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ISSN 2292-9754

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05.05.2018


अद्वैत का रूप

हर चीज़ के होते हैं दो रूप
जैसे सुख-दुख, छाँव या धूप
अच्छा-बुरा, छोटा और बड़ा,
पतला-मोटा, बैठा या खड़ा,
ग़म और ख़ुशी, हँसना-रोना
पास या दूर, पाना और खोना,
शाम-सवेरा, रोशनी और अँधेरा...

सिर्फ़ दृष्टि का फ़र्क है बस
जैसी नज़र होगी हमारी वैसा ही पायेंगे
मन के दर्पण में वही प्रतिबिंब बनाएँगे
अलग-अलग नज़र जन्म देती है द्वंद्व को
पृथक समझते हैं हम इनके अस्तित्व को
जो सत्य नहीं, मिथ्या है वही
वर्ना मिथ्या का कोई वजूद नहीं
देख सकें हम जो उस सत् को
दृष्टि दे ऐसी हर भक्त को
जो अद्वैत है और एक जिसका रूप है
जहाँ द्वंद्व नहीं, वहीं आनंद की धूप है


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