अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.10.2015


दिले नादां तुझे हुआ क्या है ...?

दिल के नादान होने की अमूमन उम्र सोलह से बाईस चौबीस की होती है। इस उमर में उल्फ़त के नग़्मे, इश्क के फ़ितूर, आशिकी के मिज़ाज, और आवारग़ी के न जाने कैसे-कैसे चोंचले दिमाग़ में घुसे होते हैं।

कुछ साइंटिस्टों ने बता रखा है कि दिल या दिमाग़ के फिसलने का न कोई मौसम होता है, न दिन बादल होते हैं, और न ही कोई उमर होती है।

दिल के ‘बच्चा’ होने की घोषणा कोई भी, किसी भी उमर में, कर सकता है । ’दिल तो बच्चा है जी’ कहके किसी भी अक्षम्य अपराध से माफी माँगी जा सकती है।

अपने तरफ़ के, अच्छन मियां को सठियाये हुए पाँच-छह साल हो गए। दिल अब भी जवान लिए घूमते हैं। अपने अतीत के दस-बीस प्रेमिकाओं के क़िस्सों को आज भी अनुलोम-विलोम की तरह बिना नागा दोस्तों की महफ़िल में दुहराते रहते हैं। इन क़िस्सों से बेग़म यक़ीनन नावाकिफ़ रहती हैं वरना वे भरी मह्फ़िल शीर्षासन करवाने से बाज़ न आती।

अच्छन मियां का नारा है जो काम करो ‘डंके की चोट’ पर करो, मगर डंका इतनी दूर हो कि आवाज़ बेग़म तक न पहुँचे।

उनने सठीयाये हुए सालों को, यादों की जुगाली के सहारे बिता देने के कई सारे प्लान बना रखे थे। टी.वी. वालों ने उन पर पानी फेर के रख दिया। सत्यानाश हो इन चैनलों का। मिनट-दर-मिनट ब्रेकिंग न्यूज़ दिखा कर, उत्सुकता को प्रमिका की तरह ज़िंदा रखते हैं, कल मिलोगे तो एक अच्छी बात बताऊँगी। मिल लो तो, कहती है कौन सी बात .....?’

अच्छन मियां को अफ़सोस होता है कि सिवाय इश्क फ़रमाने और अब्बू मियां की दूकान में अंडे बेचने के सिवाय वे कुछ कर न सके।

अच्छन मियां दूकान के खाली समय में ‘स्वस्फूर्त दार्शनिक’ हो जाया करते हैं।

सब पुराने प्रकांड विद्वान, पंडित, महात्मा, साधू लोग ज्ञान कहाँ से पाते रहे... ?

वे सोचते, उस ज़माने में न साहित्य का भंडार पढ़ने को था न आज जैसी गूगल साईट थी।

बस पालथी मार के योग आसन लगा लो, आँखें बंद कर ध्यानस्थ हो जाओ, ज्ञान की बड़ी-बड़ी फ़ाइल अपने-आप डाउनलोड हो जाती थी। अंत में प्रभु स्वयं आकर पूछते वत्स कुछ और डाउनलोड करना है?

अपनी दूकान में दार्शनिकता के अलावा अच्छन मियां को समय-समय पर समीक्षक, आलोचक या क्रुद्ध वक्ता बनते इस मोहल्ले के कइयों ने देखा है।

आपने अंडा लिया नहीं कि वे बातों में उलझा लेते हैं।

"क्या लगता है आपको, ये झाड़ू वाले आगे टिक पायेगे .....?”

"ग़ज़ब की टेक्नीक है जनाब दाढ़ी वाले की, हर किसी से, प्यारा खिलौना, बच्चों की तरह छीने जा रहे हैं।

कहीं गाधी झपट लिये, लोगों ने कुछ न कहा चलो, वे महात्मा थे सब के थे, उनके भी हो लिए कोई बात नहीं। देखते-देखते पटेल ले लिए, शिवाजी ले गए, नेहरू को छीने जा रहे हैं। जनता के दिलो-दिमाग़ में अपने आदर्श का सिक्का जमाये दे रहे हैं, भूल के भी अब अटल जाप नहीं करते पता नहीं क्यों ?

राम, फिर राम की मैली गंगा, सब उन्हीं का हुए जा रहा है। मैं तो कहता हूँ, बातों का माया जाल है, सम्मोहन है। सम्मोहित हुए जा रही है, जनता। इन्हें तंद्रा से आखिर जगाने वाला है कोई ....?

अच्छन मियां, मुंशी जी को पढ़े होने का प्रमाण देते कहते हैं, क़लम के जादूगर अकेले मुन्शी जी थे। उनकी लेखनी में ग़ज़ब का सम्मोहन था लोग उनके बनाए लिखे पात्रों को आजीवन बिसरा न पाते थे।

अब जो बातों के जादूगर पैदा हो गए हैं वे ‘मॉस’ को हिप्नोटाईज़ किये दे रहे हैं।

अपनी जनता, हर किसी के सम्मोहन में, बातों-बातों में आ जाती है। कभी योग बाले बाबा, कल के मदारी की तरह, बकबक करते-करते अंत में अपनी दवाई, अपने नुस्खे के बेच के, जेबें ढीली करवा लेते हैं। कभी ‘इनट्यूशन’ वाले बाबा सरे आम लोगों को बताते हैं कि ‘शक्तियाँ’ कहाँ छिपी हुई हैं क्यों आपके काम में रुकावटें पड़ रहीं हैं?

कल ये किया है तो आज ये कर, यहाँ ये चढ़ा वहाँ वो टोटका कर, शक्तियाँ तेरे काम में मदद के लिए तैयार बैठी हैं। चल, ’दसबंद’, इधर ढीली कर।

नादान लाखों लोगों को झाँसे में आते करोड़ों ने देखा है, देख रहे हैं। इन ‘झाड़ फूँकिस्टों’ की सम्मोहन विद्या ज़बरदस्त होती है।

शुरू-शुरू में नादां दिल वाले कुछ कौतुहल में इनके नज़दीक जाते हैं, बाद में इनके मुरीद बनते समय नहीं लगता। वे लोग इनका परचम उठा लेते हैं।

अपने तरफ़ लंबी लाइन के पीछे एकाएक खड़े हो जाने की परंपरा सदियों से है।

”येन गता: सा पन्था” मानने वालों की कमी, कभी न रही।

जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमें गुज़रना नहीं, जैसी कमोबेश स्थिति सदियों से बनते रही है।

जहाँ झंडे का रंग हमारे मन के माफ़िक न हो वहाँ हमारा क्या काम ....?

लाइन में खड़े होने के, देर बाद पूछते हैं ये लाइन किसलिए है भाई?

कोई देर से खड़ा, खिसियाया हुआ कह देता है मय्यत में आये हैं, कंडे देना है.....। ये सुन के अगला किसी बहाने खिसक लेता है।जान न पहचान फिर कंडा काहे का...?

अच्छन मियां के साथ यही कुछ ‘मिट्टी’ देने के नाम पर हो जाता है ....। वैसे भी वे किसी की मय्यत में जाने से तौबा किये रहते हैं।

लेटेस्ट रिपोर्टिंग के लिए मैं कहीं और नहीं भटकता। देश-विदेश, मोहल्ला-पड़ोस की सभी जानकारी बिना कहीं गए, अच्छन मियां मार्फ़त मुहय्या हो जाती है।

मुहल्ला पड़ोस में लड़की भागने-भगाने के क़िस्से हों, रेप बालात्कार की कोई घटना हो तो उनके दूकान में अंडों की बिक्री में, ज़बरदस्त उछाल आ जाता है।

कभी कभी अच्छन मियां जब ग़ुस्से में होते हैं, तो देशी जनता उनके ग़ुस्से का निशाना बनती हैं।

मसलन, देखो कैसी भेड़ चाल है। जिसे देखो आजकल झाड़ू की बात करता है।

हिम्मत है तो काहे नहीं फेर देते प्रजातंत्र की कीचड़-गन्दगी में झाड़ू .....?

लड्डू को प्रसाद की तरह टुकड़े-टुकड़े बाँट देती है ये जनता।

किसी एक पार्टी को बड़ा सा टुकड़ा दे के क़िस्सा ख़तम करो। किसी एक की भूख तो मिटे।

दुअन्नी चवन्नी पकड़ाने से ‘ईदी’ मनने की नहीं, दो तो अठन्नी से उप्पर की दो ....।

ये नादां लोग न जाने आमची मुंबई को कहाँ ले जाने पे उतारू हैं ...क्या पता .?


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें