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ISSN 2292-9754

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03.01.2016


ऐतिहासिक उपन्यासः तथ्य और कल्पना

उपन्यास कथा साहित्य की सबसे प्रसिद्ध विधा है। कहानी में जहाँ जीवन की किसी एक घटना का वर्णन होता है, वहीं उपन्यास जीवन की घटनाओं का गुलदस्ता है। जिस प्रकार साहित्य समाज से अपनी सामग्री प्राप्त करता है उसी प्रकार एक कथाकार इतिहास की सामग्रियों को आधुनिक संदर्भ में, नए संदर्भों में स्वीकार करता है। इसीलिए उपन्यास का एक प्रकार ऐतिहासिक उपन्यास भी है। ऐतिहासिक उपन्यास में किसी देश अथवा प्रदेश विशेष के किसी ऐतिहासिक काल-खण्ड का किसी कथा के माध्यम से चित्रण किया जाता है। इतिहास भी यही कार्य करता है परन्तु उसमें किसी कथा को माध्यम नहीं बनाया जाता। इस प्रकार दोनों एक दूसरे से सम्बद्ध होते हुए भी पृथक-पृथक हैं।

"इतिहास" का अर्थ है - "यह ऐसा हुआ"। इतिहास में बीते हुए युग अथवा युगों के तथ्यों, घटनाओं आदि का काल-क्रमानुसार संग्रह किया जाता है। इसके आधार-प्राचीन ग्रन्थ, शिलालेख, स्मारक, दस्तावेज़ आदि में उपलब्ध निष्कर्ष आदि होते हैं। इसलिए इतिहास हमेशा प्राप्त ठोस और सत्य प्रमाणों के आधार पर ही लिखा जाता है। उसमें कल्पना के लिए स्थान नहीं होता। केवल सत्य-तथ्यों का अंकन होता है। इस अंकन में इतिहास अनुमान का तो सहारा ले सकता है लेकिन कल्पना का नहीं। उपन्यास भी सत्य पर आधारित होते हैं और उपन्यासकार इतिहास या अपने समय का युग-सत्य अपनी कल्पना के द्वारा साकार करता है। उपन्यासकार कल्पित कथा, कल्पित पात्र तथा कल्पित घटनाओं का सृजन कर, इनके द्वारा युग-सत्य को ही अभिव्यक्त कर देता है। यहीं आकर इतिहास और उपन्यास में अन्तर आ जाता है।

ऐतिहासिक उपन्यासकार इतिहास और कल्पना का समन्वय करता है। वह इतिहास में तथ्यों का संग्रह कर, अपनी कल्पना द्वारा उन्हें आकर्षक, मनोरंजक और प्रभावशाली रूप से चित्रित करता है। यह समन्वय इतना सन्तुलित और कलापूर्ण होना चाहिए कि उसकी रचना में न तो इतिहास का नीरस रूप उभर पाए और न कल्पना द्वारा इतिहास का ग़लत और विकृत रूप अंकित हो जाए। यही कारण है कि समाजवादी, सामाजिक तथा अन्य प्रकार के उपन्यास लिखने वालों की तुलना में ऐतिहासिक उपन्यास लिखना कठिन कार्य है। किसी भी भाषा के साहित्य में सफल ऐतिहासिक उपन्यासकार इसी कारण गिने-चुने हैं जबकि अन्य प्रकार के उपन्यास लिखने वालों की संख्या अनगिनत है। सफल ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के लिए इतिहास के विस्तृत और गहन अध्ययन तथा उपन्यास-कला की पूर्ण क्षमता अपेक्षित है। ऐतिहासिक उपन्यासों के इसी तथ्य को दृष्टि में रखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी के प्रारम्भिक ऐतिहासिक उपन्यासों को लक्ष्य कर अपने "हिन्दी साहित्य के इतिहास" में लिखा है - "जब तक भारतीय इतिहास के भिन्न-भिन्न कालों की सामाजिक स्थिति और संस्कृति का अलग-अलग विशेष रूप से अध्ययन करने वाले और उस सामाजिक स्थिति के सूक्ष्म ब्यौरों की अपनी ऐतिहासिक कल्पना द्वारा उद्भावना करने वाले तैयार न हों, तब तक ऐतिहासिक उपन्यासों में हाथ लगाना ठीक नहीं।" (हिन्दी साहित्य का इतिहास-रामचन्द्र शुक्ल)

इतिहास और कल्पना की इसी संगति का आगे विश्लेषण करते हुए आचार्य शुक्ल आगे लिखते हैं - "किसी ऐतिहासिक उपन्यास में यदि बाबर के सामने हुक्का रखा जाएगा, गुप्तकाल में गुलाबी और फिरोजी रंग की साड़ियाँ, इत्र, मेज़ पर सजे गुलदस्ते, झाड़-फानूस लाये जायेंगे, सभा के बीच खड़े होकर व्याख्यान दिये जायेंगे और उन पर करतल ध्वनि होगी, बात-बात पर धन्यवाद, सहानुभूति - ऐसे शब्द तथा सार्वजनिक कार्यों में भाग लेना - ऐसे फ़िक़रे पाये जायेंगे तो काफ़ी हँसने वाले और नाक-भौं सिकोड़ने वाले मिलेंगे।" (हिन्दी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)

इसलिए ऐतिहासिक उपन्यासकार को अपनी दृष्टि इतिहास पर आधारित निर्मल और तटस्थ रखनी पड़ती है। जो उपन्यासकार किसी भी युग की वास्तविकता को सही रूप में समझ लेता है, वही सफल ऐतिहासिक उपन्यासों के रचना करने में समर्थ होता है। डॉ. देवराज उपाध्याय के अनुसार- "ऐतिहासिक उपन्यास के लिए तो इतिहास की रक्षा करने के साथ-साथ उनके स्वरूप को अपनी समझ के द्वारा स्पष्ट करना भी आवश्यक है। यह ध्यान रखना चाहिए कि उपन्यास इतिहास का अन्धानुकरण नहीं हो सकता, सबसे पहले वह उपन्यास है- साहित्यिक कलावस्तु। साथ ही वह इतिहास भी है, जिसकी मर्यादा की भी रक्षा करनी पड़ती है। अतः यहाँ कल्पना अनियन्त्रित नहीं हो सकती। अकबर और शिवाजी दोनों को एक साथ नहीं बिठा सकती। इस प्रकार के उपन्यास को भिन्न रुचि वाले दो स्वामियों की सेवा करनी पड़ती है, दोनों के रुख की रक्षा करते हुए अपना अस्तित्व बनाए रखना पड़ता है। अतः इसमें अन्य प्रकार के उपन्यासों से अधिक सतर्क प्रतिभा की आवश्यकता पड़ती है।"

इतनी कठिनाई के बावजूद ऐतिहासिक उपन्यासकार को एक बड़ी सुविधा भी प्राप्त होती है। किसी भी उपन्यासकार की सफलता उसके पाठकों का विश्वास प्राप्त कर लेना होता है। इस दृष्टि से सामाजिक उपन्यासकार को पाठकों का विश्वास प्राप्त करने के लिए काफ़ी परिश्रम करना पड़ता है जबकि ऐतिहासिक उपन्यासकार आरम्भ में ही बड़ी सरलता से अपने पाठकों का विश्वास प्राप्त कर लेता है। किसी भी इतिहास-प्रसिद्ध पात्र या घटना का नाम सामने आते ही पाठक यह विश्वास कर लेते हैं कि इस उपन्यास में सत्य का चित्रण हुआ होगा और इस विश्वास के सहारे पूरा उपन्यास पढ़ जाते हैं।

ऐतिहासिक उपन्यास का मूल आधार "इतिहास" होता है। कल्पना उस इतिहास के रूप के आकर्षक और मनोरंजन रूप प्रदान करती है। इसलिए ऐतिहासिक उपन्यासकार को कल्पना का बड़ी सूझ-बूझ के साथ संयत प्रयोग करना चाहिए। उसे ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने का कोई अधिकार नहीं। महमूद गज़नवी ने सोमनाथ के मंदिर को तोड़ा और लूटा था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। ऐतिहासिक उपन्यासकार इस तथ्य को इसी रूप में चित्रित करने के लिए बाध्य है, भले ही इससे उसकी राष्ट्रीय भावना को कितनी ही ठेस क्यों न पहुँचे। मगर वह इतिहास को छोड़ कल्पना के क्षेत्र में पूर्ण स्वतन्त्र है। उसकी यह कल्पना कल्पित पात्रों तथा घटनाओं का सृजन कर उपन्यास की रोचकता को बढ़ा देती है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपने "सोमनाथ-महालय" में इसी कल्पना का प्रयोग कर महमूद गज़नवी को रेगिस्तान में भटका कर बहुत परेशान किया है। इस घटना के समावेश द्वारा न तो कहीं मूल ऐतिहासिक तथ्य को ठेस ही पहुँचती है और न ही यह घटना असंगत ही प्रतीत होती है। वैसे भी ऐतिहासिक उपन्यासकार अतीत की घटना को वर्तमान से जोड़कर देखता है- "साहित्यकार सर्जक है, जीवन का सर्जन करना ही उसका लक्ष्य होता है। वह इतिहासकार की भाँति तमाम बीती बातों को उनकी अनेक स्थूल रंग-रेखाओं में पुनः प्रस्तुत नहीं करता। वह सर्जक के गहन दायित्व को समझकर उन्हें एक गहरे मानवीय सत्य से जोड़ती है।" (हिन्दी उपन्यासः एक अन्तर्यात्रा - डॉ. रामदरश मिश्र)

ऐतिहासिक उपन्यास के पाठक प्रायः युवा अथवा प्रौढ़ावस्था वाले ही होते हैं क्योंकि इसी वर्ग के पाठक अपने इतिहास ज्ञान के कारण इन उपन्यासों का रस लेने में समर्थ होते हैं। इसलिए ऐतिहासिक उपन्यासकार को बहुत सावधानी के साथ इतिहास तथा तथ्यों को मिलाना चाहिए। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ. रामदरश मिश्र ने लिखा है- "इस प्रकार ऐतिहासिक उपन्यासों में लेखक ऐतिहासिक परिवेश को उसकी सच्चाई में मूर्तिमान तो करता ही है, साथ ही साथ उस परिवेश के भीतर से वह ऐसे प्रश्न, ऐसे मूल्य, ऐसे सौन्दर्य उभारता है जो अधिक व्यापक और गहन होने के नाते वर्तमान जीवन को भी अपनी परिधि में समेट लेते हैं।"(हिन्दी उपन्यासः एक अन्तर्यात्रा - डॉ. रामदरश मिश्र)

अन्त में ऐतिहासिक उपन्यासों में तथ्य और कल्पना का संतुलित प्रयोग होना चाहिए। यदि कल्पना पर अंकुश नहीं होगा तो अर्थ का अनर्थ होगा। देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों को इसी कारण ऐतिहासिक उपन्यास नहीं माना जाता जबकि उनमें राजाओं आदि का ही वर्णन है और न ही तथ्यों का इस प्रकार प्रयोग करना चाहिए कि वह उपन्यास न रहकर इतिहास ही बन जाए।

डॉ. विजय कुमार शर्मा
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय स्नातकोत्तर महावि.
मुरैना, म.प्र.


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