अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.08.2016


अँधेरा इस कदर फैला

नहीं भाते, उन्हें अब बोल उलफ़त के नहीं भाते।
हमेशा नफ़रतों के भाव वाले गीत वो गाते॥

नहीं नामो-निशाँ ग़म का रहा अब दूर तक यारा।
रहे कट चैन से दिन आपके अब लूटते-खाते॥

ज़ुबाँ थी तो मगर ये सोचकर उसने नहीं खोली।
अगर चुपचाप ना लुटते, लुटेरे रूठ ना जाते॥

रहो तुम लूटते यूँ, और हम लुटते रहें यूँ ही।
निभाने को यही तो हैं हमारे आप से नाते॥

पसीने की कमाई से उन्हें दुर्गंध आती है।
ख़ुशी होती उन्हें तब ही, अगर कुछ लूट के लाते॥

सुनाएँ यार हम गर हाल दुनिया का सुनाएँ क्या।
नज़र अपनी खुली रखते, सभी कुछ सामने पाते॥

गड़ाते 'सिद्ध' अपनी पीठ पर ख़ंजर यहाँ अपने।
अँधेरा इस क़दर फैला कि पहचाने नहीं जाते॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें