अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.13.2016


इश्तिहार निकाले नहीं

२१२ २१२ २१२ २१२
ज़र्द से ख़त किताब में सम्हाले नहीं
ता-उम्र परिंदे यूँ ही पाले नहीं

याद में वो बसा, चार दिन के लिए
ता कयामत चले, शक़्ल ढाले नहीं

हो कहाँ जिरह, या बहस किससे करें
कोशिशें - बंदिशें, कल पे टाले नहीं

जिस्म का ज़ख़्म, पेश्तर कि भरा करे
इश्तिहार अख़बार में, निकाले नहीं

जिगर से खूं यहाँ, बेसबब रिस रहा
कहने को उधर पाँवों में, छाले नहीं

हम जियें या मरे, गरज़ किसको 'सुशील'
क़िस्मत किया, किसी के हवाले नहीं

हो के हैरान सा अब ज़माना दिखा
सादग़ी, बेड़ियाँ पाँव डाले नहीं


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें