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ISSN 2292-9754

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11.05.2016


"सौत" से "कफ़न" तक की कथा यात्रा - प्रेमचंद

 मुंशी प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई 1980 को वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद का कथा संसार अत्यंत व्यापक था। उनकी कथा दृष्टि से युगीन समस्याएँ मुखर हो उठती हैं। 1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था- "साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।"

प्रेमचंद सही मायने में एक आधुनिक लेखक थे। उनकी आधुनिकता आज के उपभोक्तावादी,कट्टरवादी सांप्रदायिक ज़माने में आश्चर्य सी प्रतीत होती है। मन में एक प्रश्न बार-बार कौंधता है कि आखिर हम प्रेमचंद के ज़माने कि आधुनिकता को क्यों नहीं बचा पा रहे हैं। प्रेमचंद के कथा साहित्य में धार्मिक अंधविश्वास, स्त्री और दलित की अवमानना किसानों एवं गाँवों की बद से बदतर दशा के कारणों तथा आदर्शवाद के पाखंड का खुलकर विरोध किया है। उन्होंने अपनी कहानियों में केवल जीवन के पराभव एवं अंधकार, स्याह पक्ष को ही शब्द नहीं दिया है बल्कि जीवन की नवीन मानवीय संभावनाओं की तलाश है। प्रेमचंद ने भारतीय कथा परंपरा को पुनर्जीवित किया। हिन्दी कथा साहित्य को रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव से मुक्त करके, यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथा तथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद हिंदी के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित ही नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। उनके पात्रों में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएँ मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं अपने आस-पास देखा है। प्रेमचंद के लेखन की यही शक्ति है कि घटना सत्य से ज़्यादा जीवन के तथ्यपूर्ण सत्य की स्थापना करती है- "अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-व्यवहार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। ....समाज के विभिन्न आयामों को उनसे अधिक विश्वसनीयता से दिखा पाने वाले परिदर्शक को हिन्दी-उर्दू की दुनिया नहीं जानती। परन्तु आप सर्वत्र ही एक बात लक्ष्य करेंगे। जो संस्कृतियों और संपदाओं से लद नहीं गए हैं, अशिक्षित निर्धन हैं, जो गँवार और जाहिल हैं, वो उन लोगों से अधिक आत्मबल रखते हैं और न्याय के प्रति अधिक सम्मान दिखाते हैं, जो शिक्षित हैं, चतुर हैं, जो दुनियादार हैं, जो शहरी हैं। यही प्रेमचंद का जीवन-दर्शन है।"

प्रेमचंद ने हमेशा अपने को क़लम का सिपाही समझा। अपने समय की विसंगतियों, विद्रूपताओं के ख़िलाफ़ प्रेमचंद हृदय में इतनी वेदनाएँ, विद्रोह भाव, इतनी चिन्गारियाँ थीं कि वे उसे सँभाल नहीं सकते थे। मक्कारी से अनभिज्ञ, विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे। लाखों-करोड़ों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढकोसलों को ढोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु। उनके कथा-साहित्य में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढ़ती है। शायद पहली बार, उनके द्वारा ही शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियाँ हैं। सेवासदन, ग़बन, कर्मभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम और गोदान इन सबमें मूल रूप में वही आर्थिक और नैतिक समस्याएँ हैं। "निर्मला" में दहेज-प्रथा ने अनमेल विवाह की स्थिति पैदा की। धनाभाव के कारण मुंशी तोताराम के परिवार में संघर्ष चलते हैं। "ग़बन" के नायक रामनाथ और "गोदान" के होरी को भी आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में- "गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया।.. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।"

प्रेमचंद सार्वकालिक हैं उनके कथा साहित्य में आज भी नूतनता एवं अर्थगर्भिता की झलक मिलती है। अपने युग के यथार्थ को सही ढंग से परखकर इन्होंने अपनी रचनाओं में प्रतिबिंबित किया जिससे मात्र समकालीन ही नहीं परवर्ती पीढ़ी भी प्रभावित हुईं। उन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन ख़ासकर निम्न मध्यवर्गीय एवं कृषक जीवन की सच्ची तस्वीर पूर्ण बेबाकी के साथ अपने उपन्यासों एवं कहानियों में चित्रित की है। उनका साहित्य मानवीय एवं सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण कर घनिष्ठ संवेदन को पाठकों को प्रत्यर्पित कर चिरस्थायी बन गया। उन्हें अपने युग का सर्वश्रेष्ठ दृष्टा कलाकार माना जाता है। साहित्य की सोद्देश्यता में उनकी गहरी आस्था थी। उनका कथा-साहित्य समकालीन युग चेतना को ऐतिहासिक चेतना से जोड़कर उसका प्रामाणिक, कलात्मक एवं विवेकपूर्ण बोध कराता है। लगभग सभी उपन्यासों में उन्होंने किसानों की आर्थिक विपन्नता और उससे उत्पन्न व्यथा और करुणा का मार्मिक निरूपण किया है। व्यवहार और आचरण की विसंगति को स्पष्टवादिता के साथ प्रस्तुत किया है।

साहित्य को कालजयी होने के लिए युगीन जनचेतना से उसका गहरा संबंध अनिवार्य है। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य आम आदमी का संघर्ष से जूझते रहने की सीधी-सच्ची अभिव्यक्ति है। साहित्य के संबंध में उनके विचार हैं, "मेरे विचार से साहित्य की सर्वोत्तम परिभाषा जीवन की आलोचना है चाहे वह निबंध के रूप में, चाहे कहानियाँ अथवा काव्य के रूप में। उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।" उन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी कहानियों में न केवल समाज एवं युग के सत्य को नग्न रूप में प्रस्तुत किया बल्कि यथा शक्य उनके समाधान का रास्ता भी दिखाया है। उन्होंने समाज सुधार एवं वर्त्तमान के निर्माण हेतु दहेज, आडंबर, सूदखोरी, वेश्यावृति, छुआछूत, धामिक प्रपंच, सामंती प्रथा आदि गंभीर समस्याओं को अपने लेखन का विषय बनाया। वे वंचितों एवं शोषितों के उद्धार के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। अपने साहित्य के माध्यम से पाठकों को आशावादी एवं जीवन के प्रति प्रभावी एवं सक्रिय दृष्टिकोण रखने की भावना जागृत करने का प्रयास करते रहे। प्रेमचंद की दृष्टि में जिस क्षण हमारे जीवन में व्याप्त जड़ता का लोप हो जायेगा उसी क्षण हमारे देशवासी अपनी हीनता को भाँप कर स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत हो जायगें। स्वतंत्रता प्राप्ति से नई चेतना का प्रबल संचार होगा जो हमारी दीनता-हीनता को समूल नष्ट करने में सहायक एवं राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा। प्रेमचंद लिखते है - "हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो- जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्योंकि अब और सोना मृत्यु का लक्षण है।" व्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वस्थ सामाजिक चेतना से संपृक्त देखना चाहते थे। प्रेमचंद मात्र युगद्रष्टा ही नहीं युगश्रष्टा भी हैं। हर बड़ा रचनाकार अपने समय से प्रभावित होता है और अपने समय को प्रभावित करता है, प्रेमचंद इसके अपवाद नहीं है। "गबन" उपन्यास का देवीदीन एक नेता से प्रश्न करता है- "साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आँखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाए घूमोगे, इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा?" वर्त्तमान राजनेताओं और नौकरशाहों की सुविधाभोगी प्रवृति उपर्युक्त प्रश्न की सार्थकता स्वतंत्रता के 68 वर्षों के बाद भी हर पल महसूस कराता है।

भारतीय परंपराओं एवं सांस्कृतिक धरोहर में व्याप्त विसंगतियों एवं विद्रूपताओं का प्रेमचंद ने जम कर विरोध किया। वर्ण और जाति के आधार पर सामाजिक शोषण की घृणित व्यवस्था का मुखर विरोध किया है । साम्प्रदायिकता और संकीर्ण मनोवृतियों का पुरज़ोर विरोध करते थे। राष्ट्रीय चेतना एवं स्वराज प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं के रूप में देखते हैं। प्रेमचंद उपनिवेशवाद, सामंतवाद, एवं पराधीनता के ख़िलाफ़ सजग क़लम के सिपाही बनकर लड़ते रहे। उनके साहित्य का मूल स्वर नवचेतना एवं नवजागरण रहा; उनके उपन्यासों का फलक कहीं भी विशुद्ध राजनीतिक नहीं है। उनकी भाषा में सरलता, सहजता तथा व्यावहारिकता है। वे बहुत ही कम शब्दों में अपनी बात कहते थे। प्रेमचंद के अनुसार "जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बराबर बनती रहती है। शुद्ध हिन्दी तो निरर्थक शब्द है, जब भारत शुद्ध हिन्दु होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिन्दी होती। जब तक यहाँ मुसलमान, ईसाई, फारसी आदि सभी जातियाँ मौजूद हैं, हमारी भाषा भी व्यापक रहेगी।" इसीलिए उन्होंने प्रसाद जी की तरह शुद्ध संस्कृतनिष्ठ, आलंकारिक, कलात्मक भाषा का प्रयोग नहीं कर दैनिक जीवन की बोल-चाल की भाषा में साहित्य रचा जिसने पाठकों के हृदय में विशेष स्थान बना लिया। उन्होंने भाषा की सहजता से हिन्दी को अपना ख़ास मुहावरा और खुलापन प्रदान किया जिसने उनके साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारने में बड़ी भूमिका निभाई। अपनी मुहावरेदार भाषा से वर्ण्य-वस्तु, जो जीवनानुभव पर आधारित था, को एक विशिष्ट सामाजिक संदर्भ प्रदान किया। प्रेमचंद अति आदर्शवाद और अति यथार्थवाद के भी विरोधी थे। वे समन्वय के मध्यम मार्ग को अपनाना चाहते थे। यह दृष्टिको्रण अँग्रेज़ी भाषा के प्रति उनके विचार में परिलक्षित होता है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा हैः "अंग्रेजी हमारी पराधीनता की वही बेड़ी है, जिसने हमारे मन और बुद्धि को जकड़ रखा है कि उसमें इच्छा भी नहीं रही। हमारा शिक्षित समाज इस बेड़ी को गले का हार समझने पर मजबूर है।" डॉ. प्रभाकर माचवे ने लिखा है कि अँग्रेज़ी भाषा के इस विरोध में प्रेमचंद इसकी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं करते। उन्होंने स्पष्ट शब्दो में कहा हैः "दुनिया की तहजीवी या सांस्कृतिक बिरादारी में मिलने के लिए अँग्रेज़ी ही हमारे लिए एक दरवाज़ा है और इसकी तरफ़ से हम आँख नही बंद कर सकते, लेकिन हम दौलत और अख्तार की बेतहाशा दौड़ में कौमी भाषा की ज़रूरत बिल्कुल भूल गये और इस ज़रूरत को याद कौन दिलाता"।

साहित्य में कृत्रिम भाषा का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं था। प्रेमचंद शिक्षा की प्राचीन परिपाटी के हिमायती थे। उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता एवं संस्कृति का विरोध अपने साहित्य में अनेक स्थान पर किया है। कर्मभूमि में प्रेमचंद लिखते है- "किराये की तालीम हमारे केरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की ज़रूरत है, डिग्री की नहीं।" वे जीवन निर्माण में संस्कारों को तहजीब देते हैं।

