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ISSN 2292-9754

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02.12.2016


"सर" का डर...!

जल्दी-जल्दी खाना खा... डर लगे तो गाना गा...। तब हनुमान चालिसा के बाद डर दूर करने का यही सबसे आसान तरीक़ा माना जाता था। क्योंकि गाँव- देहात की कौन कहे, शहरों में भी बिजली की सुविधा ख़ुशनसीबों को ही हासिल थी। लिहाज़ा शाम ढलने के बाद शहर के शहर अँधेरे के आगोश में चले जाते थे। हर तरफ़ डिबरी या लालटेन की लौ टिमटिमाती नज़र आती। किसी बड़े दुकान या मकान के सामने पेट्रोमैक्स दिख जाए तो कौतूहल होता कि यह क्या चीज़ है जो इतनी रोशनी दे रहा है। ऐसे में यदि किसी को ज़रूरी काम से बाहर निकलना पड़ जाए तो उसकी घिग्गी बँध जाती थी। मानो भूत-प्रेत, पिशाच व चुड़ैल नाइट वॉक पर निकले हों।

ख़ैर बचपन के उस दौर में एक बात ब्रह्म वाक्य की तरह अटल थी कि फ़िल्मी हीरो किसी से नहीं डरते। सात-सात को साथ मारते हैं। हम सीट पर बैठे साँस रोक कर देख रहे हैं कि पर्दे पर हीरो चारोंरो ओर से घिर चुका है। लेकिन वह डरता नहीं, बल्कि घेरने वालों को ही घेर कर मार रहा है। 70 के दशक में महानायक ने तो हद ही कर दी। कुछ गुंडे-बदमाश हाथ धो कर उसके पीछे पड़े हैं। उसे इधर-उधऱ ढूँढ रहे हैं। हम काँप रहे हैं कि बेचारे का अब क्या होगा? लेकिन यह क्या वह तो ढूँढने वाले के डेरे पर ही बेफ़िक्री से पाँव पसार कर लेटा है और दरवाज़े पर ताला लगा कर उन्हें चुनौती देता है। फिर एक-एक कर सभी की जम कर पिटाई और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा है। किशोर होने तक हमारे भीतर यह धारणा बैठी रही कि फ़िल्मी पर्दे वाले "सर" किसी से डर नहीं सकते। हालाँकि यदा-कदा यह सुनने को ज़रूर मिलता कि फलां हीरो के यहाँ इन्कम टैक्स की रेड पड़ी है और बेचारा परेशान है। लेकिन हमें विश्वास नहीं होता था। हम सोचते थे कि हमारा हीरो रेड मारने वालों की ऐसी-तैसी करके रख देगा। कम से कम उन्हें खरी-खोटी तो ज़रूर सुनाता होगा। लेकिन जल्द ही यह मिथ टूटने लगा। तोप सौदे में नाम आने पर एक महानायक बुरी तरह से डर गए। वहीं मुंबई बम धमाके के बाद असलियत खुली कि फ़िल्मी दुनिया से जुड़े तमाम "सर" सबसे ज़्यादा डरे रहते हैं। इतना ज़्यादा कि कोई भी गुंडा-मवाली उन्हें धमका लेता है। उनके डर भी कई प्रकार के होते हैं। माफ़िया और गुंडे-बदमाश तो अपनी जगह हैं ही, इन्कम टैक्स और तमाम तरीक़े के कानूनी नोटिसों का ख़ौफ़ उनकी नींद हराम किए रहता है। बेचारे चैन से सो भी नहीं पाते। वर्ना क्या वज़ह है कि माइक हाथ में आते ही ये तमाम "सर" डर का रोना लेकर बैठ जाते हैं। इतना भयाक्रांत तो गाँव-क़स्बे के घुरहू-कल्लू भी नज़र नहीं आते। यह सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है। एक नायक ने दम भरा कि इनटालरेंस भरे माहौल में अब उसे डर लगने लगा है। दूसरा उससे भी आगे निकल गया। उसने यहाँ तक कह दिया कि डर के चलते उसकी पत्नी बाल-बच्चों समेत देश से निकल जाने की सोचती है। वैसे ही जैसे नाराज़ बीवी मायके जा बैठती है। बिल्कुल उसी तरह उनकी अर्द्धांगिनी विदेश निकलने की सोचती रहती है।

फ़िल्मी पर्दे वाले तमाम "सरों" के डर से सहमति जताते हुए दूसरी दुनिया के दूसरे "सर" थोक के भाव में सरकार से मिले पुरस्कार वापस लौटाने लगे। बड़ी मुश्किल से यह बवाल थम पाया था लेकिन हाल में एक दूसरे सर बोल पड़े कि उन्हें हर समय कानूनी नोटिस का डर लगा रहता है। पता नहीं कब उनके यहाँ नोटिस पहुँच जाए। तमाम "सरों" के उचित-अनुचित डर से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि बड़े नाम वाले तमाम "सर" बुरी तरह से डर के शिकार हैं। उनसे ज़्यादा निडर तो गाँव-शहरों में रहने वाले वे आम-आदमी हैं जिन्हें ज़िंदगी क़दम-क़दम पर डराती है, लेकिन वे निडर बने रह कर उनसे जूझते रहते हैं।


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