अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
11.09.2014


शंकर शेष की रंगभाषा
(ऐतिहासिक-पौराणिक कथानकों पर आधारित नाटकों के विशेष सन्दर्भ में)

संपादक : सुमन कुमार घई
तिथी : १५ नवम्बर, २०१४

शंकर शेष समकालीन प्रयोगधर्मी नाटककारों की परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके नाटकों में युगीन सन्दर्भों का सार्थक चित्रण हुआ है। आधुनिक बोध के साथ-साथ उनके नाटकों में रंगमंचीय व्यवस्था भी है। मंच-व्यवस्था को निकट से जानने के कारण शंकर शेष के नाटक पूरी तरह अभिनेय और आधुनिक रंगमंच के अनुरूप हैं। इसीलिए हिन्दी नाटककारों में उन्हें विशिष्ट स्थान प्राप्त है तथा उनके अधिकांश नाटक चर्चित रहे हैं।

हिन्दी में प्रारम्भ में रंगमंच का अभाव रहा है किन्तु समकालीन नाटककारों ने मंच की आवश्यकता का अनुभव किया। नाटककारों की रंगमंच-सापेक्ष दृष्टि से रंगमंच को प्रतिष्ठा मिलने लगी। इस कार्य में शंकर शेष जैसे नाटककारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने अपने नाटकों में रंगमंचीय दृष्टि से अनेक प्रयोग किए और हिन्दी रंगजगत् के लिए नवीन रंगभाषा की तलाश की। अतः यह स्वाभाविक है कि शंकर शेष के नाटकों के रंगमंचीय स्वरूप को ध्यान में रखकर उनके नाटकों की रंगभाषा के विभिन्न पहलुओं का सम्यक विवेचन किया जाए।

स्वातंत्र्योत्तर भारत की विसंगतियों को उभारने के लिए हिन्दी नाटककर अनेक प्रयोग कर रहे थे। जगदीशचंद्र माथुर, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि नाटककारों ने ऐतिहासिक-पौराणिक सन्दर्भों का आश्रय लेकर आधुनिक बोध को प्रस्तुत किया। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शंकर शेष ने मिथकीय और पौराणिक पात्रों को आधार बनाकर कई नाटकों की रचना की। इनमें ‘एक और द्रोणाचार्य’, ‘कोमल गांधार’, ‘अरे! मायावी सरोवर’, ‘कालजयी’ आदि नाट्य-कृतियों को महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इन सबमें ऐतिहासिक-पौराणिक सन्दर्भों के होते हुए भी सर्वत्र आधुनिक बोध विद्यमान् है और युगीन समस्याओं का ही चित्रण किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में यहाँ शंकर शेष के ऐतिहासिक-पौराणिक कथानकों पर आधारित प्रसिद्ध नाटकों का रंगमंच और रंगभाषिक दृष्टिकोण से संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

महाभारत के सन्दर्भों को आधुनिक सन्दर्भों से जोड़ने का अनूठा प्रयास नाटककर ने ‘एक और द्रोणाचार्य’ के माध्यम से किया है। "यह नाटक "वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, पक्षपात, असंगति-विसंगति के मध्य झूलते जीवन-आदर्श, शिक्षक समुदाय के पंगु, असहाय, बेबस और अपाहिज चरित्र को पौराणिक कथा के माध्यम से आंकलित करता है।"1 व्यवस्था पर आश्रित और सत्ता के दबाव के समक्ष विवश आज का अध्यापक-रूपी द्रोणाचार्य किस सीमा तक संवेदनाशून्य और पक्षपाती हो सकता है, ‘एक और द्रोणाचार्य’ इसका जीवंत चित्रण करता है। नाटक में इस आधुनिक द्रोणाचार्य को नाटककार ‘अरविंद’ के पात्र के रूप में प्रस्तुत करता है। यह नाटक महाभारत के एक पूरे सन्दर्भ को आधुनिक जीवन से जोड़ने की कोशिश है, इसलिए यहाँ दो कथाएँ समानांतर चलती हैं। दो दृश्य हमारे सामने खड़े होते हैं –एक, द्रोणाचार्य के जीवन का दृश्य और दूसरा अरविंद के जीवन का। एक, पौराणिक दृश्य और दूसरा आधुनिक। दोनों दृश्यों में घटनाओं की समानता है। घटनाओं की समानता के कारण ही दोनों ही दृश्य बिम्ब-प्रतिबिंब भाव से सम्पूर्ण नाटक में एक-दूसरे को रूपायित और व्याख्यायित करते चलते हैं। नाटक के शुरू से अंत तक नाटककर ने दृश्यत्व को दोहरे आयामों में व्यक्त किया है। "नाटककार यहाँ आधिकारिक अथवा प्रासंगिक कथा के चक्कर में न पड़कर अपनी उद्देश्यपूर्ति के निमित्त दोनों कथाओं को समानांतर विकसित करता है। वे स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे से गुंथी हैं। एक ओर अरविंद, उसके परिवार और कॉलेज के प्रसंग हैं और दूसरी ओर, द्रोणाचार्य, उनके परिवार और उनसे सम्बद्ध महाभारत-कालीन प्रसंग हैं।"2 अभिनेयता की दृष्टि से भी यह नाटक अनेक संभावनाएँ समेटे है। दार्शनिकता अथवा कवित्व की बोझिलता न होने के कारण नाटक में प्रयुक्त विचार सरलता और सहजता के साथ दर्शकों तक संप्रेषित होते हैं। नाटक में कहीं भी अनावश्यक दृश्य-योजना नहीं है। सम्पूर्ण नाटक को दो भागों में विभाजित किया गया है- एक पूर्वार्द्ध और दूसरा उत्तरार्द्ध। प्राचीन तथा आधुनिक, दोनों कथाएँ नाटक के दोनों भागों में समानांतर एक गति से नाटक के आरंभ से लेकर अंत तक चलती रहती हैं। दोनों कथाएँ परस्पर सम्बद्ध और एक-दूसरे की पूरक हैं।

इस नाटक में प्रकाश और ध्वनि को विशेष महत्व दिया गया है। ध्वनि और प्रकाश के माध्यम से युद्ध की विभिन्न घटनाओं और प्रसंगों को प्रस्तुत किया गया है। विविध प्रकार के प्रसंगों में विविध प्रकार की संगीत-योजना नाटक को गति देती है और प्रभाव बनाए रखती है। इस संबंध में जयदेव तनेजा का कहना है कि "यथार्थवादी दृश्य-बंध की जकड़ से स्वयं को मुक्त करके नाटककार ने कल्पनापूर्ण प्रकाश-संयोजन, संगीत तथा न्यूनतम मंच-उपकरणों के उपयोग से अतीत और वर्तमान के लगभग साथ-साथ लगातार चलते दृश्यों को प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की है।"3 स्थूल घटनाओं के साथ-साथ इस नाटक में ‘अरविंद’ का तीव्र मानसिक संघर्ष भी प्रकट हुआ है। ‘विमलेंदु’ के रूप में एक प्रेतात्मा की कल्पना भी की गई है। इन दोनों के लिए नेपथ्य में ध्वनि, प्रकाश और अंधकार की योजना की गई है जो प्रभावी है। नाटक में नाटककार ने ‘नाटक के अंतर्गत नाटक’ शैली का प्रयोग किया है। कुछ एक स्थलों पर बाह्य संघर्ष भी दर्शाए गए हैं लेकिन उनकी अपेक्षा अंतःसंघर्ष अधिक प्रभावपूर्ण बन सकते हैं। यह निर्देशक की प्रतिभा और कल्पना पर निर्भर है कि वह इन अंतःसंघर्षों की अभिव्यक्ति के लिए प्रकाश का उपयोग किस तरह करता है।

नाटक में अत्यंत मार्मिक और रंगोपयुक्त संवादों का प्रयोग किया गया है। "प्रभावशाली संवादों के माध्यम से ही पात्रों की कटुता, घृणा, विवशता, असहायता, पंगुता, अपाहिजता, समझौतावादी प्रवृत्ति, आदर्शवादी वृत्ति, उनकी आंतरिक भावनाओं और संवेदनाओं को सजीव अभिव्यक्ति मिल पाई है।"4 नाटक के संवादों में अद्भुत संप्रेषण शक्ति मौजूद है। कहीं-कहीं भाषा मुहावरेदार भी है, जैसे- ‘विरोध की बलि’5, ‘ईंट से ईंट बजाना’6 आदि, तो कहीं पात्रों का आक्रोश प्रकट करने के लिए रूखी और तीक्ष्ण भाषा का प्रयोग भी है – ‘छोड़ो ये सिद्धान्त-उद्धान्त की मूर्खता’7। नाटक का अंत कुशल भाषिक संवादीय संरचना, प्रश्न-चिह्नों, व्याकरणिक चिह्नों के कारण अधिक प्रभावशाली बन गया है – "विमलेन्दु – तू द्रोणाचार्य है। व्यवस्था और सत्ता के कोड़ों से पिटा हुआ द्रोणाचार्य- इतिहास की धार में लकड़ी के ठूँठ की तरह बहता हुआ- सड़ा-गला द्रोणाचार्य।.........तू किस बात का प्रोफेसर? तू तो द्रोणाचार्य है!........हाँ-हाँ तू.......द्रोणाचार्य है! एक और द्रोणाचार्य! एक और द्रोणाचार्य! एक और द्रोणाचार्य!"8 द्रोणाचार्य की ध्वनि के साथ पर्दा गिराकर नाटककार समस्या की गहनता और मध्यवर्गीय चरित्र की विवश अभिशप्तता को विवस्त्र कर देता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह नाटक कथ्य और शिल्प की नवीनता लेकर उपस्थित होने वाला एक प्रयोगशील नाटक है जिसमें मंचन की पर्याप्त संभावनाएं हैं। निर्देशक के लिए अनेक संकेतों से युक्त यह नाटक स्वातंत्र्योत्तर नाटक के इतिहास में शिल्प और शैली वैचित्र्य के कारण एक अलग व्यक्तित्व धारण करता है और एक नई रंगभाषा की रचना की संभावनाओं के द्वार खोलता है।

पौराणिक कथानक पर आधारित नाटक ‘कोमल गांधार’ का मूल उद्देश्य भी पुराण कथा को दोहराना नहीं वरन् उसके नए आयामों को प्रस्तुत करना ही है। शंकर शेष ने गांधारी के जीवन-संघर्ष का उद्घाटन इस नाटक में बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है। नाटक के मध्य में गांधारी के इस संघर्ष का विस्तार दिखाई देता है। इस नाटक को दो भागों में विभाजित किया गया है – पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध। नाटक की सम्पूर्ण कथा भावों के आंदोलन पर खड़ी है। कथा की भावुकता ही इस नाटक की सबसे बड़ी शक्ति है। गिनी-चुनी घटनाओं के होने से नाटक के संवाद ही सारा काम कर देते हैं। धृतराष्ट्र और गांधारी का संघर्ष अंत तक बना रहता है। नाटककार ने इस नाटक को बड़े सशक्त ढंग से दर्शन और चिंतन के धरातल पर प्रस्तुत करने में सफलता पाई है। महाभारत-कालीन समाज व्यवस्था को चित्रित कर नाटककार ने स्त्री पर होने वाले युग-युग के अत्याचार को बड़े सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। साथ ही, नारी जीवन के कोमल गांधार को छीनने वाली हमारी व्यवस्था पर भी प्रश्न-चिह्न लगाया है। जयदेव तनेजा के शब्दों में, "कोमल गांधार महाभारत के पौराणिक परिदृश्य में पुरुष द्वारा नारी के शोषण की सनातन परंपरा और उसके विरुद्ध एक नारी के निजी विद्रोह की त्रासदी का मार्मिक चित्रण करता है।"9

नाटक में दृश्य-परिवर्तन के लिए नाटककार ‘ब्लैक-आउट’ पद्धति का उपयोग करता है। रंगमंच पर दृश्य की समाप्ति के साथ ही अंधेरा छा जाता है और प्रकाश के साथ नया दृश्य आँखों के सामने आ जाता है। इस संबंध में जयदेव तनेजा कहते हैं कि "मंच-सज्जा और दृश्यों का उल्लेख न करके नाटककार ने केवल छायालोक के माध्यम से ही दृश्यांतर किया है और इस प्रकार कई छोटे-छोटे दृश्यांतरों द्वारा समय एवं घटनाओं के लंबे फैलाव को अपने में समेट लिया है।"10 पूरे नाटक में इस प्रकार का प्रयोग नाटककार करता जाता है। दृश्य-परिवर्तन से नए दृश्य के साथ समय का अंतराल भी स्पष्ट होता जाता है। इस नाटक में साधारणतः पचास वर्ष के समय का अंतराल विद्यमान् है। नाटक की कथा का आरंभ गांधारी के हस्तिनापुर आगमन की यात्रा से होता है और इसका समापन वृद्धावस्था में गांधारी और धृतराष्ट्र के दावानल-प्रवेश से होता है। सारा घटनाक्रम इन्हीं पचास वर्षों की कालावधि में समेटा गया है। नाटककार ने पात्रों की वेषभूषा के विषय में कोई चर्चा नहीं की है। यह पौराणिक विषय-वस्तु का वहन करने वाली नाट्यकृति है, अतः स्वाभाविक है कि पात्रों की वेशभूषा ऐसी होनी चाहिए जिससे नाटक पौराणिक लगे। नाटक की भाषा अत्यंत चुस्त एवं स्वाभाविक है जिसका नाटक की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। नाटक में हमें कोई निरर्थक शब्द दिखाई नहीं देता। एक शब्द दूसरे शब्द से मिलकर एक लय पैदा होती है जो नाटककार के भावों को अभिव्यक्त कर दर्शकों पर गंभीर प्रभाव डालती है। प्राचीन कथा-बीजों तथा पात्रों के नए अन्वय को खोजने के उद्देश्य से लिखी इस कृति में नाटककार ने विश्लेषणात्मक शैली को अपनाकर इस कृति को वैचारिक धरातल पर प्रौढ़ एवं गंभीर बना दिया है। पौराणिक कथा होने पर भी कहीं भी अनावश्यक संस्कृत-प्रचुरता नहीं लाई गई है जिससे कृति की बोधगम्यता बढ़ी है। कहा जा सकता है कि इस नाटक की भाषा पात्रानुकूल, साहित्यिक किन्तु अकृत्रिम और प्रेषणीयता लिए हुए है। इससे नाटक की गरिमा बढ़ी है और नाटक मंचन की दृष्टि से सफल बन पाया है।

जिस नाटक की संवाद-योजना चुस्त और चुटीली होती है वही नाटक रसमयता प्रदान करने में सफलता प्राप्त कर सकता है। अतः सफल नाटक के लिए नाटक के संवादों का छोटे और स्वाभाविक होना आवश्यक होता है। ‘कोमल गांधार’ के अधिकांश संवाद संक्षिप्त, चुटीले और सारगर्भित बने हैं। कुछ स्थानों पर स्वगत कथन का भी प्रयोग किया गया है, जैसे संजय के मानसिक घात-प्रतिघात के चित्रण के लिए, किन्तु यह अखरता नहीं बल्कि नाटक की संवेदना में वृद्धि ही करता है। नाटक में काव्यमयी भाषा का भी प्रयोग किया गया है जिससे संवादों की मार्मिकता बढ़ती है। ध्वनि, संगीत आदि का प्रसंगानुकूल प्रयोग नाटक में किया जा सकता है। इसकी अनेक संभावनाएं नाटक के विभिन्न प्रसंगों मे मौजूद है, जैसे गांधारी के विवाह की तैयारियों का वर्णन, युद्ध के पश्चात् का वर्णन आदि। अर्थ की गूंज को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए नाटककार ने स्थान-स्थान पर बिन्दु-चिह्नों का प्रयोग किया है। ‘चौंककर’, ‘आवेग में’, ‘असमंजस में’, ‘बेचैन होकर’, ‘थके स्वर में’ आदि संकेतों का प्रयोग है जिससे निर्देशन और अभिनय में सहायता मिलती है तथा नाटक की संप्रेषणीयता में वृद्धि होती है।

‘कोमल गांधार’ को रंगमंच पर प्रस्तुत करते हुए किसी प्रकार की विशेष रंग-सज्जा का आयोजन नहीं करना पड़ता। पौराणिक आधार होने के कारण मंच पर देश, काल तथा वातावरण के चित्रण की पर्याप्त संभावनाएं होने पर भी नाटककार ने इस तरफ बहुत संकेत नहीं किया है, क्योंकि उनका उद्देश्य पौराणिक कथा को दोहराना नहीं बल्कि उन्हें नए आयामों में प्रस्तुत करना है। इस कारण संवादों के बल पर ही काल-बोध कराया गया है और इन्हीं के माध्यम से अधिकाधिक परिवेश-निर्माण की कोशिश की गई है। नाटक में एक के बाद एक दृश्य बदलते रहते हैं। नाटककार स्वयं इस प्रकार की सूचना देता जाता है। पात्रों की उम्र, उनकी वेशभूषा, उनकी बदलती हुई भाव-भंगिमाओं तथा नाटक की प्रकाश-योजना का संकेत यथास्थान नाटककार स्वयं कर देता है, इसलिए निर्देशक को विशेष आयोजन और चिंतन की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसे, नाटक के उत्तरार्द्ध के आरंभ में – "गांधारी अब वृद्ध हो गई है। धृतराष्ट्र उसके पास ही बैठा है।"11 नाटक में पात्रों का जमघट नहीं है, केवल सात पात्र ही दर्शकों के सामने आते हैं। मंच पर एक साथ चार पात्रों से अधिक पात्र इकट्ठा नहीं होते, इसलिए दर्शकों का ध्यान इधर-उधर नहीं बँटता। रंगमंच पर उपस्थित सभी पात्रों को नाटककार ने सक्रिय दिखाया है और उन्हें अभिनय का उचित अवसर प्रदान किया है। अतः अभिनय की दृष्टि से ‘कोमल गांधार’ की पात्र-योजना बेहद सफल है, क्योंकि पात्रों की संख्या मर्यादित है तथा पात्रों के चरित्रांकन में पूर्ण व्यवस्था दिखाई देती है। नाटक में किसी भी अनावश्यक दृश्य का आयोजन नहीं हुआ है। न कोई गीत है, न कोई नृत्य, किन्तु निर्देशक के लिए अपने विवेकानुसार प्रसंग के अनुकूल ध्वनि और संगीत के प्रयोग की पर्याप्त संभावनाएं नाटककार ने छोड़ी हैं। इस प्रकार, संवादों की सम्प्रेषणीयता, काव्यमयी भाषा, अभिनय की पर्याप्त संभावना, ध्वनि, संगीत, प्रकाश के प्रसंगानुकूल प्रयोग और अन्य रंगमंचीय उपकरणों के संयोजन से एक संश्लिष्ट और सार्थक रंगभाषा की रचना करने में यह नाटक पूरी तरह सफल सिद्ध होता है।

लोकनाट्य परम्परा का निर्वाह करने वाला नाटक ‘अरे! मायावी सरोवर’ नौटंकी शैली में रचा गया है। नौटंकी नाटक प्राय: पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं। इस नाटक की कथा भी प्राचीन है और राजा इल्वलु तथा रानी सुजाता जैसे पौराणिक पात्रों को हमारे सामने प्रस्तुत करती है। नाटक ने यहां पुराण और इतिहास के साथ-साथ वर्तमान का भी समन्वय किया है। पौराणिक स्पर्श के साथ-साथ ऐतिहासिकता के आधार पर निर्मित कथा में अधिकाधिक आधुनिक सन्दर्भों को डालकर नाटककार ने समकलीन दर्शकों के लिए इसे बोधगम्य बनाया है।

यह नाटक पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध, दो भागों में विभाजित है। नाटक की कथा संक्षिप्त होते हुए भी रोचक है। अंत तक दर्शकों की उत्सुकता बनी रहती है। नाटक की सम्पूर्ण कथा का कौतूहल चरमसीमा की ओर लगातार बढ़ता रहता है। कथा के विकास में कहीं कोई अवरोध नहीं है। नौटंकी शैली के सभी नाटकों में अलौकिक घटनाएं नित्य होती रहती हैं। सूत्रधार इन अलौकिक घटनाओं के समय उपस्थित रहकर कथासूत्र को जोड़ने का काम करता है। लोकनाट्य की परम्परा में सूत्रधार अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि नाटक के पात्र, नाटक के प्रसंग तथा नाटक के दृश्य आदि का परिचय दर्शकों से कराने का महत्वपूर्ण कार्य वही करता है। इस नाटक में भी सूत्रधार ये सारे कार्य करता है। साथ ही, आवश्यकतानुसार कई पात्रों की भूमिका निभाने का, नाटक के कथा-प्रसंगों को जोड़ने का तथा चरित्रों पर टिप्पणी करने का काम भी वह करता रहता है। इस प्रकार के नाटक संगीत तथा नृत्य-प्रधान होते हैं। नाटक में प्रयुक्त संगीत तत्व का पालन ढोलक तथा मंजीरा बजाने वाले करते रह्ते हैं। सम्पूर्ण नाटक में जो भी दृश्य हैं, वे सभी काल्पनिक हैं और दर्शक कल्पना के सहारे उनका रस ग्रहण करते हैं। नाटक में विचित्र वन और उसकी सारी अलौकिकता की कल्पना ही की जाती है। इसी कारण इस नाटक में रंगमंचीय साज-सज्जा की कोई आवश्यकता नहीं है और इसे कहीं भी आसानी से खेला जा सकता है। स्थान-स्थान पर नाटककार ने रंग-निर्देश भी दिए हैं जो मंचन के समय निर्देशक के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।

नौटंकी शैली के कारण नाटक में गीतों का प्रयोग अनिवार्यत: हुआ है। गणेश वन्दना से नाटक का आरम्भ होता है और नाटक का अंत भी गीत से ही होता है। नाटक में कुल मिलाकर चौदह गीत हैं। नाटक के वातावरण की सृष्टि, कथा-प्रसंग की अनुकूलता, करुण रस एवं वीरतापूर्ण भावों के उद्दीपन, पात्रों के मनोभावों के चित्रण, रोचकता के निर्माण तथा दर्शकों के मनोरंजन के लिए यथास्थान इन गीतों का प्रयोग किया गया है, जिससे यह नाटक एक "संगीतमय फैंटेसी" बन गया है। इसी प्रकार, नाटक में नृत्य का भी रोचक प्रयोग किया गया है। राजा (स्त्री) और ऋषि साथ-साथ मादक नृत्य करते हैं। लय, ताल और गति का भी सुन्दर प्रयोग नाटक में सर्वत्र दिखाई देता है। राजा प्रथम बार संगीत की ताल पर ही पग धरता हुआ रंगमंच पर आता है। रानी भी इसी प्रकार गीत की ताल पर रंगमंच पर प्रवेश करती है। शबरी नारायण तीर्थ करते समय भी राजा-रानी इस प्रकार चलते हैं जैसे रामलीला में राम और सीता। नाटक में उपस्थित वाद्यवृन्द की कोई निश्चित संख्या नहीं बताई गई है। पूरे नाटक के दौरान वे मंच के एक कोने में बैठे रहते हैं। इसी प्रकार, गायक वृन्द की भी कोई निश्चित संख्या नाटककार ने नहीं बताई है। प्रत्येक पात्र को अपना अभिनय करने के लिए उचित अवसर दिया गया है। अत: अभिनय की दृष्टि से नाटक के सभी पात्रों की योजना अत्यंत सफल रही है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही डॉ. सुरेश गौतम और वीणा गौतम इस नाटक को "अभिनय और संगीत का अनूठा संगम"12 बताते हैं।

नाटक की भाषा सरल और सुबोध है तथा संवादों में एक अलग प्रकार का स्वाद है। नाटककार ने संवादों में प्रतीकात्मकता, बेतुकेपन और व्यंग्य का भरसक प्रयोग कर वर्तमान परिवेश की विसंगति को मूर्त रूप दिया है। नृत्यों और गीतों में हास्य तथा व्यंग्य स्थायी रूप में उपस्थित होता नज़र आता है। सारे गीत बड़े ही सुबोध विधान में लिखे गए हैं तथा लोकगीतों की विभिन्न पद्धतियों का निर्वाह करते हैं। नृत्य भी बड़े आकर्षक हैं। नाटक की कथा को रोचक बनाने के लिए नाटक के प्रसंगों को हास्य-व्यंग्य पर चित्रित किया गया है। यहाँ अनेक प्रसंग उल्लेखनीय हैं जैसे पुरुष राजा का स्त्री में रूपांतर, कुछ पात्रों को विभिन्न जानवरों के मास्क लगाकर प्रस्तुत करने का प्रयोग- ‘उल्लू’ यहाँ विचित्र वन के विद्यापीठ के कुलपति के रूप में सामने आता है, ‘गाय’ डेयरी कॉरपोरेशन की मैनेजिंग डायरेक्टर है, ‘कुत्ता’ यहाँ संपादक है, आदि। इस प्रकार पूरे नाटक में हास्य-व्यंग्य की बौछार है किन्तु इनका प्रयोग सांकेतिक भी है। इन विसंगत तत्वों के माध्यम से प्रस्थापित व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया गया है। केवल मनोरंजन ही नहीं समाज-प्रबोधन भी यहाँ उद्देश्य है। नाटक के माध्यम से नाटककार दर्शाता है कि स्त्री का जीवन पुरुष के जीवन से अधिक सार्थक, सृजनशील और समर्पण-भरा होता है। पुरुष जल्दी समाप्त हो जाता है और स्वयं को जल्दी दोहराने लगता है। कुल-मिलाकर यह नाटक अपनी संगीतमय दृष्टि और दिलचस्प रंग-शैली के कारण रोचक सिद्ध हुआ है। हिन्दी की प्रायोगिक रंगभूमि पर नए कीर्तिमान स्थापित करने वाली कृतियों में इसका विशिष्ट स्थान है। इसमे कोई शक नहीं है कि यह नाट्य कृति हमारी लोकनाट्य परम्पराओं के आधार पर एक रोचक रंगभाषा की रचना करती है और हिन्दी रंगमंच को हमारी अपनी भारतीय परम्पराओं के और निकट ले आती है।

"कालजयी" नाटक में नाटककार ऐतिहासिक कथा के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष की व्याख्या करता है। डॉ. सुरेश गौतम और वीणा गौतम के अनुसार, "वस्तुतः यहाँ पौराणिक आधार न होकर उसका आभास मात्र है जिसके माध्यम से उन्होंने (नाटककार ने) राजतंत्र और प्रजातन्त्र के संघर्ष को रूपायित किया है।"13 दूसरे शब्दों में, इसमें राजतंत्र की जनविरोधी व्यवस्था से लोकतंत्र की जनपक्षीय व्यवस्था तक के संघर्ष का चित्रण किया गया है। नाटक का कथानक संक्षिप्त है, साथ ही चुस्त और रोचक भी। किसी प्रकार की अरुचिकर और असंभव घटनाओं का निर्माण नहीं हुआ है। दर्शक की उत्सुकता प्रत्येक घटनाक्रम के साथ बनी रहती है। कुल-मिलाकर इस नाटक में पाँच दृश्य हैं और ये सभी दृश्य कुल दो स्थानों पर मूर्त रूप लेते हैं। पहला स्थान है राजा कालजयी के राजमहल का प्रकोष्ठ तथा दूसरा स्थान है एक गहन गुफा। अतः सम्पूर्ण नाटक के दृश्यबंध को दो भागों में बाँटकर प्रस्तुत किया जा सकता है। नाटक की सम्पूर्ण कथा पाँच भागों में विभाजित है जिससे दृश्य परिवर्तन का अत्यधिक महत्व है। राजमहल का प्रकोष्ठ बड़े आकार का है और राजसिक साज-सज्जा से परिपूर्ण है। मंच की रूपरेखा के संदर्भ में नाटककार का स्पष्ट मत है कि यह मंच की सामान्य रूपरेखा ही है। निर्देशक को मंचीय साज-सज्जा की छूट देते हुए वे कहते हैं कि "दिग्दर्शक जिस काल से नाटक के वातावरण को सम्बद्ध करना चाहे तदनुसार मंच-सज्जा की स्वरूप रचना कर सकते हैं, क्योंकि नाटक किसी काल-विशेष के ऐतिहासिक बोध से बंधा न होकर, केवल ऐतिहासिकता के परिवेश की ही अपेक्षा रखता है।"14 गुफा का आकार बड़ा है। उसमें जगह-जगह अस्त्र-शस्त्र रखे हैं और बीच में स्वतंत्रता की देवी की प्रतिमा है। बहुत सारे शिलाखण्ड भी हैं।

पात्रों की बदलती भाव-भंगिमाएँ, उनकी वेशभूषा, आयु, प्रकाश-योजना आदि के संबंध में नाटककार द्वारा दिए गए रंग-निर्देश नाटक की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं क्योंकि इनसे निर्देशक की कठिनाई दूर हो जाती है और अभिनेताओं को भी अभिनय करते वक्त कोई कठिनाई महसूस नहीं होती। इस प्रकार के संकेत नाटककार ने इस नाटक में स्थान-स्थान पर तथा समय-समय पर दिए हैं जिससे नाटक में चुस्ती आ गई है और अभिनेताओं को क्या करना है इसकी जानकारी मिल जाती है। नाटक में ध्वनि और प्रकाश के प्रयोग की भी काफी संभावनाएं हैं। इनकी कुशल व्यवस्था पर नाटक की मंचीय सफलता काफी निर्भर करेगी। नाटक का आरंभ ही नेपथ्य में संगीत के स्वर के साथ होता है। राजा द्वारा न्यायकेतु और विजयकेतु की हत्या के वक्त उनकी चीखें, गुफा में की गई प्रतिज्ञा का सामूहिक स्वर, समवेत स्वर की गूंज, नेपथ्य में कोलाहल, त्रस्त जनता के नारों की गगनभेदी आवाज़ें, भगदड़, मारकाट, चीखों का मर्मांतक स्वर, रोंगटे खड़े कर देने वाली चीत्कारें, मृत्यु का तांडव, तोपों की गड़गड़ाहट, प्रकाश का कभी मंद पड़ जाना, कभी किसी विशेष स्थान पर केन्द्रित हो जाना, ऐसी अनेक रंग-युक्तियों के माध्यम से नाटककार ने एक प्रभावशाली रंगभाषा की रचना का प्रयास किया है और नाटक की अभिनेयता को बहुत ही संभावनायुक्त बनाया है। नाटक में पात्रों की अधिकता तो है किन्तु सभी पात्रों के लिए अभिनय के उचित अवसर उपलब्ध हैं। मंचीय सक्रियता के कारण वे दर्शकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ सकते हैं। नाटककार को पात्रों के चरित्रांकन में सफलता मिली है। नाटक में नृत्य और गीत का कोई आयोजन नहीं है। पात्र और देश-काल के अनुसार इस नाटक के वातावरण का निर्माण हो जाने से नाटक सभी दृष्टि से अभिनेय बन गया है। विभिन्न रंग-युक्तियों और आधुनिक तकनीकों द्वारा रंगभाषा की रचना के नज़रिए से इस नाटक में काफी संभावनाएं मौजूद हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि शंकर शेष ने ऐतिहासिक और पौराणिक आधार वाले अपने नाटकों के माध्यम से वर्तमान समाज से जुड़े विभिन्न प्रश्नों और समस्याओं को उठाया तथा हिन्दी नाट्य जगत में नए-नए प्रयोग कर भारतीय पारंपरिक नाट्य शैलियों और पाश्चात्य नाट्य शैलियों के समुचित संयोजन से नई रंगभाषा तलाशने का सफल प्रयास किया।

संदर्भ ग्रंथ सूची:-

1. राजपथ से जनपथ नटशिल्पी शंकर शेष- डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986- पृ.109।
2. राजपथ से जनपथ नटशिल्पी शंकर शेष- डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986-पृ. 111।
3. समकालीन हिन्दी नाटक और रंगमंच- जयदेव तनेजा, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 1978, पृ. 42।
4. राजपथ से जनपथ नटशिल्पी शंकर शेष- डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986-पृ. 115।
5. ‘एक और द्रोणाचार्य’,समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-2, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.100 ।
6. ‘एक और द्रोणाचार्य’,समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-2, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.100 ।
7. ‘एक और द्रोणाचार्य’,समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-2, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.94 ।
8. ‘एक और द्रोणाचार्य’,समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-2, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.100 ।
9. नई रंग-चेतना और हिन्दी नाटककार-जयदेव तनेजा, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली-1994, पृ. 142 ।
10. नई रंग-चेतना और हिन्दी नाटककार- जयदेव तनेजा, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली-1994, पृ. 143 ।
11. ‘कोमल गांधार’, समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-1, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.142 ।
12. राजपथ से जनपथ नटशिल्पी शंकर शेष- डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986-पृ.135।
13. राजपथ से जनपथ नटशिल्पी शंकर शेष- डॉ. सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986-पृ.116।
14. प्रथम दृश्य का रंग संकेत, ‘कालजयी’, समग्र नाटक, शंकर शेष, भाग-1, सं. हेमंत कुकरेती, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ.144 ।

शोध सारांश

स्वतन्त्रता के पश्चात् हमें हिन्दी नाट्य जगत् में एक नई रंग चेतना और नवोन्मेष दिखाई देता है।अब समसामयिक रंगमंच के लिए अपने पारंपरिक रंगमंच की खोज और जिज्ञासा स्वाभाविक हो गई। यह समझा जाने लगा कि अपने पारंपरिक नाट्य तत्वों को नई कलात्मक दृष्टि से अपनाकर ही हम पश्चिमी रंग तत्वों का प्रयोग भी अधिक कलात्मक रूप से कर सकेंगे, अतः नए नाटककार अब नवीन और मौलिक रंगभाषा की तलाश में जुट गए। ऐसे नए प्रयोगधर्मी नाटककारों में शंकर शेष का स्थान विशिष्ट माना जा सकता है।1955 से लेकर 1981 तक की अपनी सर्जन-यात्रा में इन्होंने अपने विभिन्न नाटकों के माध्यम से लोकधर्मी और नाट्यधर्मी परम्पराओं का निर्वाह कर हिन्दी नाट्य जगत को गौरवान्वित किया है। यद्यपि इनके सभी नाटक मंचन, सम्प्रेषण, कथ्य, शिल्प, भाषा और अभिनेयता की दृष्टि से विशिष्ट एवं प्रयोगधर्मी सिद्ध हुए, किन्तु मिथकीय और पौराणिक पात्रों को आधार बनाकर रचे गए नाटकों की रंगभाषा यहाँ विशेष उल्लेखनीय है। इन नाटको में शंकर शेष ने ऐतिहासिक-पौराणिक संदर्भों का आश्रय लेकर आधुनिक बोध को प्रस्तुत किया है।

विकास वर्मा
शोधार्थी, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,
ग्रेटर नोएडा, गौतम बुद्ध नगर,
उत्तर प्रदेश।

आवासीय पता –डी,610,गोविंदपुरम,
हापुड़ रोड,गाज़ियाबाद,
उ॰प्र॰-201013
मो॰9313325170


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें