अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.03.2017


थोड़ा सा आकाश

थोड़ा सा आकाश तुम्हें ना दे पाया तो क्या दूँगा
विस्तृत सा अहसास तुम्हे ना दे पाया तो क्या दूँगा।
चुनते-चुनते थक जाऊँगा बिखरी-बिखरी सीपों को
सागर सा विश्वास, तुम्हें ना दे पाया तो क्या दूँगा॥

छुटपन में भी ललचाते थे,आज भी वे ललचाते हैं
कितना भी ऊँचा हो लूँ पर तारे हाथ ना आते हैं ।
चमकीला सा दिन हाथ में आते आते फिसल गया
टिम-टिम करती रात, तुम्हें ना दे पाया तो क्या दूँगा॥

धरती को संपन्न बनाने दूर गगन से मोती झरते
नर-वनचर सब भाग-दौड़कर, अपनी-अपनी जेबें भरते।
क्यूँ ना हम भी भरे ख़ज़ाना, बाँह फैलाये, गगन निहारे
ये सदियों की प्यास, तुम्हें ना दे पाया तो क्या दूँगा॥

बरसों पहले जीवन की कवितायें छोड़ गया कोई
किन्तु जाते-जाते अपना साँचा तोड़ गया कोई।
अब तक सँभाले हैं पर कुछ गीत पुराने मैंने भी
बस वो ही मेरे पास, तुम्हें ना दे पाया तो क्या दूँगा॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें