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ISSN 2292-9754

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01.10.2016


मुखर-मुखिया, मजबूर मार्गदर्शक...!!

तेज़-तर्रार उदीयमान नेताजी का परिवार वैसे था तो हर तरफ़ से ख़ुशहाल, लेकिन गाँव के पट्टीदार की नापाक हरकतें समूचे कुनबे को साँसत में डाले था। कभी गाय-बैल के खेत में घुस जाने को लेकर तो कभी सिंचाई का पानी रोक लेने आदि मुद्दे पर पट्टीदार तनाव पैदा करते रहते। इन बातों को लेकर गाँव में लाठियाँ तो बजती हीं; दोनों पक्षों के बीच मुक़द्दमेबाज़ी भी जम कर होती।

पूरा परिवार परेशान! उदीयमान नेताजी पट्टीदार को सबक सिखाने में सक्षम थे, लेकिन समस्या यह थी कि घर के मालिक के दिल में पट्टीदार के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर था। बात बढ़ती तो मालिक बोल पड़ते, अरे रहने दो ... उसे औक़ात बताना कौन सी बड़ी बात है, लेकिन जाने दो ... है तो आख़िर अपना ही खून...।

इस पर परिवार के लोग मन मसोस कर रह जाते। उधर पट्टीदार की पेंच परिवार को लगातार परेशानी में डालती जा रही थी। रोज़-रोज़ के लड़ाई-झगड़े और पुलिस-कचहरी का चक्कर। आख़िर एक दिन ऐसा आया जब परिवार के लोगों की एकराय बनी कि घर का मालिक-मुख़्तार यदि उदीयमान नेताजी को बना दिया जाए तो वे पट्टीदार को छटी का दूध याद करा देंगे। क्योंकि उनकी पुलिस वालों के साथ गाढ़ी छनती है और सत्ता के गलियारों में भी गहरी पकड़ है। आख़िरकार परिवार वालों के दबाव के आगे मालिक ने हथियार डाल दिए और भविष्य के लिए उन्होंने मार्गदर्शक की भूमिका स्वीकार कर ली। नेताजी को घर का मालिक बना दिया गया।

रहस्यमयी मुस्कान के साथ उदीयमान नेता ने अपनी पारी शुरू की। उधर गाँव में तनाव चरम सीमा पर जा पहुँचा।

सभी को लगा ... बस अब तो आर या पार...

नेताजी के परिजनों को यही लगता रहा कि बिगड़ैल पट्टीदार की अब ख़ैर नहीं। पट्टीदार का परिवार भी सशंकित बना रहा।

एक दिन उदीयमान नेता ने बिगड़ैल पट्टीदार को न्यौते पर घर बुला लिया। पूरा परिवार सन्न। नेताजी के चेहरे पर वही रहस्यमय मुस्कान। सब को लगा यह शायद नेताजी की कोई कूटनीति है। उधर पट्टीदार के परिवार को भी साँप सूँघ गया।

आख़िरकार भारी तनाव व आशंका के बीच तय तारीख़ पर पट्टीदार नेता के घर पहुँचे। आशीष-पैलगी का लंबा दौर चला।

नेता ने पूरा सम्मान देते हुए हाल-चाल लिया। लेकिन दोनों पक्ष लगातार सशंकित बने रहे।

नेताजी ने पट्टीदार से पूछा... दद्दा आपके ब्लड प्रेशर के क्या हाल है। काबू में न हो तो जान-पहचान वाले शहर के बड़े डॉक्टर के पास ले चल कर दिखाएँ।

इस पर पट्टीदार के चेहरे पर कृतज्ञता के भाव उभरे जबकि दोनों पक्ष सन्न!

क्योंकि कहाँ तो आशंका तनातनी की थी, लेकिन यहाँ तो भलमनसाहत दिखाने की होड़ शुरू हो चुकी थी।

कुछ देर बाद पट्टीदार ने देशी घी का डिब्बा नेताजी के हवाले करते हुए बोले... बचवा ई कल्लन की ससुरारी से आवा रहा, जा घरे दई आवा...

अब कृतज्ञता के भाव नेताजी के चेहरे पर थे।

घर पर घी का डिब्बा रख कर नेताजी लौटे तो उनके हाथ में कुछ था।

सदरी भेंट करते हुए नेताजी बोले... दद्दा दिल्ली गा रहे तो तोहरे लिए लावा रहा, लया रख ल्या। जाड़े में आराम रही...।

फिर अपनत्व दिखाते हुए बोले ... दद्दा अगले महीने अजिया की बरसी करब, सब तोहरेय के देखए के पड़े...

स्नेह उड़ेलते हुए पट्टीदार ने कहा... अरे काहे ना देखब बचवा, तू का कोनो गैर हवा...

दोनों पक्ष एक बार फिर सन्न! क्योंकि सब कुछ अप्रत्याशित हो रहा था।

पट्टीदार और भावुक होते हुए बोले... बेटवा अगहन में अजय नारायण का ब्याह है... पूरा सहयोग करे के पड़ि...

नेताजी ने जवाब दिया... दद्दा शर्मिंदा न करा... अब तू निश्चिंत रहा...

बिसात पर खेले जा रहे शह और मात के इस खेल से नेताजी और पट्टीदार का परिवार ही नहीं बल्कि पूरा गाँव सन्न था।

दोनों पक्ष के मुखिया दरियादिली पर मुखर थे, जबकि दूसरे मूकदर्शक बने रहने को मजबूर ...।

लगता है भारत-पाकिस्तान संबंधों के मामले में नमो और उनके समकक्ष मवाज का मसला भी कुछ ऐसा ही अबूझ है।


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