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05.03.2012
 

तेरी दुनिया बहुत निराली है
विजय विक्रान्त


 जुम्मे की नमाज़ पढ़ने को रहमत मियाँ अपने घर से निकले और मस्जिद की ओर चल पड़े। सिर पे तुर्की टोपी, बदन पर रेश्मी कुर्ता, काली अचकन, हाथ में नव्वाबी छड़ी और पैरों में शोलापुरी जूती बहुत जँच रही थी। मस्तनी चाल से वो सोचते हुए जा रहे थे कि आज अल्लाह से अपने मन की सारी मुरादें माँगूगा।

मस्जिद पहुँच कर रहमत मियाँ ने जूते उतार कर एक तरफ़ रख दिए और हाथ धो कर दुआ के लिये अन्दर गए। ओ मेरे मालिक, इस दुखी संसार में बस तू ही सभी का एक सहारा है। मेरी इस खाली झोली को तू अपने करम से मालामाल कर दे ओ मेरे दाता। तेरा ये बन्दा तुझ से यही भीख माँगने आया है। नमाज़ ख़त्म हुई और रहमत मियाँ बाहर आए। बाहर आकर देखा कि उनकी शोलापुरी जूती ग़ायब है। ऐसा लगा कि जूती के पर निकल आए हों और वो उड़ कर कहीं चली गई है। रहमत का मन बहुत दुखी हुआ और वो नंगे पाँव अपने घर की ओर चल पड़े। सारे रास्ते वो ख़ुदा को बहुत बुरा भला कह रहे थे और बुड़बुड़ाते जा रहे थे।

अपाहिज को एक पैसा दे दो”, एकाएक यह शव्द उन के कान में पड़े। नज़र ऊपर उठा कर देखा तो एक भिखारी हाथ फैलाए हुए भीख माँग रहा था। हालाँकि उसकी दोनों टाँगे कटी हुई थीं और बो बैसाखियों का सहारा ले कर चल रहा था मगर उसकी आँखो में एक अजीब क़िस्म की चमक थी। रहमत मियाँ ने जब ये माजरा देखा तो एकाएक घबराया और चीख कर बोला।

ओ मेरे मालिक, तेरा लाख-लाख शुक्र है, मेरे पास जूते तो नहीं है पर टाँगे तो हैं। जूता तो फिर भी मिल जाएगा मगर इन टाँगों के बिना ये जिस्म बिल्कुल अपाहिज है।

 

किस तरह से तेरा मैं शुक्र करूँ, तेरी दुनिया बहुत निराली है

तू हम सब बन्दों को देता सदा, रहती कोई भी झोली न खाली है


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