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ISSN 2292-9754

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03.15.2016


नन्द लाल छेड़ गयो रे

उस ज़माने में नंदलालों को छेड़ने के सिवा कोई काम नहीं था। सरकारी दफ़्तर ही नहीं होते थे, जहाँ बेगारी कर ली जाए। अगर ये दफ़्तर भी होते तो चैन की बंसी बजइय्या टाईप लोग, कुछ देर काम करते और "एक नम्बर" के बहाने साहब को अर्जेंसी का वास्ता देकर, तालाब पोखर की तरफ़ खिसक लेते। उस "खुले शौच" के ज़माने में इतनी छूट तो मिल ही जाती थी। वे पनघट-ब्रांड लड़कियों को इशारे-विशारे करना ख़ूब जानते थे। उन दिनों इत्मीनान इस बात का होता कि किसी प्रकार के एक्ट का चलन नहीं था; सो ख़तरा भी बिलकुल नहीं होता था। एफ़.आई.आर. नाम की कोई चिड़िया खुले आकाश में दूर-दूर तक उड़ा नहीं करती थी। ख़ाकी-खद्दर वाले लोग भी किसी बात को "इशु" बनाने के नाम पर, गली-गली "मुद्दे" सुंघियाते नहीं फिरते थे। क्या मज़े का ज़माना था…!

बाद के दिनों में, ख़ाकी, खद्दर, टोपी, झंडे ने देश की "वाट" लगा दी....!

आपने इस "वाट" को "जेम्स वाट" की तरह, दिमागी रेल इंजन दौड़ाने के फ़िराक़ में, अब पकड़ ही लिया, तो तफ़सील भी जानिये।

ये आपका बुनियादी, प्रजातंत्रीय हक़ भी है कि जिसने "वाट" कहा है उसे वह एक्सप्लेन भी करे।

"वाट" को इधर मैं छोटे-मोटे उठाईगिरी टाईप के लफड़े में इस्तेमाल कर रहा हूँ, जो राजनीति के दैनिक क्रियाकलापों का हिस्सा बन गया है मसलन, नेता वादा करके वादाख़िलाफ़ी न करे, "ख़ाकी" अगर माँ-बहनों वाली डिक्शनरी न खोले, "टोपी" अगर झाँसा न दे, "झंडे" को कोई लाठी के बतौर, उसे उठाने वाला, चलाना न जाने तो आजकल प्रजातंत्र के पाए डगमगाए से लगते हैं। "बड़े वाट" पर बात करने का ज़माना, दिन-बादर है नहीं। मुफ़्लिसिये पर दस करोड़ की मानहानि वाली बिजली गिर गई तो, अपना कुनबा ही साफ़ हो जाएगा...?

नब्बू एक दिन मायूस सा आया। "भइय्या जी मज़ा नहीं आ रहा है.....।" उसके इस कथन के पीछे मुझे किसी नए क़िस्म की ख़ुराफ़त के पर्दाफाश होने का आभास, छटी इन्द्रिय के मार्फ़त, तुरन्त हुआ सा लगा। मैंने खींचने के अंदाज़ में कहा, "ज़िन्दगी के "तिरसठ-पूस" ठंडाये रहे, तुम्हें भुर्री तापते कभी न देखा आज कौन सी आफ़त आ गई जो कंडा सकेलने निकल गए.... बोलो.....?"

"भइय्या जी, बात ये है कि आजकल की राजनीति में दम नहीं है। हम रोज अखबार पढ़ते हैं, आप भी देखे होंगे.... न छीन-झपट, न जूतम-पैजार.... न किसी के अंगदिया पैर उखाड़े जाते, न एक दूसरों की सरेआम वस्त्र उतारने की बात होती। सब सन्नाटे में बीत जाता है। अपने मुनिस्पेलटी इलेक्शन में ही देखो लोग खड़े हुए, न झगड़े न सर-गला कटा। कोई पेटी उठाने का दम भरते नहीं दिख पाता। किसी जमाने का वो सीन भी याद है जब मवाली, कोठे में नोट लुटाने की तर्ज और स्टाइल में, बेलेट को धड़ाधड़ छापता और कह देता, बता देना "छेनू" आया था। छेनू नाम का सिक्का चला के जीत-हार हो जाती थी। मतदाता को दस-बीस जो मिल जाता, उसे वह पाँच सालाना बोनस बतौर स्वीकार कर लेता। कोई शिकायत या उलाहना देने की नौबत कब आती थी। वैसे भी उन दिनों पानी लोग कम इस्तेमाल करते थे, शौच-नहाना-धोना तालाब किनारे हो जाता था इस वजह घरों में पानी बहने-बहाने या नाली की समस्या न थी। बच्चों को स्कूल में इतना पढ़ा दिया जाता कि रात को उनको सबक-होमवर्क करने की जरूरत न पड़ती थी, इसलिए बिजली की भी दरकार नहीं थी। नेता की चरण-पूजाई का स्कोप कम या नहीं के लगभग था। उन्हें कोई हारे या जीते से सारोकार नहीं होता था।"

नब्बू ने आगे बताया, "भइय्या खबर है, अपने धासु बेनर्जी जो बड़े डाइरेक्टरों में गिना जाता है, अपने मिस्टर आजीवन कुँआरे कन्हईया को लेकर पुरानी और नई तहजीब पर फ़िल्म बना रहे हैं। पाँच हजार साल पहले की याददाश्त अपने हीरो को दिला बैठे हैं। उसका दिल नदी, नालों, पोखरों के आसपास मंडराते रहता है। हर नदी में फ्लेश्बेक है। रईस बाप हर कीमत पर अपने बेटे को इस फ्लेश्बेकिया बीमारी से निजात दिलाने के लिए उसके मुरादों वाली सीन एक्ट्रेस, लंगोटिया कामेडियन, सेट बनवा के रखता है। किसी ने उसे सुझाया, यूँ तो आप पैसा पानी की तरह बहा ही रहे हैं तो क्यों न इसे शूट करके साउथ डब वाली फ़िल्म की शकल दे दी जाए। रईस को सुझाव उम्दा लगा सो पहले उसके बीमार लड़के के शौक का रिहल्सल होता है फिर उसी सेट में आजीवन कुँआरा फिट हो जाते।

“कंकरिया मार के जगाया" इस गाने के बोल फिल्माने के लिए बुलडोजर से कई किलोमीटर कांक्रीट रास्ते को उखाड़ कर, बजरी-पत्थर-कंकर डाले गए। हीरो ने एक कंकर उठा के मटकी फोड़ी सब निशाने की वाह-वाह में लग गए। हिरोइन इन्हीं पलों की याद में, फूटे-मटके पर सर रख के अपने सोये (प्रेम में अज्ञानी) होने का प्रलाप कर रही है।

इंटर तक, पाँच हजार पुराने मटका फोड़ू को तत्व-ज्ञान मिल जाता है। अक्सर ये अचानक बिना साइंटिफिक रीजन के तत्व-ज्ञान मिलाने वाला अक्षम्य-अपराध अनेकों फिल्मी-स्क्रिप्ट की जान है और बाक्स आफिस में हजार करोड़ कमाने का नुस्खा भी है। अत: किसी के पापी पेट को लात न मारते हुए आगे बढ़ते हैं।

मटका फोडू हीरो, पहले मटका-किंग फिर बाद में, बाप की अंडर वर्ड वाली रियासत को सम्हालता है। उसे घेरे रहने वाले किंग-मेकर उसे बाहर जाने की सलाह दे डालते हैं, जिसे पूरी तन्मयता के साथ वो निभाता है। डाइरेक्टर उसे ग़रीबों के साथ हँसना-खेलना सिखलाने के लिए विदेश ले जाता है। किसी के घर मातम में कौन सा मुखौटा होना चाहिये, इसकी बाकायदा तालीम दिलवाता है। भाषण के बीच लोगों से प्रश्न क्या पूछे कि, जवाब "हाँ" में निकले, कब बाँह चढ़ा कर भाषण में अपनी भुजा दिखाना है, इन छोटी-छोटी हरकतों पर गौर करने को कहता है।

"नन्दलाल" जिसे आधुनिक हीरो बनाया अपनी पुरानी यादों को अचानक संसद में ताजी कर लेता है। बड़े-बड़े सांसदों मंत्री-मंत्राणी, किसी को नहीं छोड़ता। सबकी मटकी में उसे माखन होने का संदेह रहता है। मलाई खाते हुए वे लोग, जो अब तालाब पोखर की ओर आना भूल गए, उनके लिए वो खुद इन्साफ का कंकर लिए छेदने-छेड़ने के लिए तैयार दिखता है।"

इति फ़िल्म पटकथा समाप्त! डाइरेक्टर, राइटर, हीरो हज़ार करोड़ की उम्मीद में। कुछ अति उत्साही आस्कर में ले जाने के लिए फार्म भी खरीदे लाये हैं। भगवान जाने आगे क्या हो ....?

नब्बू की बेसिरपैर की कथा का विस्तार, अगले एपीसोड में फिर कभी ...तब तक आप सेफ़ रहें!


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