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ISSN 2292-9754

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12.15.2014


हिन्दी रंग यात्रा के महत्‍वपूर्ण पड़ाव: एक सिंहावलोकन

 आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच का इतिहास मोटे तौर पर 19वीं शताब्दी के मध्य से आरम्भ होता है। तब से आज तक इस यात्रा में कई पड़ाव आए हैं, कई नाट्य-चिंतकों और नाटककारों ने समय-समय पर अपने नाट्य-सम्बंधी विचारों और रंग चिंतन से हिन्दी नाट्य जगत् में नवीन आयाम जोड़े हैं, उसे नई दिशाओं में अग्रसर करने का प्रयास किया है। हिन्दी नाट्य की इस विकास-यात्रा में स्वभावतः हिन्दी रंग-चेतना भी नए-नए स्वरूप ग्रहण करती रही है और मंचन की प्रक्रिया में हिन्दी नाटकों को रंगमंचीय सार्थकता और नवीनता प्रदान करती रही है। विशेषतः स्वतंत्रता के पश्चात् आज़ादी के नवीन वातावरण में एक स्वतंत्र सांस्कृतिक चेतना की अनुभूति ने अन्य बातों के साथ-साथ हिन्दी रंग-आंदोलन को भी एक विशेष गति दी तथा हमारी अपनी रंग परम्पराओं के अन्वेषण के कार्य को विशेष बल मिला। इसके परिणामस्वरूप हिन्दी रंगकर्मियों ने अनेक नवीन रंग प्रयोग किए तथा आधुनिक सन्दर्भों में भारत की अपनी रंग परम्पराओं का सदुपयोग करते हुए नई और स्वस्थ रंगभाषा की रचना का प्रयास किया।

सर्वप्रथम, हिन्दी नाट्य जगत् पर पारसी थिएटर और उसके रंगबोध का सर्वव्यापी और चिरस्थायी प्रभाव पड़ा। यह पारसी रंगमंच की ही परम्परा थी कि हिन्दी नाटकों, फि‍ल्‍मों और हमारे जनमानस पर इसका प्रभाव किसी न किसी रूप में आज भी कायम है। 20वीं सदी के आरम्भ में हिन्दी-पारसी थियेटर का विकास हुआ। इसका मुख्य प्रयोजन कला से कहीं बढ़कर मनोरंजन, लोकप्रियता तथा धनोपार्जन रहा। अपने-अपने इलाके की लोक रंग-विधि‍यों से उन्होंने वह सब कुछ अपनाया जिससे प्रदर्शन में प्रभविष्णुता बढ़े। इनके प्रस्तुतीकरण के मूल तत्‍व हो गए अतिरंजना, अतिनाटकीयता, चमत्कार और उत्तेजना। भाषा उर्दूनिष्ठ रही परन्तु अधि‍क कोमल और ललित हो गई। संगीत में ग़ज़ल-ठुमरी को सँवारा गया। संवाद में चुलबुलापन लाने के लिए तुकंबदी और शेरोशायरी का सहारा लिया गया। चरित्र-चित्रण पर कम तथा कथानक और उसमें भी आकस्मिक परिवर्तन पर अधि‍क ज़ोर दिया गया। इन नाटकों का समापन सुखांत तो होना ही था पर नाटककार शिक्षा और उपदेश का पैबन्द लगाना नहीं भूले। प्रत्येक स्तर पर दर्शक को चौंकाए रखना और उसे आश्चर्यचकित कर देना प्रमुख हो गया। इसके लिए प्रत्येक प्रस्तुति में कुछ चमत्कारपूर्ण दृश्यों का अवश्य विधान होने लगा। तड़क-भड़क वाले भव्य और स्थूल दृश्यबंध, बड़े-बड़े चित्रमयी पर्दों का प्रयोग, आग, पानी, आँधी के दृश्य, अभिनेता की कड़कदार आवाज़ आदि तत्‍व सभी प्रस्तुतियों में सामान्यतः शामिल किए जाने लगे।

कुल मिलाकर, पारसी थियेटर की रंग दृष्टि ने एक नवीन रंग संसार का निर्माण किया। इस रंगमंच ने एक ऐसी रंगभाषा की रचना की जिसमें कलात्मक सूक्ष्मता तो नहीं थी लेकिन प्रदर्शन से जुड़ी स्थूलता और भव्यता अवश्य विद्यमान् थी, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के आधार पर व्यावसायिक लाभ कमाना था। इसने हिन्दी को एक रंगमंच तो दिया किन्तु ‘एस्थेटिक सेंस’ यानी सौन्दर्यबोध इस रंगमंच के लिए आवश्यक नहीं समझा गया। कलात्मक अनुभूति की कमी, अतिनाटकीयता और व्यावसायिकता ही बाद में इसके ह्रास के सबसे बड़े कारण बनें। धीरे-धीरे विकसित और जागृत होता भारतीय समाज, विशेषकर बौद्धि‍क वर्ग अतिनाटकीयता से हटकर यथार्थ की तरफ बढ़ने लगा था। अतिनाटकीयता के स्थान पर नाटककार ने सांकेतिक रंगमंच से काम लेना शुरू कर दिया था। भारतेन्दु सबसे पहले नाटककार और रंगकर्मी थे जिन्होंने इस अतिनाटकीयता और फूहड़ता के विरोध में हिन्दी के नाटकों को एक नई कलात्मक दिशा प्रदान की।

भारतेन्दु एक ऐसे रंगमंच को जन्म देना चाहते थे जो जन-आंदोलन के लिए उपयोगी हो सके। इनकी रंग योजना में सरल एवं सुलभ उपकरणों से काम लिया जाता था क्योंकि शौकिया तौर पर नाटक खेलने वाले रंगकर्मी ही इस रंगमंच पर नाटक प्रस्तुत करते थे। इसलिए भारतेन्दु के नाटकों में रंगविधान तथा अभिनय के जो रूप मिलते हैं वे सरल और सुकर होते हैं। पारसी रंगमंच जैसी अलंकृत और आडम्बरी रंग सज्जा की यहाँ ज़रूरत नहीं पड़ती। नाटक का सम्बंध भारतेन्दु ने अनिवार्यतः नट अथवा अभिनेता से जोड़ा है। इसी कारण नाटक को वे नट लेागों की क्रिया मानते हैं। नाटक को अपनी प्रकृति में ही अभिनय और अभिनेता से जोड़कर उन्होंने नाटक को कोरा साहित्यिक विषय मानने वालों की भ्रांति दूर की है। भारतेन्दु द्वारा बताए गए अभिनय के विभिन्न भेद- आंगिक, वाचिक, सात्विक एवं आहार्य आदि भरतमुनि द्वारा उल्लिखित भेदों का ही अविकल अनुवाद प्रतीत होते हैं, परन्तु यदि देखा जाए तो अभिनय के यही प्रकार आज तक भी प्रचलित हैं जिनमें कोई फेरबदल न हुआ है और न ही होने की संभावना है। यहाँ हमें ज्ञात होता है कि भारतेन्दु इस तथ्य से पूर्णतः अवगत थे कि रंगक्रिया को पूर्णता प्रदान करने में अभिनय एक अत्यंत महत्‍वपूर्ण संघटक होता है। भारतेन्दु ने अभिनय के अंतर्गत ही पात्रों की वेशभूषा और संगीत की चर्चा भी की है। उनका सुझाव है कि पात्रों की वेशभूषा स्वभाव और अवस्था के अनुसार बदल देनी चाहिए। इसी प्रकार, संगीत को नाट्य-प्रदर्शन का आवश्यक तत्‍व मानते हुए, दृश्य-परिवर्तन के समय उपयुक्त संगीत की व्यवस्था को वे प्रभावकारी मानते हैं।

नाटक की भाषा के सम्बंध में भारतेन्दु स्वभाव रक्षा को अपरिहार्य मानते हें। असंस्कृत पात्रों के मुख से अधि‍क तत्सम शब्दावली युक्त भाषा नाटक में अस्वाभाविक दोष ला देगी। नाटक की भाषा सर्वत्र एक-सी हो, ऐसा उन्हें मान्य नहीं। इस प्रकार का विधान नाटक की बातचीत में स्वाभाविकता लाने के लिए किया गया है। वास्तव में उन्‍होंने रस को नाटक का चरम लक्ष्य माना है और भाषा आदि उपकरण इस लक्ष्य-प्राप्ति में साधन होने के कारण वे इसकी स्वाभाविकता और औचित्य पर बल देते हैं। उनके अनुसार साधारण बोलचाल की व्यावहारिक भाषा होने से नाटक की सर्वग्राह्यता बढ़ती है। भारतेन्दु ने नवीन नाटक की नई रंग-रूढ़ियाँ मुख्यतः बंगला नाटक और रंगमंच की प्रेरणास्वरूप ग्रहण कीं। उनकी रंगचेतना को सम्पन्न करने वाला दूसरा प्रेरणास्रोत रहा परम्पराशील लोक नाटक। इस नाटक के लोकधर्मी स्वरूप अर्थात् शास्त्र के चौखटे से मुक्त प्रथाओं, उत्सवों, त्यौहारों तथा रीति-रिवाज़ों पर आधारित सहज-स्वच्छंद रंग विधान ने भारतेन्दु को अनुप्राणित किया। रामलीला, रासलीला, नौटंकी, स्वांग आदि लोक रंग शैलियों-रूढ़ियों ने उन्हें काफी प्रेरित-प्रभावित किया है। वस्तुतः भारतेन्दु अपने नाटकों में लोकधर्मि‍ता के ज़रिए पुनर्जागरण के लिए प्रयत्नशील थे।

कुल मिलाकर, रंग दृष्टि से भारतेन्दु अपने नाटकों में अंत तक प्रयोगशील रहे। ये प्रयोग एक-दूसरे से भिन्न और नवीन रंग प्रयोग हैं। इनमें मूल क्रियाशील प्रवृत्ति रही नवजागरण से प्रतिबद्धता जो नाटककार को नई दिशाओं में उन्मेष के लिए प्रेरित करती रही। वास्तव में, भारतेन्दु ने युग की प्रवृत्ति को पहचाना और उसके अनुरूप ही अपने नाट्य चिंतन को ढालने का प्रयत्न करके एक नवीन रंगभाषा के स्वरूप-निर्माण और उसके विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की तथा प्रसाद जैसे भावी नाटककारों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया।

प्रसाद के समय में हिन्दी रंग जगत पर पारसी रंगमंच का आधि‍पत्य स्थापित था जिसके प्रति उनके मन में स्वाभाविक अरुचि थी। उन्‍होंने इस रंगमंच से समझौता करने की अपेक्षा इससे विद्रोह किया क्योंकि उनके अनुसार यह छिछोरे श्रृंगार तथा चमत्कारपूर्ण दृश्यों के बल पर जी रहा था। वे रंगमंच को ऊर्ध्वमुखी होता देखना चाहते थे जिससे वह अपने को नाटक की भावभूमि तक ऊपर उठा सके। इसी भावना से उन्‍होंने कहा था -‘‘रंगमंच के सम्बंध में एक भारी भ्रम है कि नाटक रंगमंच के लिए लिखे जाएँ। प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि नाटक के लिए रंगमंच हो, जो व्यावहारिक है।’’1 प्रसाद ने जो कहा नकार के रूप में नहीं वरन् एक खास सन्दर्भ में कहा। अगर उन्हें अपनी अवधारणा का रंगमंच मिल जाता तो वे ऐसा कभी न कहते। जहाँ उन्‍होंने यह कहा कि रंगमंच नाटक के लिए होना चाहिए, वहाँ तुरंत बाद में यह भी कहा कि - ‘‘रंगमंच पर सुशिक्षित और कुशल अभिनेता तथा मर्मज्ञ सूत्रधार के सहयोग की आवश्यकता है।’’2

वस्तुतः प्रसाद को मन का रंगमंच नहीं मिला किन्तु उनका कथ्य नाटकीयता से परिपूर्ण है। नाटक के कथ्य में जितनी अधि‍क नाटकीयता, अनुभूति की तीव्रता और अनुभव की प्रामाणिकता होगी, उसमें उतनी ही अधि‍क रंगमंचीय क्षमता भी होगी। ऐसी भावमयी नाट्यकृति में रंगमंच का विधान स्वतः निहित रहता है। यदि इस स्वयंसिद्धि‍ को स्वीकार कर लें तो यह कहने में अत्युक्ति नहीं होगी कि प्रसाद के पास वह नाटकीय कथ्य और रंगमंचीय दृष्टि विद्यमान् थी जिसके फलस्वरूप उनकी नाट्यकृतियों को नाटककार के आंतरिक रंगमंचीय विधान से हीन नहीं कहा जा सकता। रंगमंच के सन्दर्भ में भाषा की क्लिष्टता के प्रश्न पर प्रसाद का मानना है कि उन्‍होंने अपने नाटक उन प्रेक्षकों के लिए नहीं लिखे थे जिनके लिए तुलसीदत्त शैदा और आगा हश्र लिखा करते थे। उनके नाटक प्रबुद्ध प्रेक्षकों के लिए लिखे गए थे। वास्तव में, प्रसाद के नाटकों में अनुभूति की इतनी अधि‍क तीव्रता और कथ्य में इतनी अधि‍क नाटकीयता विद्यमान है कि वह भाषा की कठिनता की ओर ध्यान नहीं जाने देती। अनेक समीक्षकों ने कई आधारों पर प्रसाद के नाटकों को अनभिनेय और रंगमंचीय दृष्टि से अनुपयुक्त घोषित किया है, किन्तु कुशल सम्पादन, उपयुक्त शैली-चयन, निर्देशकीय सूझबूझ, सुशिक्षित एवं समर्थ-सुरुचि-सम्पन्न अभिनेताओं तथा आधुनिक रंगमंचीय तकनीकों के जरिए इनका प्रभावपूर्ण मंचन संभव है। कई सक्षम निर्देशकों ने इसे सिद्ध भी किया है।

प्रसाद के पश्चात् हिन्दी नाट्य इतिहास में एक यथार्थवादी चेतना दिखाई देती है जो इब्सन, बर्नार्ड शॉ, गॉल्सवर्दी आदि पाश्चात्य यथार्थवादी नाटककारों के चिंतन से प्रभावित थी। हिन्दी में लक्ष्मी नारायण मिश्र, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि इसी नाट्यधारा का प्रतिनिधि‍त्व करते हैं। यथार्थवादी नाटककारों और चिंतकों ने नाटक के परम्परावादी ढाँचे का विरोध किया और अपनी अभिव्यक्ति का मुख्य साधन उन्‍होंने कार्य-व्यापार तथा संवाद को बनाया। इन्होंने नाटक में काव्यमय भाषा का पूर्णतः बहिष्कार करके नित्य की व्यावहारिक भाषा का समर्थन किया तथा वास्तविकता का आभास देने का प्रयास किया। इसी के अनुरूप नाटक के रंगमंचीय विधान में भी परिवर्तन किया गया। अब रंगमंचीय उपकरण सरल, सीधे-सादे, अनलंकृत होने लगे तथा नाट्य प्रदर्शन की प्रचलित युक्तियों एवं कला कौशल के द्वारा रंगमंच को भड़कीला बनाने का यहाँ निषेध होने लगा। प्रयास यही किया जाता कि रंगमंच पर अवतरित नाट्य-स्थितियाँ वास्तविक जीवन का निकटतम आभास दें।

आज़ादी के बाद के समय में हमें हिन्दी नाट्य जगत् में एक नई रंग चेतना और नवोन्मेष दिखाई देता है। अब हिन्दी के अपने नाट्य और रंगमंच के अन्वेषण पर विशेष ज़ोर दिया जाने लगा। अब यह आवश्यक हो गया कि एक तरफ एक नए प्रसंग और नए अर्थों से प्राचीन संस्कृत नाट्य, मध्ययुगीन भाषा नाट्य, उत्तर भारत के लोक नाट्य, पारसी रंगमंच, लीलानाट्य की परम्परा और उसकी नाट्य सम्पत्ति का अध्ययन किया जाए, तो दूसरी तरफ इसी प्रसंग से पश्चिम के प्राचीन और आधुनिक नाट्य और रंगमंच को देखा जाए। वस्तुतः परम्परागत नाट्य सम्पत्ति किसी देश के रंगमंच के निर्माण के लिए प्राणदायिनी शक्ति होती है। इसी कारण इस युग में समसामयिक रंगमंच के लिए अपने पारम्परिक रंगमंच की खोज और जिज्ञासा हमारे लिए स्वाभाविक हो गई। यह सोच विकसित हुई कि अपने पारम्परिक नाट्य तत्‍वों और रूढ़ियों को नई कलात्मक दृष्टि से अपनाकर ही हम पश्चिमी रंग तत्‍वों का प्रयोग भी अधि‍क कलात्मक रूप में कर सकेंगे।

स्वतंत्रता के बाद के इस युग में रंगभाषा के स्वरूप और विकास की दृष्टि से नाटककार जगदीश चन्द्र माथुर ने महत्‍वपूर्ण विचार प्रकट किए। लोक नाट्य और परम्पराशील नाट्य से प्रभावित होने के कारण नाट्यकला में यथार्थ की प्रवृत्ति को वे विशेष महत्‍वपूर्ण नहीं मानते। नाटक में समसामयिक विविध समस्याओं को यथातथ्य निरूपित करने की अपेक्षा वे उन्हें कल्पना द्वारा प्रतिबिम्बित करने के पक्षपाती हैं। स्थूल घटनाचक्र के स्थान पर सूक्ष्म भाव-बोध को वे अधि‍क महत्‍वपूर्ण मानते हैं। इसके अतिरिक्त रंग निर्देशों को उन्‍होंने नाटक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। साथ ही नाटक में संगीत, नृत्य और पद्य के समावेश को उन्‍होंने खुलकर स्वीकृति दी है। उनका मानना है कि भारत में संगीत-विहीन रंगमंच जम नहीं सकता क्योंकि भारतीय स्वभाव से भावुक, संगीतप्रिय और किसी हद तक रोमांटिक जाति के लोग हैं। नृत्य को भी उन्‍होंने नाटक का एक अंग माना है। कुशल अभिनय को वे अत्यंत महत्‍वपूर्ण मानते हैं क्योंकि उसके अभाव में कुशल लेखन, सुन्दर दृश्य-सज्जा आदि सभी तत्‍वों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार, वेशभूषा को रंग विधान का अनिवार्य अंग मानते हुए उन्होंने इसमें अधि‍क सजगता की आवश्यकता बताई है। इस तरह हिन्दी नाट्य जगत् में रंगचेतना के विकास की दृष्टि से उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

इसी प्रकार, डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल एक ऐसे रंग चिंतक हैं जिन्होंने नाटक को उसके सम्पूर्ण अर्थों में लिया है। उन्होंने रंगमंच की सम्पूर्ण सत्ता स्वीकार की है और इसके भीतर वे नाटक और दर्शक को भी समाहित करते हैं। वे मानते हैं कि किसी नाटक के मूल्य का निर्धारण केवल इसी कसौटी पर होना चाहिए कि वह अपने रंग-अनुष्ठान, अपने व्यावहारिक प्रस्तुतीकरण में कैसा होगा। उनके अनुसार नाटक की भाषा सीधी और सरल होनी चाहिए जो दर्शकों को तुरंत समझ में आ जाए, किन्तु उसे मनोरंजक भी होना चाहिए। हालाँकि नाटक की रचना प्रक्रिया की सम्पूर्णता उन्होंने रंगमंच पर ही मानी है किन्तु प्रथम स्तर पर नाट्य रचना, नाट्य प्रदर्शन और नाट्यानुभूति को वे नाटककार की रचना प्रक्रिया का ही अनिवार्य अंग मानते हैं। उन्होंने अभिनेता को रंगमंच का सबसे जीवंत और सशक्त माध्यम माना है जिसके द्वारा नाटक दर्शक तक सम्प्रेषित होता है। साथ ही, उन्होंने दर्शक को भी बेहद महत्‍वपूर्ण माना है क्योंकि किसी भी रंगमंच की कल्पना उसी के लिए की जाती है और उसी के व्यक्तित्व ने हर युग में नाटक की प्रकृति और प्रदर्शन की पद्धति को प्रभावित किया है। इसके अलावा, हिन्दी रंगमंच और रंग दृष्टि के निर्माण और विकास में डॉ. लाल ने पश्चिम की रंग पद्धतियों के यथातथ्य अनुकरण को अनुचित माना है। उनसे रंग शिल्प के स्तर पर तो मदद ली जा सकती है लेकिन उनकी सामूहिक उपलब्धि‍याँ हमारी अपनी मांगों की पूर्ति नहीं करतीं। संभवतः इसी बात से प्रेरित होकर आधुनिक हिदी रंगमंच-निर्माता प्राचीन रंग-दृष्टि तथा मध्य युग की हमारी अपनी नाट्य परम्परा से संयोजक सूत्र ढूँढकर नई रंगभाषा की तलाश में जुटा है।

आधुनिक हिन्दी नाटककारों में मोहन राकेश ने हिन्दी नाटक को अत्यंत सशक्त रूप से रंगमंच के साथ जोड़ा। प्रसाद के बाद हिन्दी नाटक में जिस काव्यात्मकता का लोप-सा हो गया था, उसकी भरपाई राकेश ने अत्यंत सक्षमता के साथ की और हिन्दी रंगमंच के लिए बेहद उत्कृष्ट नाटक उपलब्ध कराए। वे नाटककार को सर्वाधि‍क महत्‍व देते हुए मंच को वस्तुतः नाटककार का रंगमंच ही मानकर चलते हैं। उनके अनुसार जब तक नाटककार रंगमंच को भलीभांति नहीं पहचानता, रंगमंच के व्याकरण और उसके मुहावरे को नहीं जानता और जब तक वह अपनी इस पहचान और समझ का सृजनात्मक उपयोग करने की क्षमता नहीं रखता, तब तक वह किसी श्रेष्ठ नाट्य कृति का स्रष्टा नहीं हो सकता। तथापि, रंगमंच के अन्य महत्‍वपूर्ण घटकों की उन्होंने उपेक्षा नहीं की है। वे मानते हैं कि मंचन की प्रक्रिया में नाटक केवल नाटककार का माध्यम ही नहीं रह जाता बल्कि वह एक संयुक्त प्रयास बन जाता है, जिसमें नाटककार, निर्देशक और अभिनेता की समान सत्ता रहा करती है। इसके साथ-साथ रंगमंच की व्यापक धारणा में रंगशिल्पी और प्रेक्षक भी आ जाते हैं। व्यवस्थापक, मंच और उसकी सज्जा का भी समान महत्व रहा करता है। इन सबके सम्मिलित और सहयोगपूर्ण प्रयास से ही वास्तविक रंगमंच की तलाश और स्वरूप का निर्माण संभव हुआ करता है।

मोहन राकेश ने अपने रंग कौशल की तलाश पश्चिम की उपलब्धि‍यों से नहीं वरन् पूरी तरह अपने परिवेश से की है। उनके शब्दों में, ‘‘पश्चिम का तकनीकी रूप से समृद्ध और संश्लिष्ट रंगमंच भी विकास की एक दिशा है, परन्तु उससे हटकर एक दूसरी दिशा भी है और मुझे लगता है कि हमारे प्रयोगशील रंगमंच की यही दिशा हो सकती है। वह दिशा रंगमंच के शब्द और मानव-पक्ष को समृद्ध बनाने की है - अर्थात् न्यूनतम उपकरणों के साथ संश्लिष्ट से संश्लिष्ट प्रयोग कर सकने की।’’3 अतः शब्द की महत्ता को वे स्वीकार करते हैं तथा निर्देशक को एक व्याख्याकार मानते हैं जो नाटककार के मूल संवेद्य को प्रेक्षकों तक पहुँचाए - मंचन की प्रक्रिया में नाटककार के शब्दों से बिना किसी छेड़छाड़ के अथवा बिना उनमें कोई परिवर्तन किए। शब्दों के साथ ही उन्होंने निःशब्दता को भी सार्थक माना है क्योंकि ‘‘शब्दों के बीच की निःशब्दता अपने में नाटकीय तनाव को वहन करने के कारण बहुत सार्थक हो सकती है।’’4 राकेश ने रंगमंच के लिए पश्चिमी चकाचौंध को महत्‍व नहीं दिया। उनका सारा ज़ोर सादगी पर रहा। इस सबके लिए उन्होंने प्रतीकात्मकता का अधि‍काधि‍क प्रयोग किया है। उन्होंने हिन्दी रंगमंच की सही तलाश में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया। उनके अनुसार, ‘‘हिन्दी रंगमंच को हिन्दी भाषी प्रदेश की सांस्कृतिक पूर्तियों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधि‍त्‍व करना होगा, रंगों और राशियों के हमारे विवेक को व्यक्त करना होगा। हमारे दैनंदिन जीवन के राग-रंग को प्रस्तुत करने के लिए, हमारे संवेदों और स्पंदनों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस रंगमंच की आवश्यकता है वह पाश्चात्य रंगमंच से कहीं भिन्न होगा। इस रंगमंच का रूप विधान नाटकीय प्रयोगों के अभ्यंतर से जन्म लेगा और समर्थ अभिनेताओं तक दिग्दर्शकों के हाथों उसका विकास होगा।’’5

इस प्रकार मोहन राकेश ने भावी नाटककारों और नाट्यचिंतकों के लिए मार्ग प्रशस्त किया और ऐसी नवीन रंगचेतना के विकास के लिए उनका आह्वान किया जो पाश्चात्य रंगमंच का अंधानुकरण करने के स्थान पर भारतीय परम्पराओं के निकट हो और हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान को सामने लाए। मोहन राकेश से प्रेरित-प्रभावित रहे नाटककारों में सुरेन्द्र वर्मा का नाम महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। अपने कथ्य, शिल्प, भाषिक प्रयोग और संवादीय संरचना में वे कई स्तरों पर राकेश की याद दिलाते हैं, किन्तु राकेश की मुख्य प्रवृत्तियों को लेकर वे हिन्दी नाटक और रंगबोध को एक भिन्न स्तर पर अग्रसर करने में सहायक होते हैं।

इनके अलावा, आधुनिक हिन्दी नाटककारों में मणि मधुकर, मुद्राराक्षस, भीष्म साहनी, बृजमोहन शाह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शंकर शेष, रमेश बक्षी आदि अनेक रचनाकारों का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने हिन्दी रंग जगत् में विविध नवीन प्रयोग किए। मणि मधुकर यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि उन्होंने हिन्दी नाटक को एक ओर प्रचलित चौखटों से मुक्त करने का प्रयास किया, दूसरी ओर उसे पारम्परिक नाट्य संस्कारों से जोड़ने की भी कोशिश की। उन्होंने एक ओर संवाद योजना में अति नाटकीय रंग तत्‍वों का प्रयोग किया है, दूसरी ओर लोक नाट्य, पारसी, फार्स, पैरोडी आदि रंग शैलियों का। उनकी भाषा अभिधा के स्तर पर उतना प्रभाव नहीं पैदा करती जितनी निहितार्थ के स्तर पर। उन्होंने मंगलाचरण, प्रस्तावना, नट-नटी और सूत्रधार संवाद की पुरानी पद्धति का नया प्रयोग किया है। अलगाव की भावना पैदा करने की प्रवृत्ति भी उनके नाटकों में विशेष रूप से दिखाई देती है। वे मंच पर कोई ऐसी क्रिया या संवाद-योजना प्रस्तुत करते हैं जो एकदम अभिनेता और प्रेक्षक में बीच-बीच में अलगाव पैदा करता है। पात्र भी बीच-बीच में याद दिलाते रहते हैं कि वे मात्र नाटक कर रहे हैं।

रंगयात्रा का विश्लेषण तब तक अधूरा ही रहेगा जब तक उन रंग-निर्देशकों और रंगकर्मियों का उल्लेख नहीं किया जाता जिन्होंने नाटक के सर्जनात्मक रूप एवं अर्थ की व्याख्या करने और इसे दर्शकों तक सम्प्रेषित करने के लिए अनेक कल्पनाशील प्रयोग किए। इब्राहीम अल्काज़ी, हबीब तनवीर, श्यामानंद जालान, सत्यदेव दुबे, ओम शिव पुरी, मोहन महर्षि, राजिन्दर नाथ आदि ने सातवें-आठवें दशक में प्रस्तुतियों की रंग परिकल्पना में जिस अंतर्दृष्टि का परिचय दिया, वह आज़ादी से पहले की प्रस्तुतियों में नहीं मिलती। इसी तरह, 8वें-9वें दशक में ब.व.कारंत, एम.के. रैना, बंसी कौल, रंजीत कपूर, अमाल अलाना आदि ने ज़िंदगी के यथार्थ के कई धरातलों को गहराई तक अभिव्यक्त करने वाली रंग शैलियों की तलाश की। कहीं नाटक को बंद प्रेक्षागृहों से बाहर लाकर पारंपरिक रंग शैली में खेला, कहीं काव्यात्मक धरातल को अपनाया और कहीं रीतिबद्ध शैली का व्यंग्यपूर्ण इस्तेमाल किया। इन्होंने कल्पनाशील मंच सज्जा, प्रतीकात्मकता, रचनात्मक प्रकाश-व्यवस्था, कोरस, सूत्रधार, वाचक और संगीत के उपयोग, रंग-उपकरणों और मुखौटों के इस्तेमाल, प्रदर्शन में दर्शकों की हिस्सेदारी आदि से रंग शिल्प के स्तर पर अनेक साहसिक प्रयोग किए।

कुल मिलाकर, हिन्दी नाटक और रंगमंच ने एक लम्बी यात्रा तय कर ली है। यह यात्रा जो 19वीं सदी में आरम्भ हुई थी तथा आज़ादी के बाद नए रंग-आंदोलन के रूप में जिसने गति पकड़ी, आज भी निरंतर ज़ारी है। आज भी यह प्रयास ज़ारी है कि हिन्दी रंग जगत् को विभिन्न शैलियों और प्रयोगों से समृद्ध किया जाए, जिसमें न केवल हमारी प्राचीन नाट्य परम्परा, मध्यकालीन भाषा नाट्य, पारसी रंग परम्परा, लोक नाट्य परम्पराओं आदि का योगदान हो, बल्कि पाश्चात्य और विश्व की अन्य नाट्य परम्पराओं का भी समुचित सहयोग हो।

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1. काव्य और कला तथा अन्य निबंध, जय शंकर प्रसाद, पृ. 107।
2. काव्य और कला तथा अन्य निबंध, जय शंकर प्रसाद, पृ. 108।
3. साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि, मोहन राकेश, पृ. 86।
4. नटरंग, अंक 18, पृ. 11।
5. ‘आषाढ़ का एक दिन’ की भूमिका, मोहन राकेश

विकास वर्मा
शोधार्थी, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,
ग्रेटर नोएडा, गौतम बुद्ध नगर,
उत्तर प्रदेश।


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