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ISSN 2292-9754

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03.10.2016


​और बड़कू मामा बन गए बुद्धिजीवी​

बड़कू मामा ग़रीब बैकग्राऊंड से थे। लेकिन जैसा कि नाम से स्पष्ट है, वे अपने परिवार के दूसरे भाई-बहनों में बड़े थे। लिहाज़ा उन्हें अपनों का सुनिश्चित सम्मान बराबर मिलता था। घर के बड़े बुज़ुर्ग भी परिवार के सभी सदस्यों को बड़े के नाते उन्हें अनिवार्य सम्मान देने का प्रेमपूर्वक दबाव देते रहते। लेकिन इस अनड्यू एडवांटेज़ के चलते बड़कू मामा में उचित-अनुचित किसी भी तरी्क़े से सम्मान पाने की ललक तेज़ होने लगी।

कोई उन्हें बड़कू नाम से पुकारता तो उनके तन-मन में आग सी लग जाती। उन्हें लगता वे किसी न किसी सम्मानजनक संबोधन के अधिकारी हैं। लिहाज़ा उन्हें एक उपाय सूझा। वे गाँव के कुछ गरीब-अनाथ बच्चों को पढ़ाने लगे। वे हर बच्चे को कहते कि उन्हें मास्टरजी कह कर पुकारा जाए। उनकी युक्ति काम कर गई। जल्द ही वे पूरे गाँव में मास्टरजी नाम से पुकारे जाने लगे।

उनकी कीर्ति धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

इसके पीछे उनके उद्यम की विशेष भूमिका रही। वे ख़ुद ही लोगों को उन्हें मास्टरजी कह कर पुकारने को प्रेरित करते रहते। धीरे-धीरे मास्टरजी का संबोधन उनका पर्याय बन गया। कोई जिज्ञासु उनसे पूछता कि वे किस स्कूल के मास्टर हैं तो वे बगले झाँकने लगते। या फिर गोल-मोल जवाब देकर सवाल टाल जाते। जिस तरह भूखे को अन्न का टुकड़ा मिलने पर उसकी भूख ज्वाला की तरह धधक उठती है उसी तरह बड़कू मामा के सम्मान की भूख भी बेक़ाबू होने लगी। उन्हें ख़ुद को बुद्धिजीवियों की पाँत में शामिल करने का शौक़ चर्राया। लेकिन इसमें वे ख़ुद को असहाय महसूस करते। क्योंकि बुद्धिजीवी कहलाने की न्यूनतम योग्यता भी उनमें नहीं थी। लेकिन जज़्बा तो ख़ैर कूट-कूट कर भरा ही था।

उन्होंने इसके लिए भी एक उपाय किया। अपने मिशन के तहत उन्होंने पहले ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर बातें करने का सिलसिला शुरू किया। किसी को पुकारना हो या सामान्य सी भी कोई बात करनी हो तो इतने ज़ोर से चिल्ला कर बोलते कि दूर-दूर तक उनकी गर्जना सुनी जाती। वे हमेशा कुतर्क भी करने लगे। कोई दिन को दिन कहता तो वे उसका गला पकड़ लेते। उनका कुतर्क होता... "मैं नहीं मानता, मैं साबित कर सकता हूँ कि अभी दिन नहीं रात है।"

इससे पूरे इलाक़े में उनका ख़ौफ़ तैयार होने लगा। कोई भी उनके मुँह लगना नहीं चाहता। लेकिन इससे बड़कू मामा का अहं तुष्ट होने लगा। अपनी ग़लत बात को भी साबित करने के लिए बड़कू मामा मनघढ़ंत आँकड़ों का कुछ यूँ उद्धरण देते कि सामने वाला घबरा जाता। कोई देश-दुनिया की चर्चा करता तो वे चिल्ला-चिल्ला कर बोल पड़ते, "अरे हमारे फलां महापुरुष, क्या ज़रूरत थी फलां तारीख़ को यह घोषणा करने की। उनके समकक्ष अमुक नेता ने फलां साल की फलां तारीख़ को पहले ही आगाह कर दिया था। लेकिन वे नहीं माने। अब हम उनकी करनी का फल भुगत रहे हैं।"

बड़कू मामा की यह उक्ति भी काम कर गई। लोग उनसे डरने लगे। उन्हें लगता कि बड़कू मामा के पास हर बात का रिकार्ड है। समाज के ख़ास मौक़ों पर उनकी राय सबसे अलग होती। अपनी ग़लत बात को भी सही साबित करने के लिए बड़कू मामा के तरकश में तर्क के सैकड़ों तीर हमेशा सजे होते। जिससे बड़कू मामा जल्द ही प्रगतिशील बुद्धिजीवी के रूप में स्वीकार कर लिए गए। हर कोई उनसे ख़ौफ़ खाने लगा।

हालाँकि गाँव के शरारती युवक कल्लन की कारस्तानी से बड़कू मामा का आभामंडल मद्धम पड़ने लगा। क्योंकि वह युवक भी बड़कू मामा की टक्कर के कुतर्क पेश कर उनसे लोहा लेने लगा। मनघढ़ंत तर्क और आँकड़े पेश करने में वह बड़कू मामा से हमेशा इक्कीस साबित होने लगा।

मुझे लगता है देश की बर्बादी की कामना करने वाले देशद्रोह को अभिव्यक्ति की आज़ादी बताने वाले तमाम लोग भी एक तरह से बड़कू मामा जैसे ही हैं। जो ओछी हरकत का समर्थन करके अपने को दूसरों से अलग दिखाना चाहते हैं। उनकी इच्छा शायद सेलिब्रेटी बनने की भी हो।

लेकिन याद रहे कि जिस दिन उनका पाला कल्लन से पड़ेगा, कलई खुलने में देर नहीं लगेगी।


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