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ISSN 2292-9754

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07.04.2016


मौसम बदलता है : डॉ॰ सुधाकर मिश्र

सुधाकर मिश्र साठोत्तरी हिन्दी कविता के एक शक्तिशाली हस्ताक्षर हैं। उनकी रचनाएँ एक तरफ़ पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन संघर्ष से जुड़ी हैं, तो दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना से पौराणिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी उन्होंने अपनी बहुत सी रचनाओं की आधारशिला रखी है, जिसमें रामायण, महाभारत तथा प्राचीन एवं मध्यकालीन इतिहास के साथ-साथ आधुनिक इतिहास दृष्टि का भी सराहनीय योगदान हैI इन सबके बीच जिस प्रकार उनके काव्य में आधुनिक युगबोध की अन्तःसलिला प्रवाहित है, उससे मिश्र जी के काव्य के लक्ष्य एवं उद्देश्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि वे पुराण एवं इतिहास के माध्यम से जहाँ अपनी जातीय अस्मिता के उज्ज्वल तथा गरिमा मंडित स्वरूप को अंकित करना चाहते हैं वही उनकी सहायता से वर्तमान बहुकोणीय समस्याओं का समाधान तथा लोगों का उचित मार्गदर्शन भी करना चाहते हैं। यही कारण है कि उनकी गीतों में समकालीन समस्याएँ प्रायः झाँकती मिलती हैं। मिश्र जी ने सन् १९५० के आसपास लिखना प्रारम्भ किया था। सुदीर्घ कालखंड में "शंपा” (सन् १९५४) से लेकर " मौसम बदलता है" गीत संग्रह (2016) तक सुधाकर मिश्र ने जो काव्य सृजन किया है वह जीवन और साहित्य के श्रेष्ठतम मूल्यों से अनुप्राणित है। अपने रचना संसार में मिश्र जी का व्यक्तित्व काव्य के विराट आयामों के साथ तादात्म्य का अनुभव करके प्रेरणा और समाधि में कुछ ऐसा उठ गया है कि वहाँ से वाणी की जो भी झंकार उठती है वह सत्य, शिव और सुन्दर की पर्यायवाची बन जाती है-

"बनी जा रही कविता मेरी।
स्नेह-सिंधु में पुलक स्नान कर,
दुनिया का दुख-दर्द पान कर,
बरस रहा है मानस मेरा
बनी जा रही कविता मेरीII”1 मौसम बदलता है, पृष्ठ 62

मौसम बदलता है गीत संग्रह (2016) में प्रेमगीत हैं, नवगीत हैं, राष्ट्रप्रेम की अभिव्यंजना करने वाले गीत हैं, मातृभूमि की वंदनाएँ व उद्बोधन हैं, शोषण-मुक्त समाज की संकल्पना तथा आध्यात्मिक चेतना, रहस्य व निच्छल भक्ति से पूरित गीत एवं मानवता के उत्थान की भावना भी हैं। गीतकार की काव्य दृष्टि के समक्ष जो सौंदर्य उभरता है -वह दृष्टि विशेष की क्षमता से उभरता है। यह सौंदर्य आरोपित न होकर वस्तु की ही अपनी असाधारणता से उदभूत हुआ है। असाधारण दृष्टि जिसमें होती है, वही सौंदर्य को चित्रबद्ध करता है, मतलब चाहे लोक कवि हो, लोक-सौंदर्य का गायक हो, विद्रोह का साधक हो या लोकोत्तर सौंदर्य का कवि, हर कवि की अपनी विशिष्ट दृष्टि होती है। सुधाकर मिश्र जी लोक, वेद शास्त्र एवं समाज के अमर गायक हैं। लोक के संस्कार अतिसंवेदनशीलता, स्वाभाविकता और अनुभूतिजन्य वैयक्तिकता मिश्र जी की शक्ति है। गाँव और संस्कृति के प्रति कवि के सरोकार गहरे हैं—

"गीत जब भी लिखो
इस तरह से लिखो
कि हृदय बुद्धि से बात करता रहे।"2 मौसम बदलता है, पृष्ठ 82

95 पृष्ठों में टंकित 59 पुष्पों की गीत वाटिका "मौसम बदलता है" गीत संग्रह अपने नाम की ध्व्न्यत्मकता से ही अपनी अर्थ छटा विस्तारित करने लगता है शाश्वत परिवर्तन कितना कुछ अपने साथ लेकर आता है। इस मौसम परिवर्तन में मधु है, जीवन का आसव है, प्रेम है, प्रकृति है, प्रजातांत्रिक व्यवस्था है, व्यक्ति है और शाश्वत गत्यात्मक समय है। सभी गीत अपने समय की सच ब्यानी मात्र नहीं दो शब्द में मिश्र जी लिखते हैं -- "गीत गीतकार के हृदयस्थ भाव-रस का उच्छ्लन है। जब भाव बाहर आने की छटपटाहट से ह्रदय को उद्वेलित कर देता है, तब गीत का जन्म होता है।… गीत का काम कविता की तरह लम्बी नहीं अपितु छोटी समाधि से ही सध जाता है। जो गीत भावावेग की प्रवाहकालीन समाधी में लिखें जाते है, उनमें उन गीतों की अपेक्षा अधिक अन्विति रहती है, अधिक गतिशीलता रहती है, जो भावावेग के विलयानंतर और चित्त की विचलित समाधि में लिखे जाते हैं" सुधाकर मिश्र जी के मन की बातें अपने जैसे लोगों तथा श्रमित जन से आत्मीय वार्तालाप है –

जो थके हारे हैं उनसे
बात मन की कह
हवा तूँ बह॥3 - मौसम बदलता है, पृष्ठ 11

इनके गीतों में शब्द सौंदर्य, अर्थ सौंदर्य, भाव सौंदर्य के साथ साथ ग़ज़ब की तरलता है। यह गीतकार की साधना का सुपरिणाम है। गीत की साधना पथ के राही मिश्र जी लिखते हैं "गीत का काम कविता की तरह लम्बी नहीं अपितु छोटी समाधि से भी सध जाता है। जो गीत भावावेग की प्रवाह कालीन समाधि में लिखे जाते हैं, उनमें उन गीतों की अपेक्षा अधिक अन्विति रहती है, अधिक गतिशीलता रहती है, जो भावावेग के विलयांतर और की विचलित समाधि में लिखे जाते हैं" गीतकार गीत की रचना प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए अपने भावावेग को रोक नहीं पाता और शब्द निर्झर सरीखे फूट पड़ते हैं।

रँगता गया समय का काग़ज़
मैं आँसू की स्याही से
पर समाज के मूल्यों की छवि
बचा न सका तबाही से –
गुणन फलक पर गए शून्य से
पन्ने सभी निराशा में॥4 मौसम बदलता है, पृष्ठ 24

सुधाकर मिश्र के गीतों में प्रकृति साधन की भूमिका में आती है। जिसके माध्यम से कवि अपने सारे सरोकारों को अभिव्यक्त कर जाता है। प्रकृति के कारक तत्व रचना का आधार बनते हैं, ज़मीन से उर्वरा शक्ति ग्रहण कर परम्परा की इमारत में ईंट की मानिंद प्रयुक्त होती है। प्रकृति के साथ मानव प्रेम सम्बन्ध की 'शम्पा' में वर्णित कथा का लौकिक प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम को संकेतित करना शायद मानवता के प्रति कवि के झुकाव का परिणाम है। प्राकृतिक सौंदर्य, मानवता के प्रति प्रेम तथा युग बोध के जुड़ाव ने कवि को वैश्विक सुख-शांति की ओर मोड़ कर उसकी सोच को एक व्यापक धरातल प्रदान किया है -

आओ, जग बुला रहा है
जन आँगन भरती जाओ ;
हे मेघ - मालिका - बाले ;
फिर उठो और इठलाओ।
* * * * * * * * * * * *
खिल उठे विश्व, नव - जीवन
छा जाये नभ उजियाली ;
मानव कुटिया में फिर से,
जगमग - जग जले दिवाली॥5शम्पा पृष्ठ 191और192

किसी कवि के लिए उसकी संस्कृति का बड़ा महत्व होता है। शायद ही कोई ऐसा कवि हो जिसके काव्य में उसकी अपनी संस्कृति की झाँकी उपलब्ध न हो। यही कारण है के प्रत्येक कवि में समकालीन सांस्कृतिक बोध उपस्थित रहता ही है। मिश्र जी अपनी संस्कृति से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए चाहे गाँव की संस्कृति हो अथवा शहर की मिश्र जी के गीतों में उसके चित्रण का आभाव नहीं है –

"लगता नहीं आज मन मेरा
लगता है – फागुन आया है
इन महलों की बात न पूछो
ये तो एक रंग रहते है,
इनको कहा पता है इसका –
किसको माघ-पूस कहते है"6 मौसम बदलता है, पृष्ठ 17

मौसम बदलता है गीत संग्रह (2016) में बड़ी मात्रा में लोक-चित्रों और प्रकृति का समुपस्थित होना। वे अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण–परीक्षण करते हैं, उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सीधी-सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर गीत-पुष्पों की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर गीतों में कला का स्वत: प्रस्फुटन हो जाता है अथवा कहें
कि, वे कला के लिये कविता नहीं करते थे। इसलिये उनके गीतों में वक्रता और गूढ़ता की जगह तरलता, आत्मीयता और सरलता का बोध होता है। भारतीय लोक चित्त के चितेरे असाधारण प्रतिभा सम्पन्न स्रष्टा है। लोकजीवन की उर्बर ज़मीन में गझिन संवेदना के बीज की तलाश मिश्र जी की तपःसाधना है। कवि कर्म और कविता की साधना ही सर्जक सुधाकर मिश्र की जीवन साधना है। एक उदात्त नैतिक एवं सामाजिक चेतना उन्हें दायित्व बोधों के प्रति सजग सचेत करती रहती है। सुधाकर मिश्र जी के गीतों की ज़मीन में मनुष्य और मनुष्यता की पहचान बनाए रखने की जद्दोज़हद स्पष्ट दिखाई पड़ती है। जीवन के सरोकार ही कविता के सरोकार बनकर उभरते हैं। कवि, कविता और गीतकार आपस में जिस तरह गुफ़्तगू करते दिखाई पड़ते हैं। मौसम बदलता है में द्रष्टव्य है --

"प्रकृति में परिवर्तनों की बाढ़
मौसम बदलता है।
शीत के साम्राज्य को अब
रौंदने का समय आया,
फेंक कर शाले-दुशाले
स्वेटरों से मुक्त काया।
गोद में दुबका हुआ शिशु
मत्स्य जैसे उछलता है॥"7 मौसम बदलता है, पृष्ठ 31

उस लगता है जैसे कई श्रमिक आपस में जीवन की आपाधापी में कुछ क्षण विश्राम करने के लिए निकाले हो।

"जा रहा मन बीच खेतों के
उलझने, बात करने,
आ रहा है चाँद जिनमें
भाँवरी उल्लास भरने।
स्नेह से भीगे पथों पर
पैर फिर-फिर फिसलता है"॥8 मौसम बदलता है, पृष्ठ 32

गीतों में मिश्र जी ने जिस काव्य-मूल्य की सृष्टि की, वह आज के काव्य-परिदृश्य में अपनी अलग पहचान रखती है। लोक की कोख से जन्मा साहित्य मनुष्य को उसकी अपनी अस्मिता और ज़मीन से जोड़ता है। दुनिया-भर में श्रम की संस्कृति को प्रतिस्थापित करता है और आदर भी। इसलिये कहा जा सकता है कि यह मनुष्यता की संस्कृति में विश्वास रखता है। इस संदर्भ में मिश्रा के गीतों को देखने से यह पता चलता है कि उनके गीत उस लोक-हृदय का पता देती है। जिसमें बाज़ार के लिये जगह नहीं। अत: बाज़ार से बेजा़र होते इस लोक-समय में उनके गीतों का महत्व और बढ़ जाता है जो बाज़ार के विपरीत, मानव की मूल संवेदना को जगाने में समर्थ हैं क्योंकि दुनिया भर में संपत्ति पर चल रहे लूट-खसोट, छल-छद्म, हिंसा, दंभ, अहंकार, प्रदर्शन, अन्याय और उत्पीड़न से अलग वह एक प्रेममय, विलक्षण संसार की रचना करता है। जिसमें सच्चाई को प्रतिष्ठित करने की और आदमी को झूठ से अलगाने की शब्दों की ताक़त है। लोक जीवन के अमर गायक सुधाकर मिश्र के आईने में किसान और किसानी, गाँव और ग्रामीण, देश और जवार, भारत और भारतीयता का अवलोकन कर सकते हैं। सुधाकर मिश्र जी इस तरह भावों की गहराई के गीतकार हैं। वे दुख-दर्दों की हाला पीकर और भी उर्जावान होकर काव्य-सृजन करते हैं-

"जाने कब जीवन
अमावस से त्रस्त हो
अंजुरी भर चाँदनी लिए चलो -
लहरों पर पैर रखे
आशा के कलरव में
हार को भी जीत-सी किए चलो॥"9 मौसम बदलता है, पृष्ठ 22 और 23

यह उनके दृढ़ व्यक्तित्व को इंगित करता है। आज मानवता के ह्रास का एक बड़ा कारण चरित्र का दोहरापन है और कई बार तो चरित्र के विचलन को ही आधुनिकता का पर्याय मान लिया जाता है क्योंकि सरप्लस पूँजी ने मानव के सबंधों को सिर्फ़ धन-संबंधों में ही बदलने का कार्य किया है और सुख की झूठी परिभाषा की है। परंतु उनके चरित्र का ठोसपन और एकनिष्ठता वस्तुत:आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है, जिसकी जड़ें हमारी परंपरा और संस्कृति में है जो वे अपने पारंपरिक ज्ञान और संस्कार से लेते हैं। यही कारण है कि इनके प्राण-तत्व के रूप में तुलसी और निराला उनके आदर्श हैं जिनकी गुरुता उन्होंने स्वीकारी है हालाँकि दोनों अलग-अलग काल और परिस्थितियों के कवि हैं परंतु सुधाकर मिश्र के अंतस में समाकर एकरस हो गये हैं। अत: उनकी परंपरा किताबी नहीं वरन् संस्कार-जन्य और व्यावहारिक है। मिश्र जी ने जीवन की पाठशाला में ही काव्य की दीक्षा ली है। खेत, खलिहान, नार –खोर पोखरा, पगडंडी के साथ महानगर की खुरदरी ज़मीन पर जीवन के अर्थ की तलास मिश्र जी की काव्य शक्ति बनकर उभरती है। यही शक्ति कवि के जीवन संघर्ष की पर्याय बनकर उभरती है। "कुरसी" काव्य संग्रह हो या "शंपा", "मनीप्लांट और फूल" हो या काव्य ब्रज भाषा में लिखित कवित्त सभी में गाँव की मादक ख़ुशबू के साथ महानगरीय ज़मीन के जीवन संघर्ष को स्पष्ट देखा जा सकता है। जिसे लोक और जीवन से अर्जित किया है। इसी रास्ते चलकर कविता को एक चेतन मन और स्पंदित समाज की अभिव्यक्ति का आकार प्रदान कर पाये हैं। विकास का अर्थ उनके लिये जीवन में ही है, उससे बाहर नहीं। जीवनेतर प्रगति व्यर्थ है, मिथ्या है उनके लिये! विवेक में ही परिवर्तन और प्रगति की सार्थकता छिपी है। यहाँ यह भी लक्ष्य किया जाना चाहिए कि जीवन में जटिलता भी है, दु:ख भी, अकेलापन भी, अथाह शून्यता भी, पर इन विपदाओं का स्वर रागालाप नहीं है-

"आ रहे दिन त्रासदी के
छा रहा थक्का अँधेरा
सत्य भासित धूप-सी
मोहक अधर फैली हँसी
दीन जनता मीन-जैसे
जाल-वैभव में फंसी
स्वार्थ के मादक वनों में
महकता जीवन चितेरा॥"10 मौसम बदलता है, पृष्ठ -12

हमेशा साझी है, चाहे दुख हो या सुख क्योंकि उसकी जिजीविषा दृढ़ है।

"प्रजातांत्रिक व्यवस्था
राजनीति पकती है
जनता के रक्त में,
अर्थ की पियास जगी
धरती के भक्त में
भेद नहीं दिखता है
संध्या –बिहान में॥"11मौसम बदलता है, पृष्ठ 92

लगभग चार दशकों की कुशासन व्यवस्था में ग़रीब और ग़रीब होता जा रहा था। आर्थिक और सामाजिक रूप पिछड़े हुए लोगों और कमज़ोर वर्गों के बीच बड़ी गहरी विभाजक रेखा खिंचने लगी थी। सामाजिक ढाँचे के बिखराव, शोषण और भ्रष्टाचार के बोलबाले से भारत में आर्थिक सामाजिक असंतुलन पैदा हो गया है। करोड़पतियों की संख्या में बड़ी तेज़ी से इजाफ़ा होने लगा, अब धनी और धनी तथा ग़रीब और ग़रीब होता जा रहा था। इस आर्थिक सामाजिक विषमता के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है। विभाजन के ख़तरे बढ़ते जा रहे थे। समाज खांचों में बटने लगा था। सामजिक सरोकार के प्रति जागरूकता पैदा करना समकालीन कवियों की प्राथमिकता बन गई। आज़ादी के बाद सत्ताभोग की प्रवृत्ति ने अपराधी तत्वों से साठगाँठ कर सत्ता पाने की लालसा ने सत्ता के केंद्रीय चरित्र में परिवर्तन ला दिया। अपराधी और अपराध व्यवस्था के अंग बनने लगे थे। आठवें दशक में मोहभंग, सत्ता का केंद्रीय कारण, भारतीय राजनीति में मूल्यहीन स्वार्थी राजनेताओं का प्रवेश आदि ने जनसेवा के नाम पर इस वर्ग ने भारतीय जनता को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भयानक तौर पर नुकसान पहुँचाया है -

"सत्ता की बंसी भी
ज़हर उगलती है,
जिसकी गोली
बात उसी की चलती है।
सिंहासन है
हत्या के व्यापारी का
झूठ बोलना
राज धर्म का हिस्सा है,
शासक गंगू और
भोज का किस्सा है।
कल दिन था टंडन का
आज तिवारी का॥"12 मौसम बदलता है, पृष्ठ 94

मिश्र जी ने स्वार्थसिद्धि में लिप्त सत्तालोलुप नेताओं की असलियत का पर्दाफ़ाश, विसंगतियों पर प्रहार, कुशासन का निरावरण कर राजनैतिक प्रदूषण को दूर करना रहा है तो दूसरी ओर जन चेतना पैदा कर जन जागरण और जन समर्थन को लक्ष्य बनाया। राजनीति के भयावह खेल ने धन का प्रवाह अवरुद्ध किया। अब पूँजी के इर्दगिर्द सभी समीकरण बनने बिगड़ने लगे। धनबल से संचालित, आत्मकेंद्रित, सुविधाभोगी व्यक्ति को परिवार के महत्व तथा उसके टूटने से उत्पन्न भयंकर परिणामों से अवगत कराना तथा घर संसार की अहमियत का अहसास अति आवश्यक समझा गया। वैश्विक परिदृश्य में युद्ध तथा आतंक की विनाशक गतिविधियों ने लोगों को यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है की मानव जाति और उसकी संस्कृति की रक्षा किस प्रकार की जाय। विषमता की प्रचंडता तथा स्वार्थ की भीषणता से आज का युग आक्रांत है। आदमी का अहंकार इन्हें बराबर बढ़ा रहा है। न कही सुख है न शांति। भोग-विलास की भावना मानव को राक्षस बना रही है। अधिक से अधिक अर्थ संग्रह की कामना भ्रष्टाचार तथा वैमनस्य की आग में घी का काम कर रही है। उदात्त मानव संस्कृति की स्रोतस्विनी सूखती जा रही है। विज्ञान की प्रगति ने मानव को दिशाहीन-सा बना दिया है। विनाश की सारी सामग्री तैयार हो गयी है। मूल्य मंडित विचारधारा तथा सच्ची विश्वदृष्टि लुप्त सी होती जा रही है। "समूची दुनिया जीवन और अस्तित्व के रहस्य खोकर एक भयावह मंडी में बदल गयी है। जहाँ मूल्य और विचार भी बिकने के लिए अभिशप्त हैं। जो ताक़तवर हैं उनका आतंक सब ओर छाया है। कुछ लोग साम्प्रदायिकता तथा धर्मान्धता को वैध बनाने के लिए प्रयत्नशील है।"13 कवि का अर्थात-डॉ.परमानंद श्रीवास्तव पृ.-11

ऐसी परिस्थिति में चिंतक तथा संवेदनशील कवियों का मौन रहना उनकी उत्तरदायित्व हीनता का परिचायक है। मिश्र जी एक जागरूक कवि हैं। उन्हें अपनी साहित्यिक और सामाजिक जिम्मेदारी का ज्ञान है। फलस्वरूप उनकी रचनाओं में इन समस्याओं के प्रति चिंता तथा चिंतन का अभाव नहीं मिलता है। मिश्र जी के गीत अपने समय के साथ आँखें मिलाकर चलते हैं, समय के साथ होते हैं और अवाम की चिंता करते हुए जीवन जीते हुए जीवन की जीवंत परिभाषा रचते हैं। सांस्कृतिक मूल्यों, स्थानीय चेतना, लोक और देशकाल के प्रति सजग अपने परिवेश से गहरी पहचान, यथार्थवादी जीवन दर्शन, मानवीय सत्ता और आत्मीय सम्बन्धों की तप्त ऊष्मा, जीवन की सच ब्यानी के साथ भाव, भाषा और कलात्मक क्षमताओं से लबरेज संयमित गीत प्रवाह है।

संदर्भ ग्रंथ :-

1॰ मौसम बदलता है –डॉ॰ सुधाकर मिश्र
2. शंपा -डॉ॰ सुधाकर मिश्र
3. कवि का अर्थात -डॉ.परमानंद श्रीवास्तव पृ.-11

डॉ॰ उमेश चन्द्र शुक्ल एम॰ए॰, पी-एच॰डी॰
एसोसिएट प्रोफेसर
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
महर्षि दयानंद कॉलेज परेल, मुंबई -400012
shuklaumeshchandra@gmail.com
103 ओशियन व्यू आर॰एन॰पी॰ पार्क भाईन्दर (पूर्व)
ठाणे, मुंबई पिन -410015


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