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ISSN 2292-9754

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01.18.2017


आजकल

महलों के अंदर क़ैद हैं कैसे सबेरे आजकल
छाये हुए हैं मुल्क में ग़म के अँधेरे आजकल

अब सफ़र आसां नहीं है लूट लेंगे आबरू
राह में मिल जायेंगे ऐसे लुटेरे आजकल

आस्तीनों में जिनकी पल रहे विषधर जहाँ
डर रहे हैं रहनुमाओं से सपेरे आजकल

जब उन्हें मालूम हुआ मैं लिख रहा हूँ फ़ैसले
वो लिफ़ाफ़े भेजते हैं घर पे मेरे आजकल

रोशनी ग़ायब हुई सीना फुलाये है अँधेरा
जुगनुओं के लग रहे गलियों में फेरे आजकल

फ़ाइलों में क़ैद हैं "ब्रज" देखिये सब योजनायें
दफ़तरों में घूसखोरों के हैं डेरे आजकल


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