प्रेमचंद ग्राम्य जीवन की सादगी एवं सरलता की प्रतिमूर्ति थे। प्रेम, त्याग, सेवा करुण, क्षमा एवं उदारता आदि उद्यात गुणों को वे मनुष्य के स्वाभाव का अभिन्न अंग मानते थे। उनकी धारणा थी कि गाँव के निर्धन, असहाय और सीधे-सादे लोगों में ये सारे गुण प्रचुरता से मिलते हैं। आधुनिक शहरों के विकास को ग्राम्य जीवन की संस्कृति के लिए घातक मानते थे। परंपरा एवं रूढ़िवादिता पर तीव्र प्रहार के बावजूद प्रेमचंद का ग्राम्य जीवन के प्रति आकर्षण दरअसल उनकी राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है। यंत्र की मानवोचित गुणों एवं मूल्यों को ख़त्म कर देने वाली गति प्रेमचंद को स्वीकार नहीं थी। वे मानव में ईश्वर की प्रतिमूर्ति देखते थे और उन सारी निष्पत्तियों को वे स्वीकार कर चलते थे जो एक आस्तिक व्यक्ति जीवन में आस्था के बल पर मानना चाहता था। मानव और उसके कृतित्व पर उनकी गहरी आस्था थी और इसे वे ईश्वर का पर्याय मानते थे। उन्हें भारतीय सांमजस्यवादी प्रवृति एवं सहिष्णुता में विश्वास था। इसमें गाँधीजी का प्रभाव परिलक्षित होता है। स्वावलंबन को प्रेमचंद स्वराज्य का साधन मानते थे। वे व्यक्ति की मुक्ति के समर्थक थे लेकिन व्यक्ति और समष्टि, जो प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित हो, के परस्पर पूरक संबंधों के हिमायती थे। उनके अनुसार सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा समानता के लिए एक वर्गहीन समाज की आवश्यक है। इस अवधारणा को बल देते हुए, प्रेमचंद गाँधीजी के विचारों के प्रतिकूल उपनिवेशिक समराज्यवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ समरस समाज की संकल्पना करते हैं। प्रेमचंद का स्पष्ट मत है की ज़मींदार, महाजन या पूँजीपति अपने वर्गीय लाभ को किसी प्रकार छोड़ना नहीं चाहते। अपने लेख "अन्धा पूँजीपति" में उन्होंने लिखा है - "यह आशा करना कि पूँजीपति किसानों की दुर्दशा से लाभ उठाना छोड़ देंगे कुत्ते से चमड़े की रखवाली करने की आशा करना है। इस निर्दयी जानवर से अपनी रक्षा के लिए स्वयं ही सशस्त्र होना पड़ेगा।" प्रेमचंद के यहाँ उत्सर्ग और त्याग जैसे उत्सवधर्मी रूप में आते है। प्रेमचंद के शब्दों में - "मैं मज़दूर हूँ! मज़दूरी किए बिना मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।" वहाँ केवल कर्त्तव्य का शुष्क बोध ही नहीं वरन् प्रेम के साथ कर्तव्यबोध के रूप में दिखाई देता है। उनका भावजगत व्यापक और हृदय विराट है। वे निर्धन एवं साधनहीन के कल्याणेच्छु तथा शोषक एवं परपीड़क के प्रबल विरोधी हैं। राष्ट्र एवं साहित्य के लिए प्रेमचंद का योगदान अप्रतिम है। दलित, स्त्री, मजदूर किसान आदि जो भी दलित हैं, पीड़ित है, वंचित है, वह व्यक्ति हो अथवा समूह उसके साथ खड़ा होना प्रेमचंद की शक्ति एवं सामर्थ्य है।"कफ़न"कहानी में घीसू,माधव,बुधियाँऔर कफ़न को लेकर कहानी का जो ताना बाना बुना है। एक साथ कई अर्थछवियाँ मानस पटल पर घूम जाती हैं। प्रेमचंद का सजग कहानीकार समाज की विसंगतिपूर्ण विद्रूप समाज व्यवस्था का पोस्टमार्टम कर डालता है ।


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