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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


ऐ सनम

डूबिए कि वेदना का है ये सागर ऐ सनम,
आज तुमको लग रहा किस बात का डर ऐ सनम।

वह सरल था देखिए उस की सरलता का असर,
आदमी है हो गया वो आज बेघर ऐ सनम।

जिसकी ख़ातिर हर क़दम खेला किए हम जान पर,
वो दिखाता है हमें ललकार ख़ंजर ऐ सनम।

दरम्याँ मतलब परस्ती का हुआ है अंकुरण,
पड़ गए संवेदना के मंद से स्वर ऐ सनम।

माना परदे में अभी काली हक़ीक़त है छुपी,
क्या करोगे सामने वो आ गई गर ऐ सनम।

जा रहा हूँ दूर तुझसे मैं हमेशा के लिए,
रुक ठहर कि देख लूँ मैं तुझको जी भर ऐ सनम।

उसने पूछा क्यों नहीं लिखते ग़ज़ल शृंगार की,
मैं ये बोला-पहले मुझसे प्यार तो कर ऐ सनम।

'सिद्ध' जो भी गुल हैं वो सब सेज पर हैं ख़ास की,
और अपनी कट रही है खार ही पर ऐ सनम।


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