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04.18.2014


अब हर रोज दीये जलाने से

अब हर रोज दीये जलाने से डरता हूँ मैं,
जलाया है जब से रोशनी ने घर मेरा॥

किसी को अब अपना बनाने से डरता हूँ मैं,
छीना है अपनों ने ही जब से सर्वस्व मेरा॥

ख़ुद पर भी नहीं है अब ऐतबार मुझको,
ऐतबार ने ही लुटा है जब से ऐतबार मेरा॥

हर जंग वक़्त के साथ आज लड़ रहा हूँ मैं,
लुटा है उसने जब से हँसता संसार मेरा॥

बढ़ा है ऐतबार और भी उस ख़ंजर पर,
बहाया है उसने जब से ख़ूने-जिगर मेरा॥

यूँ ही हँसता, गाता, गुनगुनाता सदा रहूँ मैं,
बस यही आरज़ू है, फ़लसफ़ा है मेरा॥


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