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ISSN 2292-9754

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01.25.2016


आर्ट आफ टार्चरिंग

बाज़ारवाद के मौजूदा दौर में आए तो मानसिक अत्याचार अथवा उत्पीड़न यानी टार्चरिंग या फिर थोड़े ठेठ अंदाज़ में कहें तो किसी का ख़ून पीना... भी एक कला का रूप ले चुकी है। आम-आदमी के जीवन में इस कला में पारंगत कलाकार क़दम-क़दम पर खड़े नज़र आते हैं।

एक आम भारतीय की मजबूरी के तहत क़स्बे से महानगर जाने के लिए मैं घर से निकलने की तैयारी में था। चाय पीते हुए आदतन मेरी नज़रें टेलीविजन पर टिकी हुई थी। सोचा ज़माने के लिहाज़ से हमेशा अपडेट रहना चाहिए।

एक चैनल पर ख़बर चल रही थी... आइपीएल के लिए फलां क्रिकेटर इतने करोड़ में बिका...। चैनल पर हुँकार भरते उस खिलाड़ी की तस्वीर के पार्श्व में परिजनों का इंटरव्यू दिखाया जा रहा था। भावुक होते हुए परिजन कह रहे थे... हमें उम्मीद थी.. एक दिन उसकी इतनी बोली ज़रूर लगेगी... इतने करोड़ की कीमत पर वह नीलाम होगा...।

मैने मुँह बिचकाते हुए चैनल बदल दिया।

दूसरे चैनल पर ख़बर चल रही थी ... बालीवुड का फलां शहंशाह मुंबई के समुद्री तट के किनारे इतने सौ करोड़ का नया बँगला बनवा रहा हैं। यह भी बताया जाता रहा कि जनाब के मुंबई में ही 8 और शानदार बँगले हैं। दुनिया के कई देशों में शहंशाह ने फ़्लैट खरीद रखे हैं।

मुझे लगा जैसे स्ट्रायर लगा कर किसी ने मेरे शरीर से थोड़ा सा ख़ून पी लिया।

टेलीविज़न बंद कर मै बड़े शहर की ओर निकल पड़ा।

ट्रेन में बैठने से पहले समय काटने की मजबूरी के चलते मैने अख़बार खरीदा। अख़बार खोलते ही नज़रें रंगीन पन्नों पर टिक गई। मैं भीषण गर्मी से बेहाल हो रहा था। उधर पन्नों पर समुद्री लहरों के पास एक अभिनेत्री बिकनी पहने हुए दौड़ लगा रही थी। मुझे फिर मानसिक अत्याचार का अहसास हुआ। बेचैनी में पन्ने पलटते ही नज़रें एक और ऐसी ही ख़बर पर टिक गई। जिस पर लिखा था कि पेज थ्री कल्चर वाले एक प्रसिद्ध शख़्सियत ने अपनी पाँचवी पत्नी को तलाक़ दे दिया। ख़बर के साथ दोनों की मुस्कुराती हुई फोटो भी छपी थी। साथ में यह भी लिखा मिला कि दोनों ने यह फ़ैसला आपसी सहमति से किया लेकिन दोनों आगे भी अच्छे दोस्त बने रहेंगे।

मुझे फिर ख़ून पीए जाने का अहसास हुआ। लगा ज़िंदगी की जद्दोजहद में जुटे लोगों तक ऐसी ख़बरें पहुँचाने वाले ज़रूर आर्ट आफ टार्चरिंग यानी ख़ून पीने की कला में पीएचडी कर चुके होंगे। जो पहले से हैरान-परेशान लोगों के कुढ़ने का बंदोबस्त कर रहे हैं।

कुछ दूर चल कर ट्रेन अचानक रुक गई। पता चला राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन के तहत चक्का जाम किया जा रहा है। प्यास से व्याकुल हो कर पानी की तलाश में मैं प्लेटफार्म पर इधर-उधर भटकने लगा। लेकिन ज़्यादातर नल सूखे पड़े थे। कुछेक से पानी निकला भी तो चाय की तरह गर्म। कुढ़ते हुए मैं मन ही मन व्यवस्था को अभी कोस ही रहा था कि सामने लगे होर्डिंग्स पर नज़रें टिक गई। जिसमें समुद्र की उत्ताल तरंगों से कुछ युवक-युवतियाँ अठखेलियाँ कर रहे थे। विज्ञापन के बीच शीतल पेय से निकलने वाला झाग उसी समुद्र के जल में मिल रहा था।

मुझे एक बार फिर मानसिक अत्याचार का बोध हुआ।

किसी तरह गंतव्य पर पहुँचा तो ट्रेन से उतर कर बस में चढ़ने की मजबूरी सामने थी।

जैसा कि सभी जानते हैं कि महानगरों की बसें नर्क से कुछ कम अनुभव नहीं कराती। ठसाठस भरी बसों में यात्री बूचड़खाने के मवेशी की तरह ठूँसे हुए थे। रेल सिग्नल पर जब बस रुकती तो इधर के यात्री उधर और उधर के यात्री इधर होते हुए ... उफ़्फ़, आह आदि के साथ अरे यार... आदमी हो या ... अरे भाई साहब ज़रा देखा कीजिए... जैसे वाक्य दोहराते हुए एक-दूसरे पर गिर-पड़ रहे थे। रेड सिग्नल पर बस के रुकने पर अगल-बगल से गुज़रती बेशकीमती चमचमाती-कारें हमें अपने फटीचरपन और जीवन की व्यर्थता का लगातार अहसास कराती जा रही थी।

उधर बस से उतरते ही बड़े-बड़े होर्डिंग्स फिर मुँह चिढ़ाने लगे। जिस पर एक से बढ़ एक महँगी कारों की तस्वीरों के पास किसी पर अभिनेता-अभिनेत्री तो किसी पर नामी-गिरामी क्रिकेट खिलाड़ी खड़े मुस्कुरा रहे थे। सभी का साफ़ संदेश था... बेहद आसान किश्तों पर अब ले ही लीजिए... वग़ैरह-वग़ैरह।

ऐसे आक्रामक प्रचार से मेरा कुछ और ख़ून सूख चुका था।

जीवन की दुश्वारियों की सोचते हुए मैं नून-तेल की चिंता में मगन था। लेकिन खून पीने वाली अदृश्य शक्तियाँ लगातार सक्रिय थी। सड़क के दोनों तरफ लगे कुछ होर्डिंग्स मनोरम और रमणीय स्थलों पर आकर्षक फ्लैट के चित्रों को रॆखांकित करते हुए उन्हें खरीदने की अपील कर रहे थे।

मुझे फिर मानसिक अत्याचार का भान हुआ। लगा आर्ट आफ टार्चरिंग के कलाकार वापस घर पहुँचते-पहुँचते मेरे शरीर का सारा खून पीकर ही दम लेंगे।


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