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05.03.2012
 

कल अचानक ज़िन्दगी मुझ को मिली
तेजेन्द्र शर्मा


ज़िन्दगी आई जो कल मेरी गली
बंद किस्मत की खिली जैसे कली। 

ज़िन्दगी तेरे बिना कैसे जियूँ
समझेगी क्या तू इसे ऐ मनचली।

देखते ही तुझको था कुछ यूँ लगा
मच गई थी दिल में जैसे खलबली।

मैं रहूँ करता तुम्हारा इन्तज़ार
तुम हो बस, मैं ये चली और वो चली।

तुमने चेहरे से हटायी ज़ुल्फ़ जब
जगमगाई घर की अँधियारी गली।

छोड़ने की बात मत करना कभी
मानता हूँ तुम को मैं अपना वली।

चेहरा यूं आग़ोश में तेरे छिपा
मौत सोचे वो गई कैसे छली।


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