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ISSN 2292-9754

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08.28.2016


उसकी तरफ़ इशारा

 परिवर्तन की बात निरा नारा निकला,
हम समझे थे मीठा, लेकिन खारा निकला।

रोज़ नहीं दिखता वह, दिखता कभी-कभी,
सूरज न निकला वह,पुच्छल तारा निकला।

फिरता था वह ओढ़े-ओढ़े चाम चमकती,
जिसके पीछे मनवा उसका, पूरा कारा निकला।

अपने मतलब से आया था मिलने हम से,
मतलब निकला, चला गया, वह नहीं हमारा निकला।

वह आया तो सभ्य समझकर स्वागत बोला,
जाते-जाते पता चला आवारा निकला।

निकला ऐसा ढीठ निकाले न निकले ,
पूरी ताkxत से जब धक्का मारा, निकला।

बड़ी-बड़ी बातों की बड़बड़ करता था,
खुला राज़ तो झूठा उसका क़िस्सा सारा निकला।

कही 'सिद्ध' ने ग़ज़ल, लिया न नाम किसी का,
जो सुन कर बौराया, उसकी तरफ़ इशारा निकला।


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