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ISSN 2292-9754

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03.26.2015


बाल साहित्य की संस्कार क्षमता एवं उपादेयता

बाल साहित्य एक समस्त पद है जो बाल और साहित्य दो शब्दों से मिलकर बना है। बाल साहित्य बालकों बालिकाओं का साहित्य है, बाल पाठकों के लिए स्वीकृत साहित्य को ही हम बाल साहित्य कहेंगे। देखा जाये तो साहित्य का निर्माण बड़ों को ध्यान में रखकर किया जाता है और बच्चे उसी से अपना मनोरंजन कर लेते हैं, किन्तु बहुत सारी परिस्थितियों में देखा गया कि बच्चों के मनोरंजन के लिए भी साहित्य का निर्माण किया जाना चाहिए, यदि हम संस्कृत साहित्य पर दृष्टि डालें तो हमें पता चलेगा की बालकों को शिक्षा देने के लिए विष्णुशर्मा ने पंचतंत्र की रचना की जो मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें ज्ञान भी प्रदान करता है और आज भी उसका हिंदी अनूदित रूप बच्चों में लोकप्रिय है।

साहित्य भूमि पर बचपन की दस्तक शब्दों में मासूमियत की दस्तक है। यह उस क्षण की खोज है जब से बालक की स्वतंत्र अस्मिता को पहचानने का चलन शुरू हुआ। उस अवसर की खोज है जब यह माना जाने लगा कि बालक स्वतंत्र नागरिक है तथा बच्चों की सक्रिय मौजूदगी के अभाव में कोई रचना उन पर थोपी हुई रचना कही जानी चाहिए। प्राचीन भारतीय वाङ्मय यथा स्मृतियों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों आदि में इस पर विस्तार से चर्चा है। उपनिषद का तो मतलब ही गुरु के आगे बैठकर ज्ञानार्जन करना है। वेद-उपनिषदादि में एकलव्य, नचिकेता, उपमन्यु, ध्रुव, अभिमन्यु, आरुणि उद्दालक आदि उदात्त बालचरित्रों का वर्णन हैं। उनमें दर्शन है, गुरुभक्ति है, त्याग है, समर्पण है, प्रेम और श्रद्धा भी है। सूरदास ने कृष्ण की बाललीलाओं का ऐसा मनोरम वर्णन किया है जिसका उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। लेकिन सब बड़ों द्वारा, बड़ों के बड़े उद्देश्य साधने के निमित्त किया गया साहित्यिक आयोजन था। बचपन का मुक्त उल्लास वहाँ अनुपस्थित है। लेकिन यह भी स्मरण रखने योग्य है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर तो मनुष्य सभ्यता के आरंभ से ही सजग था, परंतु बचपन पर वास्तविक विमर्श काफी विलंब से आरंभ हो सका।1

आज जीवन को जोड़ने वाले बाल साहित्य की अत्यधिक आवश्यकता है जो सामयिकता और स्थितियों के परिपेक्ष्य में लिखा गया हो। बाल साहित्य में बच्चों की रुचियों, ज़रूरतों भावनाओं और संवेदनाओं को भी समझने की आवश्यकता है। आज बाल साहित्य बच्चों के मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी भावनाओं को आगे बढ़ाने, ज्ञान को समृद्ध करने यथार्थ बोध को समझने सरल और सुबोध भाषा शैली में रचित सृजनात्मक चेतना को प्रेरित कर बालक में आशावादी दृष्टिकोण एवं आत्मनिर्भरता की भावना के विकास में सहयोग देने वाला साहित्य ही बाल साहित्य कहलाने लगा है।2

बालकों के भविष्य निर्माण में घर के वातावरण के साथ-साथ बाल साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है मुंशी प्रेमचंद लिखते है- "हर मनुष्य को अपने बचपन की वे कहानियाँ याद होगी जो उसने अपनी माता या बहन से सुनी थीं" बाल मन बहुत ही कोमल होता है और उस पर पड़ने वाले प्रभाव भी बहुत गहरे और स्थायी होते हैं। महात्मा गांधी के अनुसार- ‘सच्ची शिक्षा वह है जो बालकों की आध्यात्मिक बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं को अभिव्यक्त और प्रोत्साहित कर सके।’ अतः बालकों के विचार भावना और संवेदना का पोषक यह साहित्य ही होता है जिसे बाल साहित्य कहा जाता है बालकों के भविष्य निर्माण उनकी रुचियों के परिष्कार में बाल साहित्य की महती भूमिका है।

भारत संस्कारों की भूमि है, आज का बालक कल का नागरिक है, अतः उसमे संस्कार सृजित करना हमारा परम कर्तव्य है। यह बहुत कुछ साहित्य से ही संभव है। बच्चे सृष्टि की अनमोल सौगात हैं उनका बचपन स्वछंद रहता है, बच्चों में सृजन और कल्पनाशीलता का अद्भुत खज़ाना छिपा होता है। बालक का संसार और संस्कार विकसित करने में प्रथम स्थान परिवार का है इसलिए कहा भी जाता है कि माता प्रथम गुरु है, क्योंकि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सदाचार और चरित्र की छाप बच्चों को उपदेश देने से नहीं वरन माता-पिता के आचरण व्यवहार और संस्कारों से पड़ती है और द्वितीय स्थान साहित्य का है इसका ज्ञान भी बालकों के परिवार से ही विकसित होता है। भारत वर्ष में स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी आदि प्रखर महापुरुष हुए हैं जिन पर घर के संस्कार और साहित्य का प्रभाव पड़ा है।

व्यावहारिक रूप में बच्चों को संस्कारित करने के लिए बाल मनोविज्ञान को आधार बनाकर माता-पिता का दायित्व संस्कृत साहित्य में ही निश्चित कर दिया गया था

लालयेत् पंचवर्षाणि ताडयेत् दशवर्षाणि च ।
प्राप्ते शोडसे वर्षे मित्रमिव समाचरेत ।।

बालकों को नाटक, कहानी, कविता आदि के माध्यम से संस्कार देने का चलन अत्यंत प्राचीन है। बाल नाटकों की तुलना में बाल कथाएँ तथा कवितायें विशेष रुचि से पढ़ी जाती हैं। वर्तमान समय में प्रचलित कुछ पत्रिकाएँ इस बात का प्रमाण है, आज के परिपेक्ष्य की कुछ पुस्तकें यथा- नंदन, चंपक, चंदामामा जिनमें पशु-पक्षियों की कथाओं के माध्यम से बच्चों में ज्ञान और समझ को बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास किया जा रहा है, वहीं कुछ साहित्यकारों द्वारा बाल साहित्य विषयक सामग्री का लेखन एवं प्रकाशन हो रहा है।

यदि हम व्यापक स्तर पर देखें तो केवल भारत में ही नहीं बल्कि पाश्चात्य विचारकों ने भी बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य-सृजन किया है। पाश्चात्य के महान विचारक प्लेटो एवं अरस्तु के बालकों की शिक्षा के संबंध में विचार थे कि- यदि बालकों की शिक्षा की बात की जाए तो शिक्षा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ही वह है, जो बचपन में सिखाया जाता है इसलिए अभिभावक वर्ग का दायित्व है कि वह शिशु की शिक्षा का अनुकूल प्रबंध करे। ताकि बड़ा होने पर वह अपने कार्य में पूरी दक्षता प्राप्त कर सके। प्लेटो के अनुसार शिक्षा कभी समाप्त न होने वाला कर्म है। उसके लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है। इसलिए बालक को जहाँ तक संभव हो, जन्म से ही शिक्षा के लिए तैयार किया जाना चाहिए। वह बच्चों को जन्म से ही राज्य के संरक्षण में रखने और पूर्व निर्धारित मापदंडों के अनुसार उनका पालन-पोषण करने का सुझाव देते हैं।

पाश्चात्य साहित्य में बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष रूप से लिखी गई पहली सचित्र पुस्तक जॉन अमोस कामिनियस (1592-1670) की ‘आरिबस सेन्युलियम पिक्चर्स (1657)’ थी, जिसका अभिप्राय है- ‘चित्रों की दुनिया’। इस पुस्तक में बच्चों की रोज़मर्रा की दुनिया की वस्तुओं को चित्रों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया था। कामिनियस का मानना था कि मानवीय मस्तिष्क की सीमाएँ अनंत होती हैं। उसने अरस्तु की इस बात से तो सहमति व्यक्त की थी कि मानव-मस्तिष्क कोरी सलेट के समान होता है, जिस पर कुछ भी लिखा जा सकता है। मगर मस्तिष्क की सीमा को जड़ सलेट तक सीमित कर देने पर उसकी असहमति थी। मानवीय मस्तिष्क के विपुल सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक ‘शिक्षण की संपूर्ण कला’ में उन्होंने लिखा था ‘यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिस पर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं। लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है। सलेट की सीमा होती है, हम उस पर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते, जबकि मानव-मस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है। उस पर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम विस्तार है.’3

वर्तमान समय में यदि हम एक संस्कारित पीढ़ी आने वाले समाज को देना चाहते हैं तो बाल साहित्य की सृजनात्मकता पर ज़ोर देना होगा। बालकों की बुद्धि पर कथाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है और उन्हें संस्कारित करने हेतु आज के समय में ऐसी कथाओं की महती आवश्यकता है जिनमें उनके ज्ञान को परिष्कृत एवं परिवर्धित किया जा सकें। आज हमें ऐसे साहित्य की उपादेयता चाहिए जो बालकों में प्रेम, सहिष्णुता एवं आपसी सहयोग के महत्व को विकसित करें और बच्चों में उदात्त भावना का विकास करें।

संदर्भ-

1. सृजनगाथा-वेब पत्रिका- बाल साहित्य का विकास युगः साहित्य में बचपन की दस्तक-
ओमप्रकाश कश्यप, गाजियाबाद।
2. बाल साहित्य और बल्लूहाथी का बालघर - अश्विनी .के. स्रवंति द्विभाषा मासिक पत्रिका
-अप्रैल 2014 - पृष्ठ 22
3. सृजनगाथा-वेब पत्रिका- बाल साहित्य का विकास युगः साहित्य में बचपन की दस्तक-
ओमप्रकाश कश्यप, गाजियाबाद।

स्वर्णलता ठन्ना
शोध-अध्येता (हिंदी)
हिन्दी अध्ययनशाला उज्जैन।
पता- 84, गुलमोहर कॉलोनी, रतलाम
ई-मेल-swrnlata@yahoo.in


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