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12.09.2008
पुस्तक समीक्षा
प्रकृति चित्रण का द्रष्टव्य काव्य संकलन – ’सिमट रही संध्या की लाली
कवयित्री : डॉ. श्रीमती तारा सिंह
समीक्षक : कृष्ण मित्र

समीक्ष्य पुस्तक  -   सिमट रही संध्या की लाली

कवयित्री        -  डा० श्रीमती तारा सिंह, मुम्बई

समीक्षक      -    श्री कृष्ण मित्र,

                                      वरिष्ठ कवि, पत्रकार (गाजियाबाद)

      

 

 सिमट रही सध्या की लाली यह कविता संकलन वरिष्ठ कवयित्री डा० तारा सिंह की नवीनतम काव्यकृति है। कुल बत्तीस कविताओं को अस्सी पृष्ठों में समाहित कर रचनाकार ने अपने समृद्ध काव्य सौष्ठव को पाठकों के सम्मुख रखा है।

प्रथम कविता में ही समस्याओं के निदान का अन्वेषणात्मक भाव स्पष्ट हुआ है। सूरज, चाँद, तारागण, मनुजलोक, इन्द्रलोक आदि इन अनन्त जिज्ञासाओं में डूबकर कवयित्री चिर नवीन स्वप्नों की ओर उन्मुख हैं। उसके अनुसार तप तपस्या से प्राप्त होने वाली व्यथा को सहन करना एक दु;साहस से कम नहीं है। अतृप्त हृदय के रुदन को अपने जीवन का संगीत बनाकर ज्ञान की रश्मियों से मनुष्य के उन सत्कर्मों का आभास देने  को आतुर है, जिस के अतीत को वीरानों में भटकते हुए देखा गया है। कवयित्री निस्तब्ध वातावरण को अपने आसपास की परिधि से जोड़कर, पृथ्वी के सौन्दर्य का अवलोकन करने में व्यस्त है। वह कह रही है कि तुम्हारे सुखों को ललकारने का साहस किसने किया है। उसका मत है कि जब तक यह दीप रूपी जीवन आलोकित है तब तक इस संसार में, अपनत्व के सम्बन्ध हैं।

डा०  तारा  सिंह  प्रकृति  का चित्रण करने वाली कवयित्री हैं। जीवन रेती पर सुंदर मुखाकृति शीर्षक कविता में प्रकृति के साथ उनका तादात्म्य स्थापित हुआ है। अतीत की धूप छाँव को वह स्मृतियों में संजोकर चल रही है। वह कहती है, जब भी अतीत का स्मरण करती हूँ तो साँसें टूटने लगती हैं। अतृप्ति उसके नयनों की भूख बनकर किसी पीड़ा का अंत ढूँढ़ रही है। अपनी कविता,  ऋतुपति का कुसुमोत्सव घर यहीं है में लगातर प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन देखा जा सकता है। सुदीर्घ कविता में रवि, शशि, तारक, आकाश आदि उपमानों का मानवीकरण हुआ है। अपने हृदय की दाहक स्थिति को  भी कवयित्री अत्यन्त सरल किन्तु साहित्यिक भाषा में व्यक्त करने की समर्थ कोशिश कर रही है।

ढलती हुई जीवन की संध्या का वर्णन अपने आप में मोहक बन पड़ा है। कवयित्री ने स्वयं से प्रश्न किया है कि इस मनुज लोक का बिखराव , क्या देने को आतुर है। यद्यपि मनुष्य यह भली -भाँति जानता है कि धरती और व्योम इस प्रकृति के अभिन्न अंग हैं। नारी को नर का ही सम्बल मानकर वह कहती है कि चिता सब को नहीं जला सकती ; क्योंकि मरण ही सब कुछ नहीं है। जीवन यद्यपि नश्वर है मगर उसमें भी ज्योति का आभास है। प्रयागपर लिखी कविता संकलन की एक अच्छी कविता है। तीर्थ राज प्रयाग का अद्भुत वर्णन इस संसार में व्याप्त सुखों का आगार बन गया है।

डॉ. तारा सिंह के इस संकलन में उल्लेखनीय कविताओं में वही है शाश्वत शोभा का उपवन, तुम्हारी यादों की स्मृति, काँटों से सेवित है मानवता का फ़ूल यहाँ और एक धार में जग जीवन बहता आदि शीर्षक हैं। कवयित्री ने  जिन अन्य कविताओं में अपनी काव्यात्मक  प्रतिभा  का प्रदर्शन किया है उनमें वसन्त की पद- ध्वनि सुनाती कविता, और कहाँ चला गया मेरा वह सपना अनमोल पठनीय है। कल्पनाओं का रुदन भी कवयित्री को उद्वेलित कर रहा है; झंझा के प्रवाह से नि:सृत यह पंचभूत का मिश्रण जीवन बनकर सम्मुख है। वह कहती है कि सूखे नयन, रूखी पलकें और एकान्त में बैठकर जब तुम्हारी छवि देखूँगी तभी मैं अपनी मांग भरूँगी।

इस के अलावा हिन्द है वतन हमारा, जहाँ तप रहे व्योम और तारा, पथ में पग ज्योति झलकती उसकी, पहले ही दुनिया थी अच्छी, तथा कोई तो मेरा अपना हो, डा० तारा सिंह ने मानवता के विप्र आदि रचनाओं में शिल्प विधान भाषा की साहित्यिकता, छन्दों का निर्वाह भली-भाँति किया है। छपाई सुंदर है।


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