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ISSN 2292-9754

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07.13.2016


जुर्म की यूँ दास्तां लिखना

जुर्म की यूँ दास्तां लिखना
ख़ंजर अपना पता लिखना

मिले जो हम किसी मोड़ पे
गली की बस ख़ता लिखना

इनायत करम, तुम पे करे
उसे तो ख़ुदा, ख़ुदा लिखना

लकीरें कब मिटा करती
जुदा हों तो, जुदा लिखना

कहीं तू ज़िक्र में आये
कहे दिल कुछ, भला लिखना


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