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ISSN 2292-9754

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01.10.2016


 सिंघम रिटर्न ५३ ....

आप यहाँ, आज से पच्चास साल बाद, थियेटरों में रिलीज़ हो के तहलका मचा देने वाली फ़िल्म, "सिंघम रिटर्न ५३" की समीक्षा पढ़ने जा रहे हैं।

वैसे हमारे देश में किसान समस्या पर गिनी-चुनी फ़िल्में ही बनी हैं।

आज के ज़माने में, "सुक्खी-लाला" वाला पंच, बिरजू डाकू..... और बेटे को बन्दूक से टीप देने वाली माँ..... का किरदार, बड़ा-पाव, पिज़्ज़ा–बर्गर, खाने वाली पीढ़ी के गले उतारना टेढ़ी खीर है।

मनोज भाई साब के "उपकार" फार्मेट पर काम करना, मानो फ़िल्म में लगाने वाले हज़ार करोड़ को पानी में डुबोने जैसा है, इसी नज़रिये को लेकर हमने प्रोड्यूसर "अजय" से सीधे बात की:

- अजय, जैसा कि हमारी सोच है, "किसान समस्या" पर फ़िल्म बानाना जोख़िम का काम है, आपने ज़बरदस्त हिम्मत दिखाई और सिर्फ हिम्मत ही नहीं बल्कि अपने फ़िल्म को "पाँच हज़ार करोड़" कलेक्शन के टारगेट में स्थापित किया, अनुमान ये भी है कि आपकी फ़िल्म ऑस्कर न हथिया ले, बताइये राज़ क्या है?

अजय – "देखिये! आपकी बात सही के काफ़ी क़रीब है। इंडियन माहौल में अगर हम "सब" की बात करते हैं तो अक्सर किसान पीछे छूट जाता है।

"समझो किसान के नाम से जैसा कि आपने कहा गिनी-चुनी फिलिमें ही बनती रही, ऐसे में हमारे राइटर ने सुझाया कि "आत्महत्या" करने वाले किसानों पर कुछ किया जाए, बस एक शोध हुआ और फिलिम आपके सामने है।"

- "आपको ऐसा नहीं लगता कि किसानों की बात कहते-कहते आप कहीं भटक गए? बीच-बीच में ऊ... ला.... ला..., झंडू बाम ये सब क्या है?"

अजय – "आप फिलिम नहीं बनाते इसलिए समझेंगे नहीं ना। नॉर्थ टेरिटरी वालों का ज़बरदस्त दबाव रहता है, वरना आपकी पिक्चर उठेगी ही नहीं।"

- "उधर आपने ढाय-ढिसुम ज़रूरत से ज़्यादा किया है इसकी वज़ह?"

अजय – "लगता है पिक्चर देखते वक्त आपकी मूँगफली खतम हो गई थी, सो आपने ज्यादा गौर दे देख दी। वो बात ये है कि किसान का भाई, जिसे वह जमीन बेच-बेच के पढ़ा रहा है, माफिया चंगुल में है और आप तो जानते हैं कि माफिया वाले खाली-पीली चुइन्गम नहीं चबाते, दो-चार को काटने-मारने-पीटने दौड़ाते भी हैं, इस वजह से सिचुएशन की डिमांड कह लो, या साउथ टेरेटरी की लाईकिंग समझो, फाइटिंग सीन आ ही जाता है।

"और ये भी बता दूँ आप सिंघम रिटर्न ५३ देखने जा रहे हैं, "महासती बेहुला" नहीं, वो भी इयर २०६५ में, क्या बात करते हैं? आप प्रोड्यूसर डाइरेक्टर के हाथ-पैर ही बाँध देगे, तो, पिक्चर तो भैंस के साथ पानी में चल देगी जनाब?"

- "नहीं-नहीं, मेरा कहने का तात्पर्य ऐसा नहीं है, हम कौन होते हैं जो किसी की फ़िल्म को पानी में डुबोयें-तैराएँ? ये तो दर्शक हैं जो सब करते हैं। आप तो बख़ूबी जानते हैं! हाँ, किसान के साथ हो रही ज़्यादती पर फ़िल्माते समय आपने उनकी समस्याओं पर ज़्यादा ज़ोर नहीं लगाया..., ऐसा हमें लगा सो कह रहे हैं?"

अजय – "आप कैसे कह सकते हैं कि हमने जियादा जोर नहीं लगाया। फिलिम में बताया तो है, कि कैसे "मनरेगा" ने किसानों से मजदूर छीन लिए। हमारी स्टडी टीम ने पाया कि मनरेगा पीड़ित किसान जिसे दिहाड़ी में, सस्ते में मजदूर मिल जाते थे. वही मजदूर अब खेतों में दिनभर काम करना पसंद ही नहीं करते। कहते हैं मनरेगा में घंटे-दो-घंटे को जाओ नाम लिखाओ पेमेंट में "सैन" करो, कमीशन वाले को कमीशन का पैसा दो, फिर दारू ठेके पर पूरे दिन की मौज मना लो।

"लोगों की आम धारणा है कि "अपनी सरकार" के यही तो फायदे हैं व्होट वाले दिन से वायदा कर के गये होते हैं, अच्छे दिन दिखाएँगे, हमें तो ऐसे दिन ही अच्छे लगते हैं।

"और देखिये!... हमने ये भी बताया है कि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे "मिड-डे मील" खाकर घर वापस नहीं पहुँच रहे । वे उधर से ही बीड़ी, सिगरेट, खैनी, पड़की, गांजा, अफीम तलाशते या इसी का साइड बिजनेस करते घूमते रहते हैं। हमने अपनी फ़िल्म में ये बताने की कोशिश की है कि किसानों की दीगर समस्याओं के बीच में यह भी घुसा हुआ सा तो है।"

- "आपने दुःशासन जैसा एक करेक्टर डाला है, उसका क्या.......?"

अजय – "देखिये, हम सीधे-सीधे शासन पर उँगली उठा नहीं सकते थे और न ही उनके किसी काम में उँगली की जा सकती थी, इसलिए यह पात्र डालना स्क्रिप्ट की मजबूती के लिए मजबूरी थी, समझ रहे न आप........?

"हमारी समझ से किसान की मुख्य लड़ाई शासन से है, चाहे वो बीज, फसल, खाद या कोई सबसीडी को लेकर हो। गौरमेंट का, लेने बखत के दाम में कोई कंट्रोल नहीं, मगर फसल की कीमत देने की जब बारी आती है, तब नानी याद आने लगती है। आई.ए.एस. केडर के लोग, बिचौलियों के साथ मिलकर सैकड़ों बहाने ईजाद कर लेते हैं। कहीं–कहीं फसल के दाम लागत कीमत से भी कम तय कर दिये जाते हैं। उस पर, किसानों पर दुहरा प्रहार, प्रकृति भी कर देती है, पानी के वकत पानी का बरसना नहीं होता या ठीक उलट जब फसल पकने को हो घनघोर बारिश हो जाती है।

"हमने अपनी दो घंटे की फिलिम में ये मुद्दा उठाया है। एक किसान के ठीक बाजू में एनआरआई का खेत बताया है। ड्रिप एरीगेशन, उन्नत बीज, समय पर खाद और बारिश से बचने खेत में शेड लगा के सेट तैयार किया है। उसे खुशहाल दिखाने की कोशिश की है, वैसे ये अलग बात है कि उसकी फसल की लागत कीमत उत्पादन से जियादा बैठती है।

"इस फिलिम में सुझाव देते हुए बताया है कि किसानों के हितैषी बनना हो तो आज जरूरत है कि उनके खेतों को पीडब्लूडी में बेकार पड़े सैकड़ों मशीनों से हर तीन साल में एक बार, बारी-बारी से जुतवा कर, जमीन तैयार करके दे दी जावे। दखलंदाजी करने वाले गाँव के पगड़ीधारी, बैर, दुश्मनी रखने वाले पंच-सरपंच को साल भर किसान का बंधुआ मजदूर बनके रहने की सजा दी जावे।"

- "अजय जी, आपका कांसेप्ट अच्छा है, और हाँ, आपको सौ साल के बूढ़े किसान के रूप में देख असमंजस्य लगा। आपने जीवंत रोल किया है, वो झुर्रियाँ (नेचरल), वो एक्सप्रेशन, वो कुछ खोने का दर्द ......कैसे कर पाए? ये सब! कहीं ऑस्कर देवी तो नहीं करा गई आपसे? आप को फाल्के वाला एवार्ड मिलने के क़यास लगाये जा रहे हैं, इस बार उठा ही लेंगे आप? हमारी टीम की शुभकामनाएँ हैं......!"

अजय – "जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया। दरअसल किसी एवार्ड की लालच में फ़िल्म तो हम बनाते नहीं। एवार्ड की लाइन में लगना होता तो "गोडसे" वगैरा पे कब की बना लेते।"

- "जाते-जाते एक और बात ......आपका किसान फ़िल्म के अंत में "आत्महत्या" के सीन में पूरे सिनेमा हाल को रुलाई के कगार में ले जाता है, मगर आपको ये क्या सूझी कि जिस डंगाल पर वो लटकता है वही टूट कर नीचे आ गिरती है। किसान की मौत होने से बच जाती है, दर्शक तालियाँ पीटते बाहर-हाल हो जाते हैं।"

अजय – "वो क्या है कि हमने सुखद अंत रखना बेहतर समझा, पहले आत्महत्या वाले सीन में किसान को मरते दिखाया गया था, मगर लोगों ने सजेस्ट किया.... अजय, कहीं ये सीन आपका "फिलिम करियर बेस्ट लास्ट सीन" न हो जाए वैसे भी आप सौ से ऊपर के हो गए।

"दूसरी बात, सेंसर वाले भी अड़ गए, समाज में गलत मेसेज जाएगा। आत्महत्या करते किसान को देख, उसे हीरो-गति मिलने पर दूसरे किसान आत्महत्या के लिए प्ररित होंगे। मसलन जबरदस्ती इस सीन में बदलाव हुआ। आप मानेंगे नहीं पाँच हजार करोड़ कलेक्सन में पहुँचने का श्रेय भी इसी हेप्पी एंडिंग को जाता है। अपने "काका" ने आनन्द और सफर में मरकर, एक अच्छी स्टोरी को मार्केट नहीं दिला पाए, दर्शक दुबारा सिनेमाहाल इसीलिए नहीं गए कि मय्यत में जाने की बजाय दूसरे फ़िल्म के मुजरे का आनन्द ले लिया जाए। खैर हमारी फिलिम आपके सामने है।"

आपके शहर में जब लग जाए, देख के ज़रूर बताएँ, अजय की "सिंघम रिटर्न ५३" पर आपकी राय क्या है?


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