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ISSN 2292-9754

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10.21.2017


तुम्हारी वो आँखें

नीरस कहता है जो विचारों को
उसने देखी नहीं
एक के बाद एक तर्क करती
तुम्हारी उँगलियाँ
हवाओं में बनाती हुई चित्र
अपनी लय में

देखी नहीं तुम्हारी वो आँखें
जो एक ही साँस में पढ़ जाने को आतुर हैं
दुनिया-जहान के विचार

अगर नीरस होते विचार
तो ऐसा क्यों चाहती आँखें
… वो भी तुम्हारी!


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