अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.06.2017


प्रतीक्षा

कल तक जो हरे भरे थे
सुंदर थे
लहलहाते थे गर्व से
ऊँचे पेड़ पर।

कल गीत लिखे गए थे जिनपर
कल जीवन कहा गया था जिनको

वो आज धरती पर गिरे हैं
पीले पड़े हैं।

पर आज भी जीवित है
आज भी सुन्दर है
अब भी गीत है उनके पास।

कर रहे हैं प्रतीक्षा
कि झाड़ू लगने से पहले
कोई आये जो सर झुका सकता हो
और टिका सकता हो घुटने

कोई पागल कवि
जो आसमान नहीं ताकता

जो समेटता है
धरती पे बिखरे तारे॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें