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ISSN 2292-9754

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08.24.2016


हिन्दी में विज्ञान पत्रकारिता

भाषा-विज्ञान मैं भाषा कहलाने का अधिकार केवल मनुष्य की भाषा को है। मनुष्येतर प्राणियों की भाषा ध्वन्यात्मक होती है, जिसका कोई निश्चित अर्थ नहीं होता। मानव ने अपने विकास के साथ-साथ अपनी भाषा का भी विकास किया। जबकि मानवेतर प्राणियों में यह बात नहीं है। उदाहरण के तौर पर कौवा तब भी काँव-काँव करता था और आज भी, जबकि मनुष्य की भाषा एक कोटर या गुफा से शुरू होकर विश्वपरिधि तक पहुँच गई है।

मानव भाषा के इस विकास परंपरा में संवाद का सर्वोपरि स्थान है। "जब-जब संवाद की मात्रा और उसकी सकारात्मकता का विस्तार हुआ है, मनुष्य ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं। इसके विपरीत जब-जब समाज संकुचित होकर अल्पसंवाद की स्थिति में आया है या नकरात्मकता की मात्रा बढ़ी है, मानव समाज का ने केवल विकास अवरुद्ध हुआ है, बल्कि पशुवृत्तियों की तीव्रता भी बढ़ी है।"1 इसीलिए मनुष्य ने समय-समय पर ऐसे यंत्रों की खोज और निर्माण किया, जिनसे वह अधिक-से अधिक लोगों तक अपना संवाद बना सके। फलतः आज उन्हीं अनेक साधनों का परिणाम पत्रकारिता के रूप में आज हमारे बीच प्रचलित है।

प्रारंभ में पत्रकारिता का रूप सीमित था। ख़बरों और कुछेक काव्य रचनाओं को छापना ही पत्रकारिता का लक्ष्य माना जाता था, जबकि आज पत्रकारिता समाज का चौथा स्तंभ बन चुकी है। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें पत्रकारिता ने अपने पाँव न पसारे हों। वर्तमान युग ग्लोबल विलेज बन गया है। प्रारंभ में किसी की बीमारी उसी के या उसके नज़दीक वालों तक ही सीमित रहती थी परन्तु आज अमरीका की बीमारी भारत में और भारत की बीमारी चाईना में रातों-रात फैल जाती है। इसीलिए आज अगर कोई समस्या है तो वह व्यक्तिगत न होकर सार्वजनिक हो जाती है। जिसके चलते समाधान भी सभी को मिलकर खोजना पड़ता है। वर्तमान युग विज्ञान का है। जीवन का हर क्षेत्र विज्ञान की नींव पर खड़ा है। इसलिए आज यह आवश्यक हो गया है कि सर्वमान्य भाषाओं में विज्ञान संबंधी नित नए-नए शोधों और समाधानों की चर्चाएँ होनी चाहिएँ, ताकि इस भौतिक युग को और अधिक सुविधा भोगी बनाया जा सके।

हिंदी भारत के अधिकांश भू-भाग की भाषा है। जिसमें पत्रकारिता का उदय "उदंत मार्तंड" (1826) से माना जाता है। 1967 ई. में भारतेंदु ने "कविवचन सुधा" नामक पत्रिका निकाली, जिसमें साहित्य के साथ विज्ञान को भी स्थान दिया। उन्होंने स्वयं वैज्ञानिक निबंध लिखे और विज्ञान की पुस्तकों की समीक्षा भी की। यहीं से विज्ञान-पत्रकारिता का उदय माना जा सकता है। पं. बालकृष्ण भट्ट द्वारा निकाला गया "हिंदी प्रदीप" (1877) भी एक ऐसा पत्र है, जिसमें सन् 1877-1906 के मध्य कम-से-कम 11 ऐसे निबंध प्रकाशित हुए जो पूर्णतया विज्ञान विषयक थे। 1893 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हो जाने पर बाबू श्याम सुन्दरदास ने 1887 ई. में "नागरी प्रचारिणी पत्रिका" का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें वैज्ञानिक सामग्री का समावेश था। 1900 ईं. में इलाहाबाद से "सरस्वती" मासिक पत्रिका निकली तो उसके भी प्रथम संपादक श्याम सुन्दरदास ही हुये। उन्होंने 1900-1906 ई के मध्य "सरस्वती" में स्वयं कई विज्ञान विषयक निबंध लिखे - भारत में शिल्प विद्या, जन्तुओं की सृष्टि फोटोग्राफी आदि। इसी सरस्वती पत्रिका में "गुलेरी" ने 1906 ई. में "आँख" पर कई निबंध लिखे। "सरस्वती" के बाद गंगा, विशाल-भारत, माधुरी, वीणा, सुधा, हिंदुस्तानी जैसी शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन ने जिस उदार दृष्टि का परिचय दिया, उसके फलस्वरूप स्वंतत्रता-प्राप्ति के पूर्व तक हिंदी में विज्ञान के विविध पक्षों पर इन पत्रिकाओं में लगातार लेख छपते रहे। इस प्रकार न जाने कितने लेखक विज्ञान लेखन के प्रति आकृष्ट हुए।

"स्वतंत्रता पूर्व हिंदी में विज्ञान की कुल 40 पत्रिकाएँ निकल रही थीं, जिसमें 3800 से अधिक लेख प्रकाशित हुए। इनमें से 1000 लेख साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे थे। अकेले विज्ञान पत्रिका में 2900 लेख छपे। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद 1983 ई. में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार हिंदी में 321 वैज्ञानिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं।"2 हिंदी माध्यम में विज्ञान का साहित्य-सृजन हो सके इसलिए सन् 1913 में इलाहाबाद में विज्ञान-परिषद की स्थापना की गई और 1915 में एक मासिक पत्रिका "विज्ञान" का प्रकाशन शुरू किया गया। जिसका लाभ सबसे अधिक उन लेखकों को मिला जो अपने विज्ञान विषयक लेख साहित्यिक पत्रिकाओं में लिखते थे। यह उनके लिए एक मंच था।

स्वतंत्रता से पूर्व हिंदी में कृषि एव आयुर्वेद विषयक पत्रिकाओं की भरमार थी। जिनमें दिल्ली से निकलने वाली "आयुर्वेद महासम्मेलन" (1913) नामक पत्रिका सर्वाधिक प्रसिद्ध थी। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद दिल्ली से महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पत्रिकाओं "खेती" (1948) तथा विज्ञान प्रगति (1952) के प्रकाशन के साथ हिंदी की विज्ञान पत्रकारिता में चार चाँद लग गये। आज हिंदी के गलियारे में वैज्ञानिक पत्रिकाओं की धूम मची है।

विज्ञान विषयक पत्रिकाओं में प्रारंभ में आलेख निबंध के रूप में विज्ञान सामग्री छपती रही, किंतु धीरे-धीरे विज्ञान पत्रकारिता सहित्यिक पत्रकारिता की ओर बढती रही। फलस्वरूप आजकल विज्ञान कविताएँ, पहेलियाँ, कथाएँ, नाटक, उपन्यास इत्यादि विधाएँ विज्ञान पत्रकारिता के अंग बन चुकी हैं। विज्ञान पत्रकारिता के फलस्वरूप सम्यक् वैज्ञानिक साहित्य का सृजन संभव हो सका है और यह सब विगत सौ वर्षों में ही सम्पन्न हुआ है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

हिंदी साहित्य आज अपनी व्यापकता के चरम पर है। अनेक विमर्श और वाद अपनी परिणति के तोते हिंदी गगन में उड़ा रहे हैं। बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर स्वतंत्रता पूर्व से ही साहित्य-लेखन आंरभ हो गया था। पर स्वतंत्रता के पश्चात चूँकि बच्चों को विश्व-भर से परिचित करवाना था इसलिए बाल साहित्य ने विज्ञान का दामन थामा। "बच्चों के लिए बहुत प्रारंभिक अवस्था से ही विज्ञान पुस्तकें पढ़ाना ज़रूरी है। यदि वे बारह वर्ष की आयु प्राप्त करने तक विज्ञान की पुस्तकें नहीं पढ़ेंगे तो समझिए वे गए काम से।"3 वास्तव में ही बच्चे अब पहले से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले होने लगे हैं। असंगत कल्पनाओं से अब उनकी शंकाओं का समाधन कर पाना कठिन हो जाता है हिंदी में आगे आने वाले बाल-कवियों को भी चाँद-सितारों के विषय में अपनी धारणाओं एवं विश्वासों को बदलना होगा और अपनी कल्पनाओं में परिवर्तन लाना होगा। इस तरह भारत में विज्ञान पत्रकारिता का विकास विषम परिस्थितियों में से होकर आज के विकसित रूप को प्राप्त कर सकी है, जो वास्तव में ही अविस्मरणीय है।

संदर्भ ग्रंथ सूची:

1. "मीडिया व्यग्रता का नहीं, समग्रता का परिचायक हो" - ब्रजकिशोर कुठियाला, साहित्य अमृत, अगस्त 15, पृष्ठ 51
2. "विज्ञान पत्रकारिता" - शिवगोपाल मित्र, साहित्य अमृत, अगस्त 15,पृष्ठ 76
3. एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बाल साहित्यकार सीमूर साइमन का कथन

डॉ. विजय कुमार शर्मा
सहा. प्राध्यापक
शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरैना (म.प्र.)


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