अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.20.2015


उनकी निगाहों के वार देखिये

उनकी निगाहों के वार देखिये
जो बच गए घायल, वो शिकार देखिये।

मेरे दिल की कोई अब कीमत कहाँ रही
उनके दिल के, आज खरीददार देखिये।

बारिशों में खुलने लगे है अब हुस्न के भरम
जो रंग छोड़ने लगे, वो रुख़सार देखिये।

गुज़रे जहाँ से वहाँ हुए, क्या क्या नहीं सितम
तीमारदार भी हो गये, अब बीमार देखिये।

फ़िज़ा में हुस्न का ज़हर फैला है इस कदर
कि उतर नहीं रहे अब, इश्क के बुखार देखिये।

जब दिल की तमन्नाओ पे फिर ही गया पानी
तो “परवाज़” मोहब्बतों के कारोबार देखिये।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें