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ISSN 2292-9754

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10.21.2017


शायद उसको इश्क़ हुआ था

तुम्हारे साथ के लिए सूखता
तुम्हारे साथ भीगता रहा बारिश में

वो बेघर था
और उसने तुम्हारी हथेलियों में छप्पर जैसे ही देखे
वैसे ही उन तक पहुँचने के इए
लंबी से लंबी सड़क
छोटी पड़ने लगी उसके लिए

तुम दिखाई देतीं तो परिन्दे चहचहाते
दिखाई न देतीं तो अँधेरा उतर आता
सुबह-सुबह

उसके ग़ुस्से में तेल की तरह गिरते हुए बेरोज़गारी
ठिठक जाती कि बुरा न लग जाए तुम्हें
तुम्हारी हँसी से सिंचकर खिला हुआ फूल होता था वह
आशंका भी होती तुम्हारे आँसुओं की तो
पिघल उठता समूचा

वो आदमी तुम्हारे लिए
नीचे से ऊपर तक सिर्फ़ दुआ था
… शायद उसको इश्क़ हुआ था।


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