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| 04.05.2009 |
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हर बस्ती-बस्ती में जल रहे घर हैं
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हर बस्ती-बस्ती में जल रहे घर हैं सपनों के महलों में रहते थे कल तक थक के बैठ जाते है चन्द कदम चल के, फूलों सा सहेज रखा था अब तलक़ जिसे, पंछियों की बस्तियाँ भी अब उजड़ गई हैं, |
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