेता, और कभी साधु, और अंत में चित्रकार की तरह दिखाई दे)
राजा : (ग़ुस्से से) मंत्री यह बहुरूपिया मालूम होता है। करवा लो इसको क़ैद, करवा दो इसके दिमाग में छेद। ... फों... फों .....
चित्रकार :  (घबराकर) नहीं... नहीं ... महाराज मुझे माफ़ कर दीजिये। ये फोटो मुझसे बन ज़रूर गयी है, पर इसमें असली विचार तो कहानी लिखने वाले का है। ...उसी की प्रेरणा से ये चित्र बन गया, मैंने तो बस ज़रा ब्रश ही फेरा है। ... मुझे माफ़ कर दें महाराज।
राजा : (आश्चर्य से) ऑय! ये कहानी गढ़ने वाले कौन होता है! मंत्री?
मंत्री : कुछ लोग होते हैं महाराज जो लिखा करते हैं। वो किसी के बारे में कुछ भी लिख सकते हैं उन्हें लेखक कहते हैं।
महाराज : अच्छा! ... तो ...तो ...वो हमारे बारे में कुछ भी लिख सकते हैं हमको भी घिस सकते हैं, किसी के हाथ भी बिक सकते हैं।
चित्रकार : क्यों नहीं हुज़ूर उनका क्या? उनकी क़लम चाहे जिस पर क़लम चला दें, राजा को जनता, जनता को राजा बना दें।
राजा : (आश्चर्य से) आय! इतना ख़तरनाक होता है। ये लेखक का बच्चा
बुलावा उसे दरबार में खाता हूँ कच्चा
(मुर्गा खाने की तरह हाथ मुँह चलाते हैं) आऊँ .... आऊॅं
मंत्री : सिपाही ...
सिपाही : जी हुज़ूर ...
मंत्री : बंद कर दो इस चित्रकार को और लेखक को पकड़ कर हाज़िर करो।
(चित्रकार चिल्लाता रहता है, सिपाही चित्रकार और ग़रीब दोनों को खींच कर जेल की तरफ़ विंग में ले जाता है। राजा को जम्हायी, झपकी-सी आने लगती है। धीरे-धीरे मंच पर मद्धिम प्रकाश हो जाता है। सिपाही लेखक को लाता है। लेखक देखने में एक विद्रोही, चिन्तक, कवि, पत्रकार की तरह लगता है। ब्ढ़ी हुई दाढ़ी पैंट, कुर्ता व कंधे पर एक झोला। उसे माथे पर क़लम चुभों कर सोचने की आदत है...। बड़े खोये-खोये अंदाज़ में जब वो प्रवेश करता है, तो पूरा दरबार सो रहा है)
सिपाही : हुज़ूर, यह रहा आपका लेखक। ऐं! (चौंककर देखता है कि दरबार में सो रहे हैं। तो चुप हो जाता है) लेखक से कहता है अब चुपचाप यहाँ बैठों और जो लिखना है वो लिखो।
लेखक : (चारों ओर उदासीनता देखकर) ये तुम मुझे कहाँ श्मशान में ले आये।
सिपाही : (ग़ुस्से से) श्मशान?
अभी पता लगता है। ये है राजा का मैदान (व्यंग्य से) और निभाओ दोस्ती।
लेखक : (खिसियाकर) मैं जानता था कि ये चित्रकार का बच्चा मुझे एक न एकदिन फँसा देगा ....। ठीक है तुम जाओ~ ...। तुम्हारें पास माचिस है?
सिपाही : (चिढ़कर) है, पर दूँगा नहीं। (जेब से माचिस निकालकर दिखाता है फिर जेब में रख लेता है) क्या यहाँ आग लगानी है? ख़बरदार!
जो माचिस से लगाने की सोची, नहीं तो अभी मैं मंत्री को जगाकर सजा करवा दूँगा।
(सिपाही मंत्री को जगाने जाता है पर उसकी हिम्मत नहीं पड़ती है। देखता, देखता वही यह भी सो जाता है। लेखक अपने जेब से सिगरेट निकालता है, माचिस टटोलता है उसके पास नहीं। इधर-उधर देखता है राजा चोबदार, मंत्री सभी के पास जाकर देखता है फिर सिपाही की जेब टटोलता है। सिपाही ज़ोर से चौंक पड़ता है। सभी घबराकर जाग जाते हैं। राजा डर कर कुर्सी के नीचे छिप जाता है।
चोबदार राजा के बजाय मंत्री को चंवर झुलाता दिखाई देता है। मंच धीरे-धीरे पूरे प्रकाश में वापस आ जाता है)
मंत्री : (उन्नीदें से घबराते हुए) ..... है ... कौन है..... कौन है....?
सिपाही : लेखक ...ऐ लेखक है ... हुज़ूर ... आपने बुलवाया था।
मंत्री : मैंने? ...हाँ.... हाँ..... मैंने बुलवाया था। कुर्सी के नीचे झाँक कर महाराज .... बाहर आयें ...लेखक आ गया है। दरबार चलायें।
राजा : (कुर्सी के नीचे धीरे-धीरे डरा-डरा सा निकलता है) हाँ ....हाँ.....
(उसे घूरते हुए कुर्सी पर बैठता है, जैसे निशाने के लिए पोज़िशन ले रहा हो) .... मंत्री! इसे ठीक से खड़े होने के लिए कहो।
मंत्री : अच्छा महाराज!
ऐं ... ठीक से खड़े हो।
लेखक : ठीक तो खड़ा हूँ आप ठीक से देखिये।
सिपाही : बड़ा तेज़ तरार्र है हुज़ूर। बड़ी मुश्किल से पकड़ में आया है। जल्दी न करें, कहीं भाग न जाये।
लेखक : मैं भागने के लिए नहीं आया हूँ। आप लोग सोयें।
मंत्री : हाँ ..... हाँ ...। अभी बताता हूँ... आप शुरू करें।
मुलजिम लेखक हाज़िर है महाराज।
राजा : (सँभलकर) क्यों रे लेखक लिखता बकझक। क्यों किया ऐसा ज़िक्र, कि बना आम आदमी का चित्र। बता नहीं तो देता हूँ फाँसी, क्षणभर में उड़ जायेगी यह हाँसी॥ ... फों... फों....
लेखक : गुस्ताखी माफ़ हो महाराज .....मैंने लाख कोशिशें की, इससे बचने के लिये आड़े तिरछे, उल्टे-सीधे, तरह-तरह के प्रयोग किये पर इसके चुंगल से मैं न बच सका। मैंने इसे नहीं बल्कि इसी ने मुझे पकड़ रखा है महाराज।
राजा : (डरकर) हैं ....! ... मंत्री, तुम ठीक कहते थे ये आम आदमी का बच्चा तो बड़ा खतरनाक जान पड़ता है, हमीं को नहीं इसने सभी का जकड़ रखा है, अब क्या करूँ? (राजा का शरीर ऐंठने लगता है)
मंत्री : आप घबड़ायें नहीं महाराज ...! मैं अभी सब ठीक करता हूँ। लेखक से) .....ऐं? गोल-मोल बात मत करो सीधे-सीधे बताओ तुम और भी कहानियाँ लिख सकते थे, उसी आम आदमी की कहानी तुमने क्यों लिखी?
लेखक : नहीं ....नहीं... महाराज मैंने ख़ास आदमियों की भी कहानियाँ लिखीं,
पर .....पर...।
राजा : (डरकर) ..... मंत्री ये ...भी पर .... पर करता है।
मंत्री : (डाँटते हुए) ऐ! पर ...पर ...मत करो। पर, परन्तु लेकिन, फेकिन से महाराज को वो ... लगता लगता है सुना तूने।
लेखक : ... जी! ख़ास आदमियों की कहानी भी वास्तव में आम आदमी की ही कहानी हो जाती है।
राजा : मंत्री! ये कहानी क्या है। आम आदमी के बच्चे की? बड़ा परेशान कर रही है।
मंत्री : अभी पूछता हूँ हुज़ूर। (लेखक से) ऐ! महाराज को आम आदमी की कहानी सुना!
(लेखक, मंत्री, राजा की तरफ़ ग़ौर से देखता है, सोचता है, मंच पर सोचपू़र्ण मुद्रा में टहलता है और एक-एक शब्द काफ़ी विराम के बाद बोलता है)
लेखक : ...वो ....
...वो पैदा हुये .....
वो और पैदा हुये ...
वो ...
वो ...
वो जिये ...
और वो ...
वो मर गये ....
(लेखक चुप हो जाता है सब लोग प्रतीक्षा में है कि आगे कुछ और बोलेगा पर वह जब नहीं बोलता)
राजा : और ...
मंत्री : और आगे बोल .....
लेखक : बस! उनकी इतनी ही कहानी है।और मैं कुछ नहीं जनता। (सभी एक दूसरे को आश्चर्यचकित होकर देखते लेखक को देखने लगते हैं)
राजा : (एकाएक) अच्छा तो तूने उन्हें आम आदमी क्यों कहा, नींबू आदमी संतरा यों नहीं कहा?
लेखक : (सोचते हुए) ...कहने को महाराज आप उन्हें यह भी कह सकते हैं ...क्योंकि सभी का रस निकाला जा सकता है ... ...पर (राजा डर जाता है)
मंत्री : ऐ! फिर पर ...ख़बरदार जो फिर ये कहा। जानता नहीं इससे महाराज की वो बढ़ जाती है ... धड़कन।
लेखक : (घबराकर) ... नहीं ...नहीं .....अब नहीं कहूँगा।
मंत्री : तो फिर?
राजा : (ख़ुश होकर बीच में बोलते हुए) तो फिर ...ये ठीक है। अच्छा है ...तो फिर तूने इन्हें ये सब क्यों कहा?
लेखक : इसलिये ...कि नींबू को निचोड़ा जाता है, और संतरे को खाया जाता है, गन्ने को पेरा जाता है। .... बस एक आम ही है महाराज, जिसे अच्छी तरह से चूसा जा सकता है। चूसने के बाद आम की गुठली बच जाती है। उससे फिर नया आम का पेड़ बन जाता है। यही हाल आदमियों का होता है। उनकी गुठली से फिर आम आदमी पैदा होते हैं। इसीलिये मैने उसे आम आदमी कहा।
राजा : (बीच में बोलते हुए) ... तो क्या हम आदमी को नहीं निचोड़ सकते, उसे पेर नहीं सकते ... उसे खा नहीं सकते ... क्यों मंत्री!
मंत्री : (चापलूसी से) ...हाँ...हाँ ....क्यों नहीं आप तो महाराज हैं, महाराज कुछ भी कर सकते हैं।
लेखक : महाराज, जो मज़ा चूसने में है वो पेरने, निचोडने में नहीं है, बस इसीलिये मैंने ..... उसे आम आदमी कहा...
राजा : (ख़ुश होकर तालियाँ बजाने लगता है) ...ख़ुश...ख़ुश... हम बहुत ख़ुश हुये... मंत्री हम तो हुनर वालों की बड़ी कद्र करते हैं।
मंत्री : जी हाँ! महाराज आपकी नज़र में बुद्धिमान और मूर्ख सब एक समान हैं।
राजा : इसे बख्शीश देकर रिहा कर दिया जाये ।
मंत्री : (घबराकर कान में फुसफुसाता है) ...ये आप क्या कर रहे हैं?
महाराज .....इसे अभी न छोड़िये। पहले इससे आप आम आदमी का पता लगा लीजिये, यह भी कहीं बहरूपिया न हो।
राजा : (सहमत होते हुए) ...हाँ....हाँ.... तुम ठीक कहते हो मंत्री। बड़े होशियार हो, मैं तुम्हारे साले को राजदूत बनाता हूँ।
मंत्री : (चापलूसी से हॅंसता है) .....हें...हें... महाराज की जय हो।
राजा : (लेखक को फिर अजीब तरह से देखता है। लेखक राजा का बदला हुआ रुख देख कर अचरज में पड़ जाता है) क्यों रे लेखक? तू आम आदमी को पहचान सकता है।
लेखक : बिल्कुल।
राजा : मंत्री! आम आदमी की शनाख्त करायी जाये।
मंत्री : (ताली बजाकर, सिपाही से) ऐ! जाओ! आदमियों को शनाख्त के लिए आओ।
सिपाही : जो आज्ञा हुज़ूर। (सिपाही जाता है)
राजा : क्यों रे लेखक तूने आम आदमियों को भड़काया क्यों?
लेखक : मैंने उन्हें नहीं भड़काया! ये लोग क़िस्सा कहानियों से नहीं भड़कते यही तो दुख है।
मंत्री : ... तो फिर वो क्यों महाराज का भाषण सुनने नहीं आये? तूने उनके कान नहीं भरे?
लेखक : (घूरता है) ये काम नेता का है, मैं ये सब दो कौड़ी के काम नहीं करता।
राजा : नेता ...? ये किस चिड़िया का नाम है।
लेखक : ये वो चिड़िया है महाराज जो लोगों के कानों को भरने में, उनके दिलों को भड़काने में काम आती है।
राजा : मंत्री! तो फिर अभी तक तुमने चिड़ीमार को भेजकर उसे दरबार में क्यों नहीं बुलवाया
उससे अपराध क्यों नहीं कबुलवाया?
फों... फों...
मंत्री : उसे भी बुलवाऊॅंगा महाराज। पहले इस लेखक के बच्चे को आम आदमी की
शनाख्त तो कर लेने दीजिये। सब अपने आप पता चल जायेगा। शनाख्त के लिए आदमी आ गये हैं महाराज! आज्ञा हो तो पेश करूँ।
राजा : आज्ञा है।
(मंत्री ताली बजाकर सिपाही का संकेत करता है। सिपाही आदमियों को धक्का देते हुए मंच पर लाता है। आदमियों की वेशभूषायें आपस में बदल गयी हैं। ग़रीब आदमी चित्रकार के भेष में, चित्रकार ग़रीब आदमी के भेष में है। सिपाही उन सबको लाइन में खड़ा करता है)
मंत्री : (लेखक से) लो पहचानो?
(लेखक सब आदमियों को घूरता है। वो उन सबकी बदली हुई वेशभूषा देखकर चकित है। वह बार -बार आँखें मलता है, पर उसकी समझ में नहीं आता। धीरे-धीरे वो बेहोश हो जाता है)
मंत्री : (प्रसन्न होकर) मैं कहता था न, बहुरूपिया निकला। असली लेखक अब मिलते ही कहाँ हैं। सिपाही (ताली बजाता है)... इन सबको बन्द कर दो... और तुंरत नेता को महाराज के सामने हाज़िर करो।
सिपाही : जो आज्ञा महाराज!
(सिपाही सबको खींच-खींचकर जेल के विंग की तरफ़ ले जाता है। मंच पर प्रकाश धीरे-धीरे मद्धिम होता है, जाते समय ग़रीब, चित्रकार, लेखक सभी चिल्लाते/तड़पते दिखाई देते हैं। विंग में जाने के बाद मंच पर फिर पूरा प्रकाश हो जाता है ...मंत्री बेचैनी से टहलता है, पर नेता के आने में देर होने के कारण महाराज का शरीर फिर ऐंठने लगता है। उनको हिचकियों व उल्टी सी आने लगती है)
मंत्री : (बुदबुदाते हुये) लगता है महाराज को फिर दौरा पड़ रहा है ...धैर्य रखिये महाराज।
(सिपाही मंच पर एक सेठनुमा व्यक्ति को धक्का देकर अन्दर करता है। उसका चेहरा दयनीय है। उसके पास एक रुपयों की थैली है, जिसे वह बार-बार एक जेब से निकाल कर दूसरी जेब मे रखने की आदत है। वो बार-बार बाहर जाने का प्रयास करता है। पर सिपाही उसे हर बार धक्का देकर अन्दर कर देता है। उसे देखने पर राजा की बेचैनी कम होती है। वो कुर्सी के ऊपर पैर रख कर बैठ जाता है। मंत्री की ओर देखता है)
सिपाही : महाराज की जय हो...
मंत्री : (सेठ की ओर देखकर) कौन है ये?.... नेता है?
सिपाही : ये नेता नहीं..... उसका चहेता है हुज़ूर।
मंत्री : लेकिन नालायक! मैंने तो तुझे नेता को पकड़ने के लिये भेजा था।
सिपाही: मैंने उसे बहुत ढूँढा पर वो नहीं मिला सरकार। इसी ने उसे कहीं छिपा रखा है।
राजा : छिपा रखा है।
क्यों रे सेठ के बच्चे?
क्यों उसे खा रखा है? बता, नहीं तो तेरा घर-फर, द्वार-ज़मीन, जायदाद-फायदाद, इज्जत-फिज्जत सब हड़प करता हूँ ...
फों...फों...
सेठ : (घिघियाता हुआ अपनी थैली बार-बार एक जेब से निकाल कर दूसरी में डालता रहता है।)
घि... घि....घि... मुझे कु...छ..... न..... नहीं मालूम, ऐसा न करें हुज़ूर, मुझसे अगर कोई ग़लती हो गयी हो तो मैं अपनी नाक रगड़ता हूँ, ज़मीन चाटता हूँ..... लेकिन मेरे साथ ये अन्याय न करें।
मंत्री : बता, तूने नेता को - कहाँ छुपाया है?
सेठ : (डरकर) मैंने उसे नहीं छिपाया .... वहीं मेरे पीछे पड़ा।
राजा : है? तेरे पीछे पड़ा? या तू ही उसके आगे खड़ा है। ...फों... फों... मंत्री!
मंत्री :  जी महाराज।
राजा : कर दो इसको जेल। फिर निकल आयेगा इसका खेल....। .... फों...फों
(सेठ घिघियाता है, माथा टेकता है, लेटता-उठता है, रुपयों की थैली एक जेब से निकाल कर दूसरे में डालता है)
सेठ : ..... नहीं ...नहीं ....महाराज ऐसा न करें।
(सिपाही आकर उसे खींचते हुए विंग में ले जाने लगता है। सेठ छूट-छूट कर आता है और अब कि मंत्री सामने जल्दी-जल्दी थैली एक जेब से निकाल कर दूसरी जेब रखता है। मंत्री समझ जाता है, पर राजा चौंकता है)
राजा : मंत्री... ऐं जादूगर की तरह इस जेब से उस जेब में क्या करता है ...? बड़ा बदमाश जान पड़ता है।
मंत्री : आप चिंता न करें महाराज ..... मैं आपका ही मंत्री हूँ, मैं किसी बदमाश से कम नहीं हूँ..... अभी इससे उगुलवाता हूँ ...(मंत्री ताली बजाकर सिपाही को संकेत करता है)
मंत्री : इसे अंदर ले चल।
(सिपाही सेठ को कुत्ते की तरह गले में कोड़ा बाँध कर अंदर घसीटता है। मंत्री भी पीछे-पीछे चलते हैं पार्श्व ने बिगुल, बैंड पर "क़दम-क़दम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाए जा" की धुन उभरती है। सभी पात्र गणतंत्र दिवस की परेड वाली शैली में चलते राजा के सामने गुज़र कर सैल्यूट करते हैं। जूलूस निकल जाने के बाद पार्श्व से विभिन्न प्रकार की मिश्रित ध्वनियों जैसे - चीखें, चिल्लाहटें, नारे, अटट्हास, आदि आती रहती हैं। शोरगुल तेज़ होकर धीरे-धीरे - मद्धिम होता है।
राजा बेचैनी से टहलने लगता है चंवर डुलाने वाला ललचाई नज़रों से विंग की तरफ़ देखता रहता है उसका भी ध्यान बँट जाने के कारण वो रुक-रुक कर चंवर डुलाता है। एकाएक राजा को फिर दौरा पड़ने लगता है। उन्हें हिचकियाँ और उल्टी से होने को होती है। शरीर ऐंठने लगता है, उसी समय मंत्री और सिपाही अपने अपनी जेबों में थैलियाँ रखते हुए प्रवेश करते हैं।)
मंत्री : (घबराकर) ... अरे महाराज...आप धैर्य रखें सब ठीक हो जायेगा।
(राजा को फिर उबकाई से आते-आते रुक जाती है।)
मंत्री : (सिपाही से) लगता है महाराज को फिर से भाषण पिलाने, तालियाँ और जय-जयकार सुनने का दौरा पड़ गया है।
(मंत्री सिपाही से) जाओ तुम जय-जयकार करने वाले, तालियाँ बजाने वाले आदमियों को लाओ।
सिपाही : कहाँ से लाऊँ हुज़ूर?
मंत्री : जाओ कहीं से भी लाओ नहीं तो तुम्हारा सर क़लम करवा दूँगा।
देखते नहीं महाराज की स्थिति कितनी गंभीर है, जाओ....।
सिपाही : (डरकर) ..... जाता हूँ महाराज ... जाता हूँ।
(राजा को फिर ज़ोर कि उबाकाई आने को होती है, पर मंत्री सँभाल लेता है)
मंत्री : बस महाराज, अब कुछ ही क्षणों की बात है, फिर आपका भाषण होगा.... जय-जयकार...होगी, सब ठीक हो जायेगा....। आप थोड़ा धैर्य रखें महाराज।
(मंत्री बेचैनी से सिपाही के लौटने की प्रतीक्षा करते हैं। बीच-बीच में महाराज की ज़ोर-ज़ोर से हिचकियाँ आती हैं। थोड़ी देर बार सिपाही का प्रवेश)
सिपाही : महाराज की जय हो...
(महाराज धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलते हैं)
सिपाही : वो आ गये महाराज।
राजा : (हड़बड़ाकर, हकलाते हुए) ... आ गये? कौन आ गये?
मंत्री : आदमी महाराज।
राजा : (राजा डरकर) क्यों यहाँ क्या लेने आये हैं आदमी?
मंत्री : आपका भाषण सुनने के लिए महाराज
राजा : (प्रसन्न होकर) आदमी ... भाषण... मैं दूँगा ...वो सुनेंगे...तालियाँ ... जय ..... जयकार .....हें... हे...सच मंत्री।
मंत्री :  बिल्कुल सच महाराज।
राजा : तो फिर शीघ्र जाओ, उनको लेकर आओ। मेरे अन्दर भाषण के बबूले फूट रहे हैं।
(राजा धीरे- धीरे सहज होकर आराम से बैठ जाता है। सिपाही धक्का देकर ग़रीब आदमी, चित्रकार, लेखक और सेठ को मंच पर लाता है। सभी की वेशभूषाएँ साधारण और एक जैसी हैं। जैसे क़ैदी की तरह चोगे पहने हुए। राजा सभी को डरते हुए घूरता है। सिपाही सबको जब चुपके से कोड़ा दिखा कर डराता है तो सब एक साथ महाराज की जय-जयकार करते हैं। राजा उन्हें देखकर मंत्री, सिपाही और चोबदार की ओर देखकर रुक-रुककर हँसता है। आदमी एक लाइन में सिर नीचा किये खड़े रहते हैं)
सिपाही : (डाँटकर) बैठ जाओ।
(सब आदमी एकदम से डरकर बैठ जाते हैं। मंत्री सिपाही को प्रशंसनीय दृष्टि से देखता है)
मंत्री : शाबाश!
(सिपाही सिर झुकाता है)
मंत्री : (राजा से) महाराज ....आइये...अब आप इनको अपना भाषण दीजिये ... आइये।
राजा : (शर्माते हुए) दे दूँ...
मंत्री : दे दीजिये।
राजा : अच्छा।
(राजा मंच पर जैसे ही भाषण देने के लिये खड़ा होता है तो सब आदमी मुड़कर पीछे देखते हैं, पर वो अपने पीछे सिपाही को कोड़ा लिये खड़े देख कर फिर राजा का भाषण सुनने के लिये मजबूर हो जाते हैं। राजा मंच पर टेढ़े तरीक़े से खड़े अपनी रूल को इस तरह से पकड़ता है जैसे माइक पकड़े हो। खड़े होते ही राजा को ज़ोर से जम्हाई आ जाती है। वो चुटकी बजाकर जो से जम्हाई लेते हैं। (पॉज) चारों तरफ़ देखते हैं.... फिर एक ज़ोर से डकार लेते हैं। लोग ज़ोर से काफ़ी देर तक तालियाँ बजाते रहते हैं। फिर ताली एक़दम से बंद हो जाती है) (पॉज) ...प्रजा )फिर राजा को ज़ोर-ज़ोर से छींकते हैं। दर्शक हर छींक पर ताली बजाते हैं।
छींके कम होने पर वो अपने पेट पर हाथ फेरने लगते हैं..... राजा को फिर जम्हाई आने लगती है, फिर तालियाँ/ महाराज की जय हो...। सभी ज़िन्दाबाद करने की मुद्रा में हाथ उठाते हैं, एकाएक राजा सबको शान्त होने का संकेत करता है, ध्यान से कुछ सुनने का प्रयास करता है... फिर घबड़ा कर दूसरी तरफ़ दौड़ कर जाता है)
राजा : तुम्हें कुछ सुनाई दिया मंत्री?
मंत्री : (सुनते हुये) कुछ नहीं महाराज।
राजा :  बहरे मत बनो, सुनो! ये देखो।
(सब शान्त होकर सावधानी से सुनने का प्रयास करते हैं। कोई दीवाल, कोई ज़मीन, कोई हवा में कोई कान से कान मिलाकर सुनता दिखाई देता है। पार्श्व में एक नारों का एक विद्रोह पूर्ण शोर, नट के नगाड़े के साथ उभरता है। जो आरंभ में धीरे-धीरे रहता है)
मंत्री : (राजा से) लगता है कहीं महाराज की जय-जयकार हो रही है।
राजा : (घबराते हुए) ये बतलाता है इसको जय-जयकार,
मुझको लग रहा है ये अपनी हाहाकार!
(धीरे-धीरे पार्श्व में होता शोर.....ज़िन्दाबाद...(पॉज) ... ज़िन्दाबाद ...(पॉज).....ज़िन्दाबाद, तेज़ हो जाता है, राजा के डर मारे काँपने लगता है)
मंत्री : अब डरना छोड़िये और जाइये अपनी कुर्सी से चिपक जाइये महाराज, लगता है कहीं कुछ शोरगुल हो रहा है।
राजा : (उतावलेपन से) तो फिर करो ना इस शोर को गुल। मेरा जी घबड़ा रहा है।
मंत्री : करता हूँ ...महाराज....अभी करता हूँ।
(पार्श्व में होता शोर.... धीरे-धीरे स्पष्ट ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद (पॉज़) ...ज़िन्दाबाद .... के नारों में बदल जाता है। मंच पर प्रकाश थोड़ा मद्धिम हो जाता है। राजा डर के मारे कुर्सी के पीछे छिप जाता है। चोबदार भी डर कर अपना पंखा मंत्री के हाथ में पकड़ा कर छिपने लगता है। अन्य पात्र मंच पर आंतकित मुद्रा में स्थिर हो जाते हैं। एकाएक नेता मंच पर किसी ग़ुस्सैल बैल की तरह आ धमकता है। वेशभूषा से वो किसी नेता और क्रांतिकारी का सम्मिश्रण सा लगता है, नारों के स्वर और तेज़ हो जाते हैं। नेता पूरे मंच पर ऐसे टहलता है जैसे कोई पहलवान अपना साथ ढूँढ रहा हो। वह घूमते हुए अपनी जाँघ ठोकने लगता है और हाथ से बल्ले दिखाने लगता है। सभी पात्र मंच पर सहमी सी मुद्रा में है। विंग से फिर ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद ...के नारे नट की ढोलक पर आने लगते हैं। नेता मंच पर नट जैसी कला बाजीयाँ करने लगता है)
नेता : (दहाड़कर) गर्व से)
किसके बाजूओं में है इतना ज़ोर
जो गुल कर सके ये शोर।
(नगाड़ा बजता रहता है, नेता कुलाँचे खा कर करतब दिखाता रहता है। फिर एक़दम से हाथ उठाकर नेता नारे शान्त करवा देता है। शांति हो जाने पर मंत्री धीरे-धीरे सँभल कर राजा को बाहर निकलने के लिए उकसाता है। सिपाही, चोबदार भी अपनी वर्दी, पेटी, मूँछें ठीक कर लेते हैं)
मंत्री : (राजा से फुसफुसाते हुए) बाहर आइये महाराज। थोड़ी तो हिम्मत दिखाइये। आइये...आइये...
(राजा कुर्सी के नीचे से धीरे-धीरे उठते हैं, पार्श्व में यथोचित संगीत)
राजा : (डरते हुये) मंत्री। कौन है ये बदनसीब -
जो मुझे नहीं झुकाता सीस? .....फों...फों...
मंत्री : (फुसफुसा कर) यही है नेता! महाराज।
राजा : अच्छा ...?
क्यों रे नेता?
बना फिरता है सबका चहेता
नहीं है तू अकलमंद की पूँछ,
अभी उड़ा दूँगा तुम्हारी मूँछ॥ ...फों....फों.....
नेता : (नाराज़ होकर) हैं .....क्या कहा? मेरी मूँछ को पूँछ कहा।
राजा : कहा। पूँछ नहीं दुम कहा! कुत्ते की दुम कहा।
नेता : अभी बताता हूँ...
(नेता इशारा करता है, नट का नगाड़ा बजने लगता है, नेता करतब दिखाने लगता है)
मंत्री : (समझाते हुए) ...हैं.....हैं...हैं... ये क्या कर रहे हैं महाराज?
यही तो वो ... आपकी जनता को फुसलाने वाला, आम आदमियों को बहकाने वाला। इसे डराइये नहीं महाराज! इसे आप फुसलाइये वर्ना बड़ा वो ....हो जायेगा।
राजा : ऐं, ऐसा...? हाँ...हाँ तुम ठीक कहते हो। हम तुमसे ख़ुश हुए।
मैं तुम्हारे साले को अपना राजदूत बनाता हूँ .... (नेता से) ऐ ... फुस्स... फुस्स.....
नेता : (नगाड़े रुकवा देता है) क्या कहा? .....फुस्स...फुस्स.....मैं ...घासफूस हूँ?
राजा : (चापलूसी से) हें...हें....नहीं ...हीं...हीं...हें...हें...मेरा मतलब है कि तुम नहीं, तुम्हारे सामने बाकी सब घासफूस हैं। हें.....हें
मंत्री : (नेता से) हें...हें ...श्रीमान! महाराज। आपके करतबों प्रसन्न हुए हें ...हें....
राजा : (बनावटी हॅंसी) .....हाँ...हाँ ...ख़ुश..... (राजा मंत्री के कान में कुछ कहते हैं)
मंत्री : (नेता से महाराज पूछ रहे हैं कि तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाय?
नेता : वैसा ही, जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है, एक मंत्री दूसरे मंत्री के साथ करता है। एक अफ़सर दूसरे अफ़सर के साथ करता है। एक आदमी दूसरे आदमी के साथ करता है।
राजा : (नेता से) ....तुम हो सियार, इतने तरह के व्यवहार अगर मैं एक आदमी से ...
नेता : (ग़ुस्से से) क्या कहा? मैं सियार हूँ?
मंत्री : (सँभालते हुए) नहीं ... सियार नहीं श्रीमान्! होशियार-होशियार।
(नेता का गुस्सा शांत हो जाता है)
राजा : (चापलूसी से) हैं.... हैं... अगर तुम मुझे आम आदमी को पहचनवा दो तो, तो जो कहोगे करूँगा। तुम्हारे साथ तुम्हारी तरह व्यवहार करूँगा।
नेता : करोगे?
राजा : बिल्कुल करूँगा।
मंत्री : (चापलूसी से) अब महाराज खुद झूठ थोड़े ही बोलेंगे। नहीं तो फिर मेरा यहाँ क्या काम? आप महाराज का विश्वास तो कीजिये श्रीमन्।
नेता : अच्छा ठीक है। मैं उन्हें पहचनवा दूँगा।
राजा : सच! तुम उन्हें पहचान सकते हो?
नेता : क्यों नहीं! मैं तो उनका सेवक हूँ, मेरा जीवन उन्हीं के लिये हैं।
राजा : तो फिर पहचानो।
(मंत्री ताली बजाकर सिपाही को संकेत करता है। सिपाही का प्रवेश)
सिपाही : महाराज की जय हो।
मंत्री : जाओ आदमियों को शिनाख्त के लिये लाओ।
सिपाही : जो आज्ञा महाराज।
(नेता एक ओर खड़ा है। दूसरे विंग से क़ैदी लाये जाते हैं। सब क़ैदियों की वेशभूषा एक जैसी है, परन्तु पारंपरिक नहीं है। सबसे पहले सेठ आता है, उसके पीछे लेखक, फिर चित्रकार और अन्त मे ग़रीब, उसके पीछे सिपाही। नेता एक-एक को आता हुआ देखकर असमंजस में पड़ जाता है)
राजा : (राजा मुँह से एक विचित्र सी आवाज़ निकालकर नेता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।) पहचानो .....
मंत्री : तुम्हें किस पर शक़ है?
नेता : (सिपाही को देखकर) क्या इसकी भी शिनाख्त करनी है।
मंत्री : सिपाही: मेरी शनाख्त तुम क्या खाकर करोगे? तुम क्या, कोई भी?
मंत्री : (सिपाही से) ऐ....तुम हट जाओ वहाँ से। (सिपाही नेता को घूरता हुआ हटकर अपनी जगह पर आ जाता है)
(ताली बजाकर) जल्दी करो।
(क़ैदी सावधानी पूर्वक चुपचाप लाईन में खड़े हैं। नेता एक-एक कर सबको घूरता है। शनाख्त वाले स्थान को छोड़कर मंच के अन्य भाग में प्रकाश मद्धिम हो जाता है। नेता सबसे पहले सेठ के पास जाता है तो केवल सेठ, नेता अपेक्षाकृत अधिक प्रकाश में रहते हैं। नेता के पास पहुँचने पर सेठ अपना मुँह दूसरी ओर घुमा लेता है। दूसरी ओर जाने पर सेठ फिर अपना मुँह फेर लेता है। नेता सेठ को घूरते हुए चलकर लेखक के पास आता है। सेठ पर प्रकाश कम होकर लेखकर के ऊपर आने लगता है। नेता ओर लेखक बार-बार एक-दूसरे को एक साथ ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर देखते हैं और फिर दोनों नाराज़ होकर एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं में देखने लगते हैं। इसके बाद नेता चित्रकार के पास पहुँचता है। प्रकाश लेखक से हटकर चित्रकार पर आ जाता है। जिसमें चित्रकार एक चिंतनशील मुद्रा में प्रकाशित होता है। आगे बढ़ने पर ग़रीब प्रकाश में आता है, जो सिर झुकाये चुपचाप दयनीय भाव से खड़ा रहता है। सबको देखने के बाद नेता अपने जगह पर वापस आकर चिंतित/सोचने वाली मुद्रा में खड़ा हो जाता है। धीरे-धीरे पूरा मंच प्रकाश में आ जाता है) ...
राजा : (उतावलेपन से) पहचाना?
नेता कुछ देर चुप रहता है।
मंत्री : बोलिये श्रीमान्।
नेता : (सोचते हुए) ये वो नहीं है।
मंत्री : कौन?
नेता : जिन्हें मैं पहचानता हूँ।
मंत्री : तुम किसे पहचानते हो?
नेता : जो मुझे पहचानते हैं।
राजा : मंत्री! ये अकल का कन्त्री क्या बकता है।
मंत्री : महाराज लगता है कि ये धोखा देना चाहता है!
राजा : आंय? ये किसको धोखा देना चाहता है, मुझे या आम आदमियों को
जिनका ये सेवक है?
मंत्री : हमको, आपको, उनको सभी को!
राजा : (व्यंग्य से) अच्छा! मंत्री…
मंत्री : जी महाराज।
राजा : हम क्या किसी से धोखा खाते हैं।
मंत्री : बिल्कुल नहीं हुज़ूर, आप तो महाराज हैं किसी का खाते-पीते नहीं।
आप तो बस देते ही हैं... इसको भी कुछ दे दीजिये।
राजा : हूँ! क्यों रे धोखेबाज।
चील, कौवा, बाज,
मौक़े, पर पहचाना नहीं।
बनता है आम आदमी का सरताज।
फों...फों.....
सिपाही इसे सौ कोड़े लगाओ
मंत्री : (घबराकर कान में फुसफुसाते हुये) ...अरे....रे....ये ...क्या कर रहे हैं, महाराज इसे कोड़े.....फोड़े असर नहीं करते। ये कहीं भड़क गया तो बड़ा ..... वो जायेगा।
राजा : वो ...हो जायेगा? तो फिर मैं इसका क्या करूँ?
मंत्री : इसे फुसलाइये महाराज, ये राजनीति का खिलाड़ी है इसलिए इसके साथ फूहड़ राजनीति खेलिये, जाल बिछाइये।
राजा : मंत्री, तुम होशियार होने के साथ-साथ समझदार भी हो। हम तुम्हारे साले को फिर तरक्की देते हैं।
मंत्री : धन्यवाद महाराज।
राजा : (नेता को सोचने वाली मुद्रा में देखकर प्यार से)
 ...ऐ...
(नेता राजा को घूरकर देखता है) क्या सोच रहे हो?
मंत्री : यही कि इनमें आम आदमी कौन है? और या सोचेंगे।
नेता : (खिसियाकर) मैं इस तरह से नहीं सोच सकता।
राजा : तो फिर लेट कर सोचो, बैठ कर सोचो, लटककर सोचो, अटक कर सोचो, सोचो।
नेता : नहीं, कुर्सी पर बैठकर मेरी सोचने की आदत है, मुझे कुर्सी चाहिये।
मंत्री : (राजा से फुसफुसाकर) यही मौक़ा है महाराज!
राजा : तुम्हें कुर्सी मिलेगी। अच्छी कुर्सी मिलेगी।
मंत्री : (ताली बजाकर सिपाही से) जाओ श्रीमान् जी के लिए एक कुर्सी लाओ।
(सिपाही एक सजी हुई, परन्तु पुरानी एवं टूटी हुई कुर्सी लाता है)
नेता : (हिकारत से देखता है) हूं... मैं इस अपाहिज कुर्सी पर बैठूँगा?
राजा : (अपने सिंहासन की ओर इशारा कर) इधर देखों ....इसी कुर्सी पर बैठोगे।
नेता : देखता हूँ।
(राजा उचककर खड़ा हो जाता है)
राजा : आइये।
(नट का नगाड़ा एक अजीब, हास्यास्पद ध्वनि से बजता है। उसकी ध्वनि पर नेता सिंहासन पर बैठने के लिए बढ़ता है। मंत्री, चोबदार, सिपाही, सभी चौकन्ने हैं। मंच के अन्य पात्र चुपचाप कौतुहल से इसे होता देखते रहते हैं। सिंहासन के पीछे का प्रकाश लाल हो जाता है। जैसे ही नेता कुर्सी पर बैठना चाहता है, राजा चालाकी से से लपक कर पहले बैठ जाता है। खिलखिलाने लगता है। पुनः मंच पर पूरा प्रकाश हो जाता है)
राजा : ऐसे नहीं। पहले आम आदमी को पहचानो तब कुर्सी मिलेगी।
(कुर्सी को जैसे अपने आपसे समा लेना चाहता है। नेता हतप्रभ देखता रहता है। मंत्री के चेहरे पर मुस्काराहट, प्रसन्नता है, पर चोबदार को ज़ोर से हँसी आ जाती है। सिपाही से ताली बज जाती है। नेता स्वंयं को अपमानित महसूस करता है। उसे क्रोध आता है पर वो कुर्सी की ओर देखकर शांत रहता है)
नेता : अच्छा अभी बताता हूँ।
  (मचान से नीचे उतरता है चारों क़ैदियों को घूर-घूर कर देखता है)
  कहो इन्कलाब?
  (सब ख़ामोश रहते हैं)
नेता : मैं कहता हूँ कहो "इंकलाब"
(फिर कोई नहीं बोलता, तब सबके पास जाकर उनके चेहरे मिलाने की कोशिश करता है। राजा सशंकित होकर मंत्री से पूछता है)
राजा : यह इन लोगों से "इनक्लब - इनक्लब" क्या करवाता जाता है? कहीं ये ... इन लोगों का कोई क्लब-फ्लब खोल रखा है क्या?
मंत्री : अरे महाराज! इनक्लब नहीं, इन्क्लाब।
राजा : (दो-तीन बार विचित्र तरीक़े से इंकलाब का उच्चारण करता है)...क्या होता है ये?
मंत्री : महाराज यह एक तरह का नारा है, पर जो इसे जगा लेता है तो यह भंयकर मंत्र बन जाता है यह लोगों को भड़काने के काम में आता है।
राजा : अच्छा! तो इसे हम नहीं जगा सकते?
मंत्री : नहीं महाराज! इसे हमेशा किसी के ख़िलाफ़ ही जगाया जाता है।
नेता : सेठ की आँखों में घूरकर...कहो इंकलाब (सेठ से के चेहरे पर जलता बुझता प्रकाश आता है)
सेठ : (घिघियाने लगता है) घि...घि....घि... मुझसें ये न बुलवाइये ... मुझे पीछे ही रखिये। (सेठ अपना हाथ आदतन एक जेब से निकालकर दूसरी में, दूसरी से पहली में बार-बार डालता है, नेता उसे देखकर उसे लाइन से अलग खड़ा कर देता है सेठ के पैर काँपने लगते हैं)
नेता : (लेखक के पास जाकर कहता है) कहो इन्कलाब, लेखक शान्त रहता है। नेता फिर उसे कहने के लिये दोहराता है, लेखक शान्त रहता है। फिर... लेखक एक़दम से लाइन से निकल कर मचान के ऊपर खड़िया से बड़े-बड़े अक्षरों में इन्कलाब लिख देता है और लाइन में आकर खड़ा हो जाता है। सब उसे हतप्रभ होकर देखते रह जाते हैं, नेता लेखक को भी लाइन से बाहर अलग खड़ा कर देता है)
नेता : हूँ।
(कहकर आगे लापरवाही से आगे बढ़कर चित्रकार के पास जाता है)
नेता : तुम बोलो "इन्कलाब"।
(चित्रकार अत्यंत चिन्तनशील मुद्रा में स्थिर रहता है)
नेता : (ज़ोर से) बोलो।
(चित्रकार आवेश में आकर झटके से हाथ उठाकर इन्कलाब वाली मुद्रा में स्थिर हो जाता है। नेता उसे देखकर सहमता है फिर थोड़ी देर बाद सिपाही की मदद से उसे भी अलग खड़ा करवा देता है। नेता ग़रीब के पास आता है, ग़रीब आदमी चुपचाप सिर नीचा किये खड़ा है)
नेता : (ग़रीब से) कहो इन्कलाब।
ग़रीब : (दबे स्वर में काँपते हुए) इन्कलाब।
नेता : (दहाड़ता है) बोलो इन्कलाब।
ग़रीब : (डरकर रोते हुये) इन्कलाब।
नेता : (ग़रीब का हाथ मोड़ता है) चिल्लाओ मत, कहो इन्कलाब।
ग़रीब : (हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगता है) मुझसे अब नहीं बोला जाता, मुझे छोड़ दें सरकार।
नेता : (ग़ुस्से से) मुझे यहाँ चढ़ाकर दगा बाजी करता है।
  (डाँटकर) ....बोल... "इन्कलाब"
ग़रीब : (डरकर कॉपते हुए) ..."ज़िन्दाबाद"
नेता : मैं कहता हूँ ..... इन्कलाब बोल नामाकूल।
ग़रीब : (रूआंसा होकर) मुझसे तो हमेशा आपने ज़िन्दाबाद बुलवाया है,
इन्कलाब तो आप बोलते थे।
(राजा, मंत्री असमंजस में हैं)
नेता : जब बोलता था, बोलता था ...आज तुझे इन्कलाब बोलना होगा...
बोल.... (उसका हाथ ऐंठने लगता है ग़रीब रोने चीखने लगता है) बोल इन्कलाब .....बेसुरे ...
ग़रीब आदमी : "ज़िन्दाबाद "
नेता : "इन्कलाब, नालायक "
ग़रीब आदमी : (रोकर) "ज़िन्दाबाद
नेता : "इन्कलाब, बेहूदा"
ग़रीब आदमी : (मरा मरा सा) ..."ज़िन्दाबाद"...
  (ग़रीब बेहोश सा होने लगता है, मंत्री राजा के पास दौड़ा-दौड़ा जाता है)
मंत्री : रोकवाइये महाराज! ये बेहूदगी। वर्ना बड़ा ....वो जायेगा।
राजा : हाँ.....हाँ ठीक कहते हो ....
ऐं ... रोक यह अत्याचार
क्यों बनाता है उसका आचार?
सिपाही, कैद कर लो इसे। ....फों...फों...
(सिपाही ग़रीब को छुड़ाने लगता है नेता वैसा ही करता रहता है... कि एकाएक ग़रीब जैसे अर्ध-विक्षिप्त सा होकर ताक़तवर हो जाता है। अपने आपको छुड़ाकर स्वतंत्र होकर मंच पर उछल-कूद
करने लगता है)
ग़रीब : मैं आम आदमी हूँ।
मैं इन्कलाब हूँ
मैं ज़िन्दाबाद हूँ,
  (लेखक, सेठ चित्रकार से)
  तुम आम आदमी हो,
तुम इन्कलाब हो
तुम ज़िन्दाबाद हो।
  (सबसे)
  हम आम आदमी है।
हम इन्कलाब हैं।
हम ज़िन्दाबाद हैं।
  (सेठ, चित्रकार, लेखक को गोलाई में खड़ा कर जैसे कोई खेल खेल रहा हो)
  मैं तुम हूँ।
तुम मैं हो।
मैं इन्कलाब हूँ।
तुम ज़िन्दाबाद हो,
  (आवेश में आकर चिल्लाते हुए)
  इन्कलाब!
ज़िन्दाबाद!
इन्कलाब ....ज़िन्दाबाद ...! इन्कलाब... ज़िन्दाबाद...!
(धीरे-धीरे चित्रकार, सेठ, लेखक सभी ग़रीब के साथ गोलाई में घूम-घूम कर नारे लगाने लगते हैं। नेता उनके बीच में घिर जाता है। सब नेता के चारों ओर घूमने लगते हैं। नेता परेशान होकर उनके विपरीत घूमता दिखाई देता है। सिपाही नेता वाली दिशा में घेरे के बाहर कोड़ा लेकर घूमता है।
यथोचित प्रकाश)
(राजा व मंत्री घबराकर खड़े हो जाते हैं)
मंत्री : (डरा हुआ) ...ये तो बड़ा... वो हो गया...महाराज (नीचे उतरता है) ...ऐं...ऐ...
ये दरबार में क्या हो रहा है?
  (राजा भी मंत्री के पीछे छिपते हुए आता है)
  राजा : (ताली बजाता है पर ताली से आवाज़ नहीं होती काँपते हुए) ये क्या हो रहा है?
  (इतने में सब राजा और मंत्री को भी घेरने लगने हैं। मंत्री अपने को अकेला देखकर सबके साथ घेरे में आ जाता है। सब नारे लगाते हैं)
  मैं आम हूँ,
मैं इन्कलाब हूँ
मैं आम हूँ
मैं ज़िन्दाबाद हूँ।
  (पार्श्व में नगाड़ा, कठपुतली की सीटियाँ बजने लगती हैं। प्रकाश घेरे पर रह जाता है। राजा और नेता के अतिरिक्त सभी अपने हाथ-पैर इस प्रकार से चलाते हैं कि मध्य में राजा और नेता का शरीर - संचालन कठपुतली की तरह लगने लगता है। ज़िन्दाबाद और इन्कलाब के नारों पर नेता, और मंत्री के हाथ कठपुतली की तरह बारी-बारी से उठते हैं)
(धीरे-धीरे नारे और घेरे पर प्रकाश तेज़ हो जाता है जो मद्धिम होकर शोरगुल, सीटियों, नगाड़े की ध्वानियों एवं कोलाहल के साथ विलीन हो जाता है)
  (पर्दा गिरता है)
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