अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.04.2016


गर्व की पतंग

२१२२१ २१२२१

ग़ौर से देख, चेहरा समझ
आइने को, न आइना समझ

सीख लेना, सियासत का खेल
सादगी-संयम, अपना समझ

गर्व की, कब उड़ी कोई पतंग
बेरहम बहुत, आसमां समझ

शोर गलियों में, नाम दीवार
चार दिन ख़ुद को, फ़रिश्ता समझ

चाहतों को लुटा खुले हाथ
नेमत ख़ुदा यही, अता समझ

स्याह अँधेरा रौशन करे जो
ज्ञान को सर झुका 'दिया' समझ

रात हो, ज़ुल्म, ख़त्म होती है
घूमता पास, सिरफिरा समझ

लूटने वाले चल दिए लूट
शोर करना, कहाँ-कहाँ समझ

पेड़ की छाँव, बैठ तो 'सुशील'
सोच 'माजी', उसे तन्हा समझ


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें