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ISSN 2292-9754

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09.04.2014


कहाँ गुज़ारा दिन कहाँ रात

कहाँ गुज़ारा दिन कहाँ रात किसी से न कहना
यहाँ कोई राज़ की बात किसी से न कहना

बड़े तंगदिल हैं लोग इक पल में बदल जायेंगे
अपना मज़हब अपनी ज़ात किसी से न कहना

कौन है दोस्त कौन दुश्मन कहना मुश्किल है
खुलकर अपने ज़ज़्बात किसी से न कहना

अपनी जीत की तो जम कर मुनादी करो मगर
कब हुई शह कब हुई मात किसी से न कहना

तुम्हारी ताक़त का किसी को भी अंदाज़ा न लगे
कौन है ख़िलाफ़ कौन साथ किसी से न कहना

कोई तो शरीक ए दर्द भी ज़रूरी है ज़िंदगी में
अच्छा नहीं यूँ दर्द ए हयात किसी से न कहना

इन आँखों के मौसम आँखों में छुपा कर रखना
कब हुआ सूखा कब बरसात किसी से न कहना


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