अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.04.2016


चमन की सैर पर सरकार निकले हैं

 :चमन की सैर पर सरकार निकले हैं।
चमन के आज सारे ख़ार निकले हैं॥

सलामी में सुनाए गीत बुलबुल ने।
सलामी में गुलों के हार निकले हैं॥

लगे है रात जैसे दोपहर दिन की।
लगे है चाँद जैसे चार निकले हैं॥

सुलगते जंगलों की बात जो छेड़ी।
सुलगते आँख से अंगार निकले हैं॥

कभी छाती फुलाकर देखते हम को।
कभी देखो लगे लाचार निकले हैं॥

चलाते गैर तो इतने नहीं चुभते।
चलाते तीर अपने यार निकले हैं॥

सुना था 'सिद्ध' उनकी है हवा लेकिन।
सुना तूफ़ान के आसार निकले हैं॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